जब घर में श्रद्धालु की तरह मिलने आए अब्दुल ने गोली मारकर की थी हत्या…

स्वामी श्रद्धानन्द का जन्म 6 फ़रवरी, 1856 को जालंधर में हुआ था। 18 वीं शताब्दी में हिन्दुओं और मुस्लिमों का सर्वमान्य नेता माना जाता था। साथ ही भारत के प्रसिद्ध महापुरुषों में भी शुमार किया जाता है। स्वामी जी ऐसे महान राष्ट्रभक्त संन्यासियों में अग्रणी थे, जिन्होंने अपना सारा जीवन वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया था। स्वामी श्रद्धानंद ने देश को अंग्रेज़ों की दासता से छुटकारा दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई। इसके अलावा दलितों को उनका अधिकार दिलाने और पश्चिमी शिक्षा की जगह वैदिक शिक्षा प्रणाली का प्रबंध करने जैसे अनेक महत्वपूर्ण काम भी किए।

स्वामी श्रद्धानन्द के पिता का नाम लाला नानकचन्द था, जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा शासित वर्तमान उत्तर प्रदेश में पुलिस अधिकारी के पद पर नियुक्त थे। श्रद्धानन्द जी के बचपन का नाम बृहस्पति था, फिर बाद में वे उन्हें मुंशीराम नाम से भी पुकारा जाने लगा। मुंशीराम जी के पिता का तबादला अलग-अलग स्थानों पर होता रहता था, जिस कारण मुंशीराम की आरम्भिक शिक्षा अच्छी प्रकार से नहीं हो सकी। लाहौर और जालंधर उनके मुख्य कार्यस्थल रहे।
एक बार आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती वैदिक धर्म के प्रचार के लिए बरेली पहुंचे, तो पुलिस अधिकारी नानकचन्द अपने पुत्र मुंशीराम को साथ लेकर स्वामी दयानन्द का प्रवचन सुनने पहुंचे। युवावस्था तक मुंशीराम ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास ही नहीं करते थे, पर स्वामी दयानन्द जी के तर्कों और आशीर्वाद ने मुंशीराम को ईश्वर विश्वासी और वैदिक धर्म का बड़ा भक्त बना दिया।
पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंशीराम एक सफल वकील बने। अपनी वकालत से उन्होंने काफ़ी नाम और प्रसिद्धि हासिल की। आर्य समाज में वे बहुत ही एक्टिव रहते थे। उनका विवाह शिवा देवी के साथ हुआ था। मात्र 35 साल के जब मुंशीराम हुए, तो यौवन की इस अवस्था में उनकी पत्नी शिवा देवी स्वर्ग सिधार गईं। उस समय उनके दो पुत्र और दो पुत्रियां थीं। उसके बाद स्वामी जी ने 1917 में संन्यास धारण कर लिया और फिर वहीं से वो स्वामी श्रद्धानन्द के नाम से विश्व विख्यात हुए।
समाज सेवा
स्वामी श्रद्धानन्द अब दयानन्द सरस्वती के बताए रास्ते पर चल पड़े । अपनी जीवन गाथा में उन्होंने लिखा था- “ऋषिवर! कौन कह सकता है कि तुम्हारे उपदेशों से निकली हुई अग्नि ने संसार में प्रचलित कितने पापों को भस्म कर दिया है। आगे लिख कि अपने विषय में मैं कह सकता हूं कि तुम्हारे सत्संग ने मुझे कैसी गिरी हुई अवस्था से उठाकर सच्चा लाभ करने योग्य बनाया। स्वामी श्रद्धानन्द अपना आदर्श महर्षि दयानंद को ही मानते थे। महर्षि दयानंद के महाप्रयाण के बाद उन्होंने स्वदेश, स्व-संस्कृति, स्व-समाज, स्व-भाषा, स्व-शिक्षा, नारी कल्याण, दलितोत्थान, स्वदेशी प्रचार, वेदोत्थान, पाखंड खंडन, अंधविश्वास उन्मूलन और धर्मोत्थान के कार्यों को आगे बढ़ाने के कार्य किए।
स्वामी श्रद्धानन्द पर जारी डाक टिकट
स्वामी श्रद्धानन्द ने दलितों की भलाई के लिए निडर होकर काम किया। और साथ ही कांग्रेस के स्वाधीनता आंदोलन का बढ़-चढ़कर नेतृत्व भी किया। कांग्रेस में उन्होंने 1919 से लेकर 1922 तक महत्त्वपूर्ण भागीदारी अदा की। 1922 में अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया, लेकिन उनकी गिरफ्तारी कांग्रेस के नेता होने की वजह से नहीं हुई थी, बल्कि वे सिक्खों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए सत्याग्रह करते हुए बंदी बनाये गए थे। स्वामी श्रद्धानन्द कांग्रेस से अलग होने के बाद भी स्वतंत्रता के लिए कार्य लगातार करते रहे। हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए स्वामी जी ने जितने कार्य किए, उस वक्त शायद ही किसी ने अपनी जान जोखिम में डालकर किए हों।
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महत्त्वपूर्ण तथ्य
काशी विश्वनाथ मंदिर के कपाट सिर्फ रीवा की रानी के लिए खोलने और साधारण जनता के लिए बंद किए जाने और एक पादरी के व्यभिचार का दृश्य देखकर मुंशीराम जी का धर्म से विश्वास उठ गया था और वे बुरी संगत में पड़ गए थे। किन्तु स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ बरेली में हुए सत्संग ने उन्हें जीवन का अनमोल आनंद दिया, जिसे उन्होंने सारे संसार को वितरित किया।
हत्या
श्रद्धानन्द जी सत्य के पालन पर बहुत जोर देते थे। उन्होंने लिखा है- “प्यारे भाइयो! आओ, दोनों समय नित्य प्रति संध्या करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करें और उसकी सत्ता से इस योग्य बनने का यत्न करें कि हमारे मन, वाणी और कर्म सब सत्य ही हों। सर्वदा सत्य का चिंतन करें। वाणी द्वारा सत्य ही प्रकाशित करें और कमरे में भी सत्य का ही पालन करें। लेकिन सत्य और कर्म के मार्ग पर चलने वाले इस महात्मा की 23 दिसम्बर, 1926 को चांदनी चौक, दिल्ली में गोली मारकर हत्या कर दी। उस दिन अब्दुल रशीद नाम का शख्स उनके घर में सामान्य मिलने वाले लोगों की तरह मिलने आया, और उसने गोली मारकर स्वामी जी की हत्या कर दी। इस तरह धर्म, देश, संस्कृति, शिक्षा और दलितों का उत्थान करने वाला यह युगधर्मी महापुरुष सदा के लिए अमर हो गया।





