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क्या कर्नाटक जैसी चाल चलेंगे राहुल 2019 चुनाव में भी…

कर्नाटक में जो देखने को मिला कांग्रेस के लिए ये नई बात थी. कांग्रेस दूसरे नंबर की पार्टी थी, जेडीएस के सहयोग से सरकार बना सकती थी, लेकिन उसने मुख्यमंत्री पद का मोह छोड़कर जेडीएस के कुमारस्वामी की सरकार बनवा दी क्योंकि लक्ष्य बीजेपी को सत्ता से दूर रखना था.क्या कर्नाटक जैसी चाल चलेंगे राहुल 2019 चुनाव में भी...

ऐसा ही एक लक्ष्य और दृश्य 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद भी देखने को मिल सकता है जब कांग्रेस विपक्ष की बड़ी ताक़त हो और उसे ममता बनर्जी, मायावती, चंद्रबाबू नायडू या फिर किसी और क्षेत्रीय नेता को प्रधानमंत्री बनाना पड़े और ख़ुद के लिए पीएम पद का मोह छोड़ना पड़े.

कर्नाटक के प्रयोग के सूत्रधार बने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी. लेकिन क्या 2019 में भी राहुल कुछ ऐसा ही करने का मन बना रहे हैं क्योंकि किसी भी क़ीमत पर बीजेपी को सत्ता से बाहर करने को उन्होंने राजनीतिक उद्देश्य बना लिया है. फिर राहुल ने हाल ही में जो प्रधानमंत्री बनने की बात बेंगलुरु में कही थी, उसका क्या होगा, चलिए पड़ताल करते हैं राहुल और कांग्रेस के ‘कल आज और कल’ और उनके सियासी सपने की.

राहुल का सियासी ‘आरंभ’

साल 2013 में राहुल गांधी जब कांग्रेस के उपाध्यक्ष बने थे तो बेहद भावुक भाषण में उन्होंने अपनी मां और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की सलाह का ज़िक्र किया था जिसमें सोनिया ने कहा था – ‘सत्ता ज़हरीली होती है.’ इसी ‘ज़हरीली सत्ता’ के बीच अपनी सियासी हैसियत की तलाश और भविष्य के सपने बुन रहे हैं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी.

ये उसी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं जिसका 130 साल से ज़्यादा का इतिहास है, जिसने 1947 में मिली आज़ादी के बाद अधिकांश समय में भारत पर राज किया है और हर वो हथकंडे अपनाती रही है जिसके लिए आज वो केंद्र की सत्ता पर बैठी बीजेपी और नरेंद्र मोदी की आलोचना करती है.

लेकिन जो कांग्रेस नेहरू की थी, जो इंदिरा की थी, जो राजीव गांधी की थी और अपने गठबंधन के स्वरूप के साथ जो सोनिया की थी वो आज नहीं है, ये बात राहुल गांधी समझ गए हैं और शायद इसीलिए उन्होंने कर्नाटक में 78 सीटें लेकर भी बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए 37 सीटों वाली जनता दल सेक्युलर को सीएम की कुर्सी सौंप दी और कांग्रेस को किंगमेकर की भूमिका में ला खड़ा किया.

वरिष्ठ पत्रकार और कांग्रेस मुख्यालय का इतिहास और सोनिया गांधी की जीवनी लिखने वाले रशीद किदवई कहते हैं, “कांग्रेस की जो कमज़ोरी है उसे राहुल गांधी बख़ूबी समझ गए हैं कि कांग्रेस अपने बूते पर भाजपा को टक्कर नहीं दे पाएगी. ये राजनीतिक आकलन मददगार साबित हुआ कर्नाटक में सरकार के गठन में.”

“कहने को तो राहुल गांधी ने ये भी कहा है कि 2019 में अगर कांग्रेस सबसे बड़े राजनीतिक दल के तौर पर आई तो वो प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे. लेकिन ये बात उन्होंने कांग्रेस जन को उत्साहित करने के लिए कही है. आज सभी लोग जानते हैं कि 2019 में भाजपा के सामने कांग्रेस का सबसे बड़ी पार्टी होना बहुत मुश्किल है.”

कांग्रेस की हक़ीक़त

राजनीति पर बारीक नज़र रखने वाले मानते हैं कि सोनिया गांधी की तरह राहुल गांधी भी प्रधानमंत्री पद पाने के लिए उतने उत्सुक नहीं है जितने क्षेत्रीय दल के नेता हैं. ऐसे में जब 2019 के आम चुनाव होंगे और भाजपा को अगर स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो राहुल गांधी एक सक्रिय भूमिका में नज़र आएंगे.

यानी ऐसा संभव है कि मायावती और ममता जैसा कोई क्षेत्रीय क्षत्रप (जिनके पास पर्याप्त सीटें हों) प्रधानमंत्री पद का दावेदार बन जाए और राहुल उनका समर्थन करते नज़र आएं. पहले कांग्रेस को ये लगता था कि एक ऐतिहासिक दल होने के नाते उसकी ऐतिहासिक भूमिका है और वो गठबंधन के ख़िलाफ़ रहती थी. समय बदला. परिदृश्य बदला. कांग्रेस का राजनीतिक वर्चस्व वैसा नहीं रहा जैसा राजीव गांधी के पहले तक हुआ करता था. ऐसे में पार्टी ने समझा कि गठबंधन कोई बुरी चीज़ नहीं है. यदि सत्ता में रहना है तो गठबंधन की सरकार बनानी ही होगी, हालांकि नेतृत्व कांग्रेस के पास रहेगा.

गठबंधन धर्म

और अब एक और ऐसा समय आया है जब कांग्रेस को फिर से अपनी भूमिका दोबारा तय करनी होगी. जैसा कि कर्नाटक में देखने को मिला. बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के लिए कांग्रेस ने केवल 38 सीटों वाली जेडीएस के नेतृत्व में सरकार बनवाना स्वीकार किया और ख़ुद सहयोगी की भूमिका में आ गई. भारतीय राजनीति के शीर्ष पर रही इस ऐतिहासिक पार्टी के लिए बदलते समय के अनुसार ख़ुद की भूमिका को नया रंगरूप देना पड़ा.

यानी वो गठबंधन धर्म का निर्वाह करते हुए सत्ता में तो है, लेकिन नेतृत्व उसके पास नहीं वो केवल ‘राजा’ बनाने की भूमिका में है. रशीद किदवई कहते हैं, “ये कांग्रेस के नए नेता राहुल गांधी की सोच का नतीजा है जो समय के अनुकूल नज़र आता है. समय की मजबूरी कहें या फिर राजनीतिक हालात का दबाव, राहुल गांधी को ये समझौता करना पड़ रहा है और इसमें कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और रणनीतिकारों की सहमति भी नज़र आती है.”

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आगे की राह

अब एक क़दम और आगे बढ़ते हैं. कर्नाटक के हालात में राहुल गांधी ने बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए जेडीएस के कुमारस्वामी का मुख्यमंत्री बनना स्वीकार कर लिया और कांग्रेस बड़ी पार्टी होते हुए भी सत्ता के गणित में सहायक की भूमिका में आ गई. आने वाले समय में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव होने हैं जहां बीजेपी की सरकारें हैं और फिर 2019 में लोकसभा का चुनाव होना है.

राजनीतिक विश्लेषक अब ये अनुमान लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि राहुल गांधी ने कर्नाटक में जो किया है क्या वो लोकसभा चुनाव में भी करेंगे. यानी क्या कांग्रेस पहले ही ये कह सकने की स्थिति में होगी की राहुल गांधी चुनाव के नतीजे पूरी तरह आ जाने तक विपक्ष की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं. चुनाव परिणाम जैसे आएंगे उसे देखते हुए ही आगे की रणनीति यानी प्रधानमंत्री के दावेदारों पर चर्चा आगे बढ़ाई जाएगी.

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