दिमाग को उम्र के असर से बचाने में ‘व्हाइट मैटर’ करता है सबसे बड़ा काम

बढ़ती उम्र के साथ सोचने और समझने की क्षमता कमजोर होने लगती है, लेकिन एक नई रिसर्च ने इस बात का खुलासा किया है कि हमारे दिमाग का एक खास हिस्सा इस नुकसान को काफी हद तक कम कर सकता है। शोध के अनुसार, बुजुर्गों के दिमाग को दुरुस्त रखने में ‘ग्रे मैटर’ और ‘व्हाइट मैटर’ की जुगलबंदी बेहद अहम भूमिका निभाती है।

ग्रे मैटर के नुकसान की भरपाई करता है ‘व्हाइट मैटर’
रिसर्च से यह दिलचस्प बात सामने आई है कि उम्र के साथ जब दिमाग में ग्रे मैटर का नुकसान होने लगता है, तो उसका दिमाग की सेहत पर बुरा असर पड़ता है, लेकिन अगर व्यक्ति का ‘व्हाइट मैटर’ अच्छी और स्वस्थ स्थिति में है, तो वह ग्रे मैटर के नुकसान से होने वाले इस नकारात्मक प्रभाव को कम करने में एक बड़े सहायक की तरह काम करता है।

दिमाग में कैसे काम करते हैं ये दोनों?
यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया के स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ता यिंगक्सु लियू ने इस प्रक्रिया को बहुत ही सरल शब्दों में समझाया है। उनके अनुसार, ग्रे मैटर और सुपरफिशियल व्हाइट मैटर शारीरिक रूप से एक-दूसरे के बेहद करीब होते हैं, लेकिन इनके काम बिल्कुल अलग होते हैं:

ग्रे मैटर: यह हमारे दिमाग में आने वाली जानकारियों को प्रोसेस करने का मुख्य काम करता है।
व्हाइट मैटर: यह सुपरफिशियल हिस्सा दिमाग के आस-पास के हिस्सों को आपस में संपर्क (संवाद) करने में मदद करता है।

कनेक्शन का मजबूत होना है ज्यादा जरूरी
शोधकर्ता लियू के अनुसार, रिसर्च के नतीजे एक बड़ा भ्रम दूर करते हैं। हमारी कॉग्निटिव हेल्थ सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करती कि हमारे दिमाग में कितना ग्रे मैटर बचा हुआ है। बल्कि, यह मुख्य रूप से इस बात पर भी निर्भर करती है कि दिमाग के इन हिस्सों को आपस में जोड़ने वाले तंत्र की हालत कितनी अच्छी है।

भारतीय बुजुर्गों पर आधारित है यह रिसर्च
यह महत्वपूर्ण अध्ययन ‘अल्जाइमर एंड डिमेंशिया: द जर्नल ऑफ द अल्जाइमर एसोसिएशन’ में प्रकाशित हुआ है। इस स्टडी के लिए खास तौर पर भारत के 60 साल और उससे अधिक उम्र के 459 बुजुर्गों के ब्रेन स्कैन और उनकी मानसिक क्षमता का गहराई से विश्लेषण किया गया।

इस रिसर्च के लिए इस्तेमाल किया गया डेटा ‘लॉन्गीट्यूडिनल एजिंग स्टडी इन इंडिया’ के लिए डिमेंशिया के ‘हार्मोनाइज्ड डायग्नोस्टिक असेसमेंट’ से जुटाया गया था।

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