घायलों को पीठ पर लादकर बच्चे चढ़ते हैं सीढ़ियां, स्कूल की दीवारें ऐसी कि तूफान से भी कुछ न बिगड़े

भुवनेश्वर.एक हफ्ते पहले ‘मोरा’ तूफान बांग्लादेश और पूर्वोत्तर भारत में एक साथ आया। बांग्लादेश में इसने छह लोगों की जान ले ली। पर भारत में कोई हताहत नहीं हुआ। अगर हम इसे सिर्फ संयोग मानेंगे तो गलती होगी। दरअसल, यह भारत की तैयारी थी, जिसने कुछ घंटों में ही हजारों लोगों को सुरक्षित इलाकों में पहुंचाया। वैसे, इस तैयारी की शुरुआत ‘मोरा’ आने से पहले नहीं, बल्कि 1999 के सुपर साइक्लोन के बाद हुई थी। तब ओडिशा में सुपर साइक्लोन से 15 हजार लोग मारे गए थे।

इसके बाद ओडिशा ने आपदा प्रबंधन की तैयारी की थी। 2013 में इसी की बदौलत फेलिन साइक्लोन से आने पर 24 घंटे में 10 लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंच गया। ओडिशा का प्रबंधन अब केस स्टडी बन चुका है। तमाम राज्यों से लेकर दूसरे देश भी इसे अपना रहे हैं। फिजी, पापुआ न्यूगिनी, समोआ जैसे 14 पैसिफिक देशों के प्रतिनिधि अगले महीने ओडिशा में डिजास्टर मैनेजमेंट का मॉडल सीखने आएंगे।
ओडिशा के गंजम जिले के सत्रुसोला गांव में हाल ही में तूफान से बचने के लिए मॉक ड्रिल की गई। इसमें 15 साल की ज्योतिलता पिलाई 10 मीटर ऊंची बिल्डिंग से रस्सी के सहारे उतर आई। 17 साल की सुधा अपनी ही उम्र की बेहोश लड़की को पीठ पर बांधकर दीवार पर लगी सीढ़ी से नीचे उतरी और चढ़ी भी। उसकी रफ्तार सेना के जवानों से बिलकुल कम न थी। नारंगी व हरे फ्लोरसेंट रंग के जैकेट पहनी वॉलंटियर की टोली इसी बिल्डिंग से स्ट्रेचर पर लेटे पीड़ित को रस्सियों और सीढ़ी से उतार लाई। 15 साल के ही बच्चों ने ड्रिल के दौरान घायलों को पट्टी बांधी।
सबसे अहम भूमिका कम्युनिटी के फर्स्ट रिस्पाॅन्डर की
सत्रुुसोला के शेल्टर प्रबंध समिति के सदस्य सूरथ प्रधान कहते हैं कि किसी भी आपदा में सबसे अहम भूमिका कम्युनिटी के फर्स्ट रिस्पाॅन्डर की है। गांवों में यह जिम्मेदारी लड़के व लड़कियों ने ली है। उन्हें इसकी ट्रेनिंग मिली है। ओडिशा के 480 किमी. के समुद्री तटों पर बसे 23 हजार गांवों में ऐसी ट्रेनिंग दी गई है। समुद्र तटीय बालासोर, भद्रक, केंद्रपाड़ा, जगतसिंहपुर, गंजम और पुरी जिलों में करीब 10 किमी. की दूरी पर मल्टीपर्पज साइक्लोन सेंटर बनाए गए हैं। तट से पांच किमी. दूरी पर स्थित ये सेंटर आम दिनों में स्कूल या कम्युनिटी सेंटर की तरह चलते हैं। आपदाओं के समय यह शेल्टर हाउस बन जाते हैं। एक सेंटर में 2 हजार लोग रह सकते हैं। गोल खंभों पर बनी सेंटर की बिल्डिंग 300 किमी. की रफ्तार से आए चक्रवाती तूफान को झेल सकती है।
1999 के सुपर साइक्लोन के बाद आपदा से निपटने के लिए बुनियादी ढांचा विकसित किया
ओडिशा स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी के एमडी प्रदीप्त महापात्र ने बताया, ‘1999 में सुपर साइक्लोन आया तो हमारे पास पूर्व चेतावनी की व्यवस्था नहीं थी। तब करीब 15 हजार लोग मारे गए थे। जबकि, 2013 में फेलिन के आने से पहले मौसम विभाग सटीक पूर्वानुमान कर चुका था। इसके अलावा 1999 के बाद हमने आपदा से निपटने के लिए बुनियादी ढांचा विकसित कर लिया था। हमने आपदा से निपटने के तरीके विकसित किए। आपदा प्रबंधन की फोर्स तैयार की। सबसे बड़ी बात आम लोगों को को इस व्यवस्था का हिस्सा बनाया। उन्हें प्रशिक्षित किया। इसी कारण हम 2013 में हम लोगों की जान बचा सके।’
ओडिशा के एडीजी (लॉ एंड ऑर्डर) बिनयानंद झा कहते हैं कि रैपिड एक्शन फोर्स को 95% इम्पोर्टेड मशीनें मुहैया कराई गई हैं। सड़क पर गिरे पेड़, धराशायी इमारतों की सीमेंट दीवार, लोहे की ग्रिल आदि काटने के लिए विदेशी मशीनें हैं। इससे सड़कों को महज 24 से 48 घंटे में साफ किया जा सकता है। पहले इन्हीं कामों में कई हफ्ते गुजर जाते थे। झा ने बताया कि 19 जून को प्रदेशभर के सभी उपकरणों और व्यवस्था की जांच के लिए मॉक ड्रिल की जाती है। लोगों में आपदाओं के प्रति जागरूकता लाने के लिए 29 अक्टूबर को स्टेट डिजास्टर प्रिपेयर्डनेस डे मनाया जाता है। ओडिशा सरकार ने आपदाओं को गंभीरता से लेने के लिए ही 2010 में अपने प्रशासनिक विभाग का नाम बदलकर रिवेन्यू एंड डिजास्टर मैनेजमेंट डिपार्टमेंट रख दिया था।
डिजास्टर रैपिड एक्शन फोर्स बनाने वाला पहला राज्य है ओडिशा
ओडिशा पहला राज्य है जहां आपदाओं से निपटने के लिए डिजास्टर रैपिड एक्शन फोर्स का गठन किया गया। यहां 40-45 सदस्यों की 10 टीमें हमेशा तैनात रहती हैं। ऐसी ही 10 अन्य टीमों का गठन किया जा रहा है। पानी में डूबे लोगों को बचाने के लिए स्कूबा डाइवर हैं। अभी तक 82 लोगों को गोता लगाकर डूबे लोगों को ढूढ़ने व निकालने की ट्रेनिंग दी जा चुकी है।
तटीय लोगों को दूर बसाने के लिए जमीन और पैसे दिए
ओडिशा ने तट पर बसे 17 हजार ग्रामीणों को एक हजार वर्गफीट जमीन दी। उस पर पक्का मकान बनाने के लिए 3-3 लाख रुपए दिए। उन्हें तट से पांच किमी दूर मकान बनाने को कहा गया, ताकि सुरक्षित रहें। ऊंची लहरों से बचाने के लिए 58 किमी सीलाइन एम्बैंकमेंट बनाए गए हैं।
122 अर्ली वार्निंग सिस्टम, 1 बटन से बजेगा सायरन
ओडिशा सरकार समुद्र के किनारे 122 स्थानों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगा रही है। इसका काम जुलाई तक पूरा हो जाएगा। इनका नियंत्रण भुवनेश्वर में बने सेंट्रल कंट्रोल रूम से होगा। सिर्फ एक बटन से पूरे कोस्टल एरिया में सायरन बजने लगेगा।
यूएन ने किया सम्मानित, वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस ने भी सराहा
यूएन 2013 में फेलिन साइक्लोन में आपदा प्रबंधन के लिए ओडिशा को सम्मानित कर चुका है। इसी तरह 2016 में डिजास्टर रिस्क रिडक्शन पर जापान में हुई वर्ल्ड कांफ्रेंस में ओडिशा मॉडल की सबसे अधिक तारीफ हुई।





