सामने आई सचिन तेंदुलकर की ऐसी तस्वीर जिसके बारे में जानकर, फैन्स के आंखो में आ जाएगे आंसू…

जिक्र भी होगा। सचिन ने अपनी जिंदगी के हर खास लम्हे को एक किताब की शक्ल दी है, जिसमें उन्होंने क्रिकेट, करियर, रिश्ते, दोस्ती, विवाद, वर्ल्ड कप, रिटायरमेंट और भारत रत्न तक का सफर सिलसिलेवार लिखा है। फिल्म Sachin: A Billion Dreams से अलग, यहां वो 10 किस्से उनकी उसी किताब से पढ़िए। कुछ यादगार तस्वीरें भी हैं जिनके लिए खुद सचिन ने लिखा है। डक खाने से भाई अजीत ने रोक दिया…

किस्से, जो आगे आप पढ़ेंगे-

अंजली से पहली मुलाकात मुंबई एयरपोर्ट पर हुई। वे मेरे पीछे ऑटोग्राफ लेने के लिए दौड़ पड़ी थीं। वो चिल्ला रही थीं He is so cute…मैंने नहीं, उसी ने घरवालों से हमारी शादी की बात की थी। स्लाइड-2

एक बार सचिन जब विदेश दौरे से वापस लौटे तो उनकी बेटी सारा उन्हें पहचान नहीं पाई,और बड़ी मुश्किल से उनके पास आने के लिए तैयार हुई। स्लाइड-3

बड़े भाई अजीत ने एक बार सचिन को उनकी फेवरेट ‘क्रिस्पी एरोमेटिक डक’नहीं खाने दी थी। ऑर्डर आने के बाद कैंसिल करा दी थी। स्लाइड-5

सचिन को एक दुखद खबर देने के लिए पत्नी अंजली को रॉबिन सिंह और अजय जडेजा की मदद लेनी पड़ी थी क्योंकि वो जानती थीं कि ये खबर मिलते ही सचिन खुद को संभाल नहीं पाएंगे। स्लाइड 6

‘मैं खुद अच्छा कप्तान नहीं था, लेकिन देश को सबसे अच्छे कप्तान मैंने ही चुनकर दिए हैं।’ जानिए कौन हैं सचिन के वो फेवरेट कप्तान स्लाइड-7

जब सचिन ने हीरो कप के सेमीफाइनल में द.अफ्रीका पर मिली जीत के लिए खुद के योगदान से ज्यादा ‘एक नेवले’ को वजह माना था। स्लाइड 9

अंतिम टेस्ट मैच का वो सबसे इमोशनल पल…जिसे सचिन ने विराट के साथ शेयर किया था…स्लाइड-10

वीडियो: BBL में नया प्रयोग देख पूरी दुनिया हुई हैरान, ऐसे हुआ टॉस

जब आखिरी बार टीम बस से लौटते हुए मरीन ड्राइव पर फैंस के कहे गए वो शब्द मैं पूरी जिंदगी नहीं भूल सकता… स्लाइड 11

और आखिर में पढ़िए…

भारत रत्न मिला है… पता चला,तो सचिन-अंजलि शैम्पेन पी रहे थे…फिर पीते ही गए। एक बेहद खास शख्सियत ने उन्हें खुद फोन कर ये खुशखबरी दी थी।

अंजली- मेरे जीवन की सर्वश्रेष्ठ साझेदार

चिन ने अंजली को पहली बार अगस्त,1990 में मुंबई एयरपोर्ट पर देखा था। तब सचिन करियर के पहले इंग्लैंड टूर से लौटे थे।

एयरपोर्ट पर अंजली अपनी फ्रेंड के साथ मां को रिसीव करने पहुंची थीं। तभी उनकी दोस्त डॉ. अपर्णा की नजर घुंघराले बाल वाले सचिन पर पड़ी।

– तब अपर्णा ने सचिन की ओर इशारा करते हुए अंजली से कहा कि ये वही क्रिकेटर है जिसने इंग्लैंड में सेन्चुरी लगाई है। ये सुनते ही अंजली ने ऑटोग्राफ लेने के लिए उनके पीछे दौड़ पड़ी थीं। वो चिल्ला रही थीं He is so cute…

– वहीं,उसी लड़की को (जिसपर पहले सचिन की भी नजर पड़ी थी) पीछे भागता देख 17 साल के सचिन शरमा गए। वे नजरें नीची कर कार में बैठ गए क्योंकि तब उन्हें रिसीव करने दोनों भाई अजीत और नितिन आए थे।

– सचिन को देखने और उनसे बात करने की कोशिश में अंजली मां को रिसीव करना ही भूल गई थीं।

फोन पर हुई बात

– अंजली अब किसी भी तरह सचिन से बात करना और मिलना चाहती थीं। दोस्तों की मदद से उन्होंने सचिन का फोन नंबर निकाला और बात की।

– अंजली के अनुसार,जब मैंने फोन कर सचिन को बताया कि मैंने एयरपोर्ट पर उन्हें देखा था। इस पर सचिन बोले थे, ‘हां,मैंने देखा था। आप मेरे पीछे भाग रही थीं।’

अंजली ने की थी शादी की बात

– शर्मीले स्वभाव के कारण सचिन अपने घरवालों को अंजली के बारे में बता नहीं पा रहे थे। इसलिए ये जिम्मेदारी भी अंजली ने ही निभाई।

– सचिन जब न्यूजीलैंड टूर पर थे,तब अंजली ने उनकी फैमिली से शादी की बात की थी। यह पूरा प्लान सचिन का ही था।

– सचिन ने इसका खुलासा करते हुए कहा था,‘अंजली से शादी के बारे में परिवार से पूछना दुनिया के तेज-तर्रार बॉलर्स का सामना करने से भी ज्यादा कठिन था। इसलिए मैंने यह जिम्मा अंजली को सौंपा था।’

अंजली के लिए सचिन लिखते हैं-

‘बेहद अलग पृष्ठभूमि से आने के बावजूद तेंडुलकर परिवार में घुलना-मिलना अंजली के चरित्र और समर्पण के बारे में बहुत कुछ बयां कर देता है। सच कहूं,तो उसकी जितनी भी तारीफ की जाए,कम है। वह एक असाधारण स्टूडेंट थी औऱ उसका करियर भी असाधारण हो सकता था। लेकिन उसने मेरा साथ देने का फैसला किया और दो दशकों से ज्यादा समय से वह हर पल मेरे साथ रही है।

ऐसे मौके रहे हैं,जब मैं घर से दूर रहा और मैंने महीनों तक अपने बच्चों सारा और अर्जुन को नहीं देखा। इसमें कोई शक नहीं कि मैंने अपने परिवार के साथ कुछ सचमुच कीमती पल गंवा दिए। ज़ाहिर है,ऐसे अलगाव हर पेशेवर खिलाड़ी के जीवन का हिस्सा होते हैं,लेकिन मैं उनसे इसलिए गुजर पाया,क्योंकि मैं हमेशा जानता था कि अंजली वहां पर थी।’

‘मैं जो कर रहा था,उस पर उसे गर्व था। मैं हर समय उसकी राय ले सकता हूं। वह मेरी भावनात्मक चट्टान भी है,जिसकी ओर मैं हर पल मुड़ता हूं। मैं उसकी इतनी कद्र करता हूं कि बता नहीं सकता।’

2- फोन पर बात नहीं करते थे अर्जुन,सचिन के जाने के नाम से चिढ़ जाते…

’24 सितंबर 1999 को मुझे और अंजली को एक बेटे का वरदान मिला। मैंने उसका नाम अर्जुन रखने का निर्णय लिया। मुझे याद है कि अपने बेटे को पहली बार देखने के बाद जल्द ही मैंने अंजली के सामने अपने इस इरादे का एलान कर दिया था। उसने बाद में मुझे बताया कि उसने कई दूसरे नाम सोच रखे थे, लेकिन अर्जुन नाम के प्रति मेरे उत्साह को देखते हुए उसने मेरे चुने हुए नाम को स्वीकार कर लिया। मैंने उस दिन का फिल्मांकन किया और आज भी पहली बार अर्जुन को मेरे पास लाए जाने की रिकार्डिंग संजोकर रखता हूं।’

बच्चों को बड़े होते देखना कमाल की बात होती है और मैं कहना चाहूंगा कि मैं जब भी उनसे दूर रहा, तो मुझे उनकी बड़ी याद आई। अर्जुन के साथ यह खास तौर से मुश्किल था। वह मेरे जाने से चिढ़ जाता था और मुझसे फोन पर भी बात नहीं करता था। जब मैं दौरे पर होता था, तो अपने जीवन के शुरुआती 6 साल में अर्जुन ने मुझसे कभी बात नहीं की। उसकी आवाज़ सुनने के उतावलेपन में मैं अक्सर अंजली से आग्रह करता था कि वह उससे ‘हलो’ बुलवा दे, लेकिन वह हमेशा इनकार कर देता था। फिर मेरी वापसी पर वह खोए हुए समय की भरपाई करने के लिए तीन दिन तक मुझसे चिपका रहता था।

3- जब सांवले होने के चलते सचिन को पहचान नहीं पाई सारा-

‘हालांकि सारा मेरे जाने से उस तरह नहीं चिढ़ती थी, जिस तरह अर्जुन चिढ़ता था, लेकिन मेरे लौटने पर उसे कई मौकों पर मुझसे दोबारा बंधन जोड़ने में दिक्कत होती थी। सारा बस कुछ महीने की थी, जब मैं एक दौरे पर श्रीलंका गया। कोलंबो में बहुत गर्मी थी और जब मैं उस दौरे से लौटा, तो मेरी त्वचा का रंग बदल गया था। मैं सांवला हो गया था इसलिए वह मुझे पहचान नहीं पाई। उसने सोचा कि कोई अजनबी घर में आ गया है और पहले कुछ मिनट तक उसने मेरे करीब आने से भी इनकार कर दिया।’

‘जिस सदी के मोड़ पर मेरे बच्चों का जन्म हुआ, तब टेक्नोलॉजी आज जितनी एडवांस नहीं थी, इसलिए तब स्काइप या फेसटाइम के इस्तेमाल का विकल्प उपलब्ध नहीं था। अगर टेक्नोलॉजी होती, तो मुझे यकीन है मैंने अंजली से कहा होता कि वह सारा और अर्जुन को वेबकैम के सामने ले आए, ताकि मैं संसार के किसी भी दूसरे हिस्से में बैठकर कम से कम अपने बच्चों को देख तो लूं। इसका मतलब होता कि मैं उनमें होने वाले इतने सारे परिवर्तनों से अनजान नहीं रहता।’

सचिन ने ये जिक्र नहीं किया कि ये चोटिल चेहरे वाली तस्वीर कब और कहां की है। लेकिन शायद ही इससे पहले किसी ने देखी हो।

सचिन के साथ उनके भाई अजीत

4…जब अजीत भाई ने नहीं खाने दिया’डक’

मई- जून 1999,वर्ल्डकप इंग्लैंड-

‘अजीत, अंजली और सारा विश्वकप से पहले इंग्लैंड में थे और यह बहुत आरामदेह था। हम एक साथ लंच करने के लिए बाहर जाते थे और एक चाइनीज़ रेस्तरां में ऐसे ही एक डिनर मैंने क्रिस्पी एरोमेटिक डक का ऑर्डर दिया। यह मुझे बहुत पसंद है। पतले पैनकेक और कटी ककड़ी के साथ मैं इसकी एक पूरी प्लेट अपने दम पर साफ कर सकता हूं। लेकिन जैसे ही मैंने ऑर्डर दिया, अजीत भाई ने इसे बदलने के लिए कहा।

उन्होंने ऐलान किया कि वे वर्ल्डकप से पहले मुझे डक नहीं खाने देंगे। पहले तो मुझे यह रोचक लगा, लेकिन जल्दी ही मुझे एहसास हो गया कि वे गंभीर थे और मैं उनकी बात मानने के लिए बाध्य हो गया। जब मैंने उनसे कारण पूछा तो वे बोले कि उन्होंने एक लेख पढ़ा था, जिसमें लिखा था कि तीन ब्रिटिश खिलाड़ी एक डिनर के लिए बाहर गए थे और उन सभी ने डक खाई थी। बाद में उनमें से हर खिलाड़ी शून्य पर आउट हो गया।

ज़ाहिर है, क्रिकेट में ‘डक’ का संबंध बल्लेबाज के शून्य बनाने से होता है और ऑस्ट्रेलिया के टेलीविजन कवरेज में अगर कोई बल्लेबाज बगैर कोई रन बनाए आउट हो जाता है, तो उसके पवेलियन जाते समय एक बतख को भी साथ जाते दिखाया जाता है। अजीत भाई ने मुझसे कहा कि विश्वकप के बाद मैं जी भरकर जितनी चाहे उतनी डक खा सकता हूं, लेकिन पहले नहीं…।’

आसमान की तरफ देखते हुए सचिन ने ये शतक पिता को समर्पित किया, जिनका मैच से 1 हफ्ते पहले ही देहांत हुआ था।

5- पिता की मौत की खबर अंजली,रॉबिन और अजय जडेजा ने दी

– मई-जून 1999इंग्लैंड विश्वकप

इंग्लैंड विश्वकप के दौरान ही मेरे पिता (रमेश तेंडुलकर) का निधन हो गया था। अंजली सारा को लेकर लंदन में थीं, लेकिन अजीत भाई मुंबई पहुंच चुके थे। उन्होंने अंजली को फोन करके कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से मुझे यह खबर दे। अंजली ने मेरे टीम के दो साथियों रॉबिन सिंह और अजय जड़ेजा को फोन करके बताया कि वे मेरे कमरे के बाहर रहें।वो 18 मई की रात टीम होटल में बहुत देर से आई- टूर्नामेंट के हमारे दूसरे मैच के एक दिन पहले, जो जिम्बाव्वे के खिलाफ होने वाला था। उसने होटल मैनेजर को भी फोन करके कह दिया था कि वह कमरे में कोई फोन ट्रांसफर न करे।

जब मैंने आधी रात के बाद दरवाज़ा खोला और उसे अजय और रॉबिन के साथ खड़े देखा तो मुझे तुरंत आभास हो गया कि कोई गंभीर घटना हो गई है। अंजली की कही बात पर मुझे यकीन नहीं हुआ। यह एक निर्मम प्रहार था और इसकी मुझे कतई उम्मीद नहीं थी। इससे कुछ मिनट तक मेरे हाथ-पांव फूल गए और मैं स्तब्ध रह गया। मेरे मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला। मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया और मैं अंजली के गले लगकर रोने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाया।मैं असहाय महसूस कर रहा था और कुछ समय तक सदमे को झेलना मेरे वश में नहीं था।

मेरा पहला विचार यह था कि अपनी मां के साथ रहने और पिताजी को आखिरी बार देखने के लिए जल्दी से जल्दी भारत चला जाऊं। मार्क मस्कारेन्यंस ने हमेशा की तरह अगली सुबह के सारे इंतजाम पहले से ही कर दिए थे और वे हम दोनों (मुझे और अंजली) को सुबह होने से पहले कार में हीथ्रो तक छोड़ने आए। वास्तव में, मैं यकीन नहीं कर पाया कि वे अब जीवित नहीं हैं और मुझे लग रहा था कि मेरे भारत लौटने पर वे दोबारा आंखें खोल लेंगे। मैं उन्हें दोबारा कभी नहीं देख पाऊंगा यह विचार मैं किसी तरह बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था।

जब मैं घर लौटा, तो मैंने देखा कि पिछले कुछ दिनों में मां की उम्र काफी बढ़ गई थी और वे दीवार के सामने बैठी थीं। उन्होंने किसी से एक शब्द भी नहीं कहा और वे सदमे की अवस्था में थीं। मुझे मां की यह हालत देखकर बहुत बुरा लगा और ज्यादा चिंता की बात यह थी कि वे दो दिनों से अपनी जगह से हिली भी नहीं थीं।यह असहनीय हो गया, जब मैं दादी के सामने पहुंचा, जिन्होंने अपना बेटा खो दिया था। उन्होंने मुझसे कहा कि वे अपने बेटे के साथ शांति के कुछ पल बिताना चाहती हैं औऱ मैंने तुरंत सभी मौजूद लोगों से कहा कि वे हमें कुछ समय के लिए अकेला छोड़ दें। मैं दादी के साथ उस कमरे में गया, जहां पिताजी का शरीर रखा हुआ था, फिर मैंने उन्हें शांति में अपने बेटे के पास शोक करने के लिए छोड़ दिया।

अपनी सबसे बड़ी प्रेरणा को खोने के बाद मैं कई रात तक सो नहीं पाया। और यह हम सभी के लिए एक गहन भावनात्मक पल था, जब चौकीदार, डाकिया औऱ वे सभी लोग, जिनकी उन्होंने अपने जीवनकाल में मदद की थी, उनकी अंत्येष्टि में आए। मैंने अंत्येष्टि से पहले अपने चेहरे वाला सोने का सिक्का भी उनकी जेब में रख दिया था ताकि मैं हमेशा उनके साथ रहूं।पिताजी के बिना मेरा जीवन कभी पहले जैसा नहीं रहने वाला था।

अपने तीन कप्तानों के साथ सचिन, जिन्हें खुद उन्होंने ही चुनकर देश को दिया था।

सचिन ने बनवाया गांगुली,द्रविड़,कुंबले और धोनी को कप्तान

सचिन की कप्तानी पारी भले ही ज्यादा खास न रही हो, लेकिन उन्होंने जिन खिलाड़ियों को कप्तान बनवाया या समर्थन किया, उनके लिए आत्मकथा में खुलकर लिखा है। वे लिखते हैं-

‘ऑस्ट्रेलिया से लौटने के कुछ सप्ताह बाद ही मैंने बीसीसीआई अध्यक्ष एसी मुथैया औऱ चयन समिति को बता दिया था कि मैं कप्तानी छोड़ना चाहता हूं। वह टीम के सर्वश्रेष्ठ हित में था कि मैं बागडोर सौरव को थमा दूं और अपनी बल्लेबाज़ी पर ध्यान केंद्रित करूं। साथ ही, हम भारतीय कप्तानी उन पर अचानक थोपना नहीं चाहते थे, जिससे वे विचलित हो जाएं। सौरव को दबावों का अभ्यस्त होने के लिए थोड़े समय की जरूरत थी और यह सुनिश्चित करना मेरी जिम्मेदारी थी कि वह परिवर्तन सुचारू हो। इसलिए मैंने चयनकर्ताओं को बता दिया कि मैं जनवरी 2000 में साउथ अफ्रीका के खिलाफ दो घरेलू टेस्ट मैचों में टीम का नेतृत्व करने के लिए खुशी-खुशी तैयार हूं। यह सहमति बनी कि टेस्ट श्रृंखला के बाद सौरव पांच मैचों की एक दिवसीय श्रृंखला में कप्तानी की बागडोर संभाल लेंगे।’

दोबारा नहीं की कप्तानी

‘2000 की शुरूआत में कप्तानी छोड़ने के बाद मैंने फिर कभी भारत की कप्तानी नहीं की। इसका मतलब यह नहीं कि मुझे इसके बाद टीम की कप्तानी करने का मौका नहीं मिला। दरअसल, इस पद का प्रस्ताव कई बार रखा गया, लेकिन मेरे मन में इसका प्रलोभन कभी नहीं जागा। ऐसा एक मौका तब आया, जब सितंबर 2007 में राहुल द्रविड़ इंग्लैंड दौरे के बाद कप्तानी से हट गए थे।’

‘अंतिम बार मेरे सामने कप्तानी का प्रस्ताव तब रखा गया, जब 2008 में अनिल (कुंबले) की कप्तानी का अंत हुआ। हम ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एक घरेलू श्रृंखला के मध्य में थे औऱ अनिल के रिटायरमेंट ने एक भारी शून्य छोड़ दिया था। इस बार मैंने एमएस धोनी की सिफारिश की। इससे पहले मैं 20-20 विश्व कप के लिए उन्हें कप्तान बनाने की सिफारिश कर चुका था और टेस्ट मैच में कप्तानी एक स्वाभाविक प्रगति थी।’

मैंने कप्तानी छोड़ने के बाद जितने भी लोगों की सिफारिश की या जिनके नेतृत्व में खेला- सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, अनिल कुंबले या एमएस धोनी- उनके साथ मेरा संबंध अच्छा था और जब मुझे जरूरी लगता था, तो मैं उन्हें अपनी राय देता और फिर अंतिम निर्णय उन पर छोड़ देता था।

Back to top button