अनिल अंबानी से भी ज्यादा अमीर है बिहार का यह शख्स, लोग कहते थे ‘पढ़े फारसी बेचे तेल

पटना. फोर्ब्स इंडिया द्वारा जारी भारत के सबसे अमीरों की लिस्ट में बिहार के संप्रदा सिंह (43वां स्थान) ने अनिल अंबानी (45 वां स्थान) को पीछे छोड़ दिया। एक वक्त ऐसा भी था जब 3.3 बिलियन डॉलर (21 हजार 486 करोड़ रुपए) के मालिक संप्रदा सिंह का गांव के लोग मजाक उड़ाते थे। पढ़ लिखकर खेती करने आए संप्रदा सिंह को देख गांव के लोग कहते थे ‘पढ़े फारसी बेचे तेल, देखो रे संप्रदा का खेल।’ खेती करनी चाही तो पड़ा अकाल…अनिल अंबानी से भी ज्यादा अमीर है बिहार का यह शख्स, लोग कहते थे 'पढ़े फारसी बेचे तेल

– 91 साल के संप्रदा सिंह का जन्म बिहार के जहानाबाद जिले के मोदनगंज प्रखंड के ओकरी गांव में एक किसान परिवार में हुआ था।
– DainikBhaskar.com की टीम उनके गांव पहुंची। उनके घर के दरवाजों पर ताला लगा है। मुख्य गेट भी बंद है। घर के दरवाजों पर पड़ी धूल की परत और बरामदे में उगी घास यह बताती है कि सालों से यहां कोई नहीं आया।
– गांव के लोग कहते हैं कि संप्रदा सिंह यहां अंतिम बार 2004 में आए थे। अब वह बिहार आते हैं तो पटना स्थित अपने घर में ही ठहरते हैं।

खेती करनी चाही तो पड़ा अकाल

– संप्रदा सिंह के पिता के पास करीब 25 बीघा जमीन थी। पड़ोसी, देवेंद्र शर्मा और नवल शर्मा ने बताया कि संप्रदा पढ़ने में शुरू से ही काफी तेज थे। घोसी स्थित हाई स्कूल में पढ़ने के बाद उन्होंने इंटर किया और गया जाकर बीकॉम की डिग्री ली।
– पढ़ाई पूरी कर वो गांव आए और आधुनिक तरीके से खेती करने की कोशिश की। वह धान और गेंहूं की जगह सब्जी की खेती करना चाहते थे।
– खेती शुरू की तो उनके सामने सबसे बड़ी परेशानी सिंचाई की आई। बारिश कम होने के चलते गांव से होकर बहने वाली फल्गु नदी में पानी कम था।
– संप्रदा ने डीजल से चलने वाला वाटर पंप लोन पर लिया और उससे सब्जी की सिंचाई करने की कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हुए। उसी साल अकाल पड़ गया। इंसानों और जानवरों के पीने के लिए पानी नहीं मिलता था तो खेती कहां से होती।

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स्कूल में बच्चों को पढ़ाया

– खेती न हो पाई तो संप्रदा सिंह ने एक प्राइवेट हाई स्कूल में टीचर की नौकरी कर ली। उन्हें बेहद कम सैलरी मिलती थी, जिससे खर्च चलाना मुश्किल था।
– कुछ समय तक टीचर के रूप में बच्चों को पढ़ाने बाद उन्होंने यह जॉब भी छोड़ दी और पटना जाकर बिजनेस करने का फैसला किया।

पहले खोली छाते का दुकान

– पटना आकर संप्रदा सिंह ने बीएन कॉलेज के पास सड़क किनारे छाते का दुकान शुरू की। दुकान चलाते हुए उन्हें यह अहसास हुआ कि छाता दुकान में सिर्फ गर्मी और बरसात के मौसम में भी आमदनी होती है।
– उन्होंने यह काम छोड़ दिया और एक संबंधी की दवा दुकान पर काम करने लगे। व्यवहार कुशलता के चलते पीएमसीएच के डॉक्टरों से संप्रदा सिंह का अच्छा संपर्क हो गया था।
– उन्होंने लक्ष्मी पुस्तकालय के मालिक लक्ष्मी शर्मा के साथ खुदाबक्श लाइब्रेरी के पास दवा की दुकान शुरू की। वह हॉस्पिटल में दवा की सप्लाई भी करने लगे।

– दुकान अच्छी चली, लेकिन कुछ समय बाद दोनों पार्टनर के बीच पैसे को लेकर विवाद हो गया। लक्ष्मी शर्मा चाहते थे कि कम से कम पैसा उधार दिए जाएं।

– दूसरी ओर संप्रदा सिंह का कहना था कि बिना उधार दिए व्यापार नहीं बढ़ सकता।
– लक्ष्मी शर्मा जब इसपर सहमत नहीं हुए तो दोनों अलग हो गए। इसके बाद संप्रदा सिंह ने अपने दोस्तों से पूंजी लेकर खुद की दुकान अल्केम फर्मा खोली।
– वह दवा कंपनियों की एजेंसी लेकर पूरे बिहार में दवा की सप्लाई करने लगे। संप्रदा सिंह की दवा एजेंसी अच्छी चल रही थी, लेकिन वह इतने से संतुष्ट होने वाले नहीं थे। वह अपने सपनों को उड़ान देने के लिए मुंबई चले गए।

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एक लाख रुपए से शुरू की कंपनी

– संप्रदा सिंह एक लाख रुपए पूंजी लेकर मुंबई गए और दवा कंपनी शुरू करनी चाही। लोगों ने फिर उनका मजाक उड़ाया। कहा कि एक लाख में दवा कंपनी और फैक्ट्री कैसे बन सकती है। यह संभव नहीं।
– दूसरों की बातों पर ध्यान दिए बिना उन्होंने अल्केम नाम की कंपनी बनाई और दूसरे की दवा फैक्ट्री में अपनी दवा बनवाई।
-डॉक्टरों से संबंध अच्छे रहने के कारण उनकी दवा बिहार में तेजी से बिकने लगी।
– दवा की मांग इतनी बढ़ गई कि जल्द ही संप्रदा सिंह ने अपनी दवा फैक्ट्री शुरू कर दी। यहां से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

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