तो क्या नहीं मिलेगा गुरु के इस चंद्रमा पर जीवन? नई स्टडी में मिला ऐसा नतीजा…!

पृथ्वी के बाहर जीवन की संभावनाएं खोजना खगोल वैज्ञानिकों का सबसे बड़ा मकसद होता है. वे जानना चाहते हैं कि स्पेस में पृथ्वी के बाहर, सौरमंडल में वो कौन सी जगहें हैं जहां जीवन के पनपने या टिकने की स्थितियां बन रही हैं. इसमें गुरु और शनि के चंद्रमाओं के कुछ हालात ने उम्मीद जताई है जिनमें गुरु के यूरोपा से काफी उम्मीदें हैं. पर हाल ही में एक नए अध्ययन में इन संभावानाओं को तब झटका लगा जब नासा के जूनो यान के उपकरणों से मिली जानकारी का अध्ययन से पता चला कि यूरोपा पर बन रही ऑक्सीजन की मात्रा उम्मीद से काफी कम है.
इस स्टडी में वैज्ञानिकों ने यूरोपा के वायुमंडल में ऑक्सीजन बनने की दर का गणना कर यह पाया कि यह पिछले अधिकांश अध्ययनों के अनुमानों से काफी कम है. हाल ही में नेचर एस्ट्रोनॉमी में प्रकाशित अध्ययन में जूनों के जोवियन औरोरल डिस्ट्रीब्यूशन एक्सपेरिमेंट (जेड) उपकरण से हासिल किए गए बर्फीले चंद्रमा से निकलने वाली हाइड्रोजन गैस को मापा.
इस आधार पर वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे कि यूरोपा में हर सेंकेड में 12 किलोग्राम प्रति सेकेंड की ऑक्सीजन बन रही है. जबकि पिछले अध्ययनों में यह मात्र एक हजार किलोग्राम प्रति सेकेंड की दर पाई गई थी. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह से पैदा होने वाली ऑकसीजन चंद्रमा की सतह के नीचे मेटाबॉलिक ऊर्जा का संभावित स्रोत बन सकती है.
लेकिन ऑक्सीजन पैदा होने की मात्रा के अनुमान में ये कमी एक तरह का झटका माना जा रहा है. क्योंकि अभी तक यूरोपा की बर्फीली सतह के नीचे किस तरह का हालात है, इस वैज्ञानिक केवल तार्किक और संभावित अनुमान ही लगा रहे है. वे इसकी पुष्टि करने की स्थिति में नहीं हैं. 3100 किलोमीटर चौड़े गुरु का यह चंद्रमा गैलीलियो के खोजे गए चार चंद्रमाओं से सबसे छोटा है.
फिलहाल गुरु ग्रह के अब तक 95 चंद्रमाओं का पता चला है और इनमें यूरोपा चौथा सबसे बड़ा चंद्रमा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि बर्फीली पर्पटी के नीचे नमकीन पानी वाला विशाल महासागर हो सकता है. ऐसा में वहां के हालात जानने के लिए वैज्ञानिक बहुत ही ज्यादा उत्सुक हैं. क्योंकि अगर इस तरह का महासागर है तो चंद्रमा की आंतरिक गर्मी से निश्चित तौर पर जीवन के पनपने के हालात बन सकेंगे. समय पर समय पर यूरोपा की सतह पर फूटने वाले झरने भी इसी धारणा को बल देते हैं.





