कल्पना से परे गाजीपुर के संजय का काम, जानी दुश्मन भी करते एक-दूसरे से प्यार

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बेजुबानों के प्रति प्यार के कारण भले ही संजय सिंह से उनके रिश्तेदारों ने बड़ी दूरी बना ली है, लेकिन उनके स्नेह के कारण जानी दुश्मन भी उनके पास एक-साथ रहते हैं। उनके सानिध्य में बिल्ली, कुत्ते व लंगूर एक साथ रहते हैं। इनको देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।

गाजीपुर के संजय का जादू, जानी दुश्मन भी करते एक-दूसरे से प्यार

माना जाता है कि जानवरों में अपने दुश्मनों को देखकर समझदारी समाप्त हो जाती है। या तो वह खुद आपस में लड़ते हैं अथवा जान बचाकर भाग खड़े होते हैं लेकिन, पीरनगर निवासी संजय सिंह ने अपने दुलार से जानी दुश्मनों को एक छत के नीचे रहने के लिए विवश कर दिया है। संजय के घर के एक कमरे में कुत्ता, बिल्ली, बंदर रहते हैं और एक ही थाली में खाते हैं। वे कभी भी एक दूसरे से नहीं झगड़ते ना ही लड़ते। इन बेजुबानों के लिए वह नात-रिश्तेदारी तक किसी अवसर पर भी आना-जाना छोड़ दिए हैं।

उनके पास एक, दो, तीन नहीं बल्कि 16 प्रजातियों के 30 कबूतर, आठ बिल्ली, लंगूर, तोता, पांच कुत्ते और शाही सहित तमाम प्रजातियों के पंक्षी और जानवर हैं। खास यह कि उनमें ममत्व ऐसा कि चिडिय़ा, तोता, शाही, कबूतर, बिल्ली-कुत्ता बंदर जो एक-दूसरे के जानी दुश्मन माने जाते हैं वह भी एक साथ संजय के दुलार के छांव में रहते हैं। किसी के प्रति किसी में नफरत के कोई भाव नहीं। संजय भी दिन-रात, सुबह-शाम, उठते-बैठते सिर्फ इन्हीं जानवरों और पक्षियों के बारे में सोचते हैं, उन्हीं के लिए काम करते हैं। वे ये कहने से जरा-सा भी नहीं झिझकते कि ये सारे जानवर और पक्षी उनके बच्चे हैं और वे इन सब की ‘मां’।

 

कल्पना से परे इनका काम

पशु-पक्षियों के प्रति संजय सिंह की ममता, उनका प्यार-दुलार, त्याग और वात्सल्य कई लोगों के लिए कल्पना से परे है लेकिन जीवन में उनको दुख और पीड़ा काफी मिली। इंसानों से प्यार नहीं, नफरत मिला और यही बड़ी वजह भी रही कि उन्होंने पशु-पक्षियों से प्यार किया। उन्हीं के लिए अपना जीवन भी समर्पित किया। संजय के पिता बीएसएनएल में कर्मचारी थे। एक साल की उम्र में पिता देवमुनी सिंह का निधन हो गया।

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मां सुशीला लाल को आंचल में छिपाकर पति की जगह नौकरी करना शुरू की। धीर-धीरे संजय बड़े हुए तो मां का दुख भी कटने लगा। घर में बेटे के अलावा किसी के नहीं होने के चलते वे पशु-पक्षी पालीं। संजय दिन भर उन्हीं के साथ रहना शुरू किए। बचपन से ही उन्हें पशु-पक्षियों से इतना लगाव हो गया कि आज उनका घर मिनी चिडिय़ा घर हो गया है। सुबह चिडिय़ों की चहचहाहट, कबूतर की घूंटूर-घूंटूर की आवाज लोगों को इतना मंत्रमुग्ध कर देती है की लोग बरबस संजय के घर खिंचे चले जाते हैं।

जिसका नाम लेते हैं, वहीं आता सामने

संजय सिंह सभी के नाम रखे हैं। बिल्लियों का नाम सोनी, मोनी, टोनी और कुत्तों का भी नाम अलग-अलग रखें हैं। वे सुबह उठकर सबसे पहले पिजरों से उन्हें बाहर निकाल देते हैं। सभी जानवर उनके पास खड़े हो जाते हैं। वे जिसका नाम लेते हैं वही आगे आता है और अपने हिस्से का भोजन कर दूसरे स्थान पर जाकर बैठ जाता है। प्रतिदिन उनके भोजन में करीब ढाई से तीन हजार रुपये खर्च होते हैं। समय-समय पर सभी पशु-पक्षियों का वे चेकअप भी कराते हैं। अगर उन्हें किसी प्रकार की दिक्कत होती है तो चिकित्सक के उपचार कराते हैं।

तब दम तोड़ दिए थे पांच कुत्ते

संजय सिंह मुल रुप से मरदह थाना क्षेत्र के पृथ्वीपुर के निवासी हैं। वह पीरनगर में मकान बनवाकर काफी सालों से परिवार संग रह रहे हैं। वे सभासद भी रह चुके हैं। पिछले प्रधानी के चुनाव में उनकी पत्नी ज्योति सिंह ने जीत हासिल की थी। चुनाव में वे गांव में व्यस्त हुए तो कुत्तों ने खाना छोड़ दिया। एक-एक कर चार कुत्ते दम तोड़ दिए। चुनाव बीतने के बाद वे घर आए तो अकेले बचा कुत्ता उन्हें देखकर दौड़ा और वह भी उनके पैर पर सिर रखकर दम तोड़ दिया। उसकी मौत ने संजय को इतना झकझोर दिया कि वे कई दिनों तक न तो खाना खाए ना ही घर से निकले। 

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