पद्म पुराण की कथा के अनुसार महिष्मान नाम का एक राजा था। जिसका ज्येष्ठ पुत्र लुम्पक पाप कर्मों में अक्सर लिप्त रहता था। इससे क्रोधित होकर राजा महिष्मान ने अपने पुत्र को देश से बाहर निकाल दिया। इसके पश्चात्लु लुम्पक जंगल में रहने लगा।
एक बार लुम्पक पौष कृष्ण दशमी की रात में अत्यधिक ठंड के कारण वह सो न सका और सुबह होते होते ठंड के चलते बेहोश हो गया। आधा दिन बीतने के पश्चात् जब उसकी बेहोशी दूर हुई, तब वह जंगल से फल इकट्ठा करने लगा। सूर्यास्त के बाद वह अपनी किस्मत को कोसते हुए भगवान को याद करने लगा। एकादशी की रात भी अपने दुःखों पर विचार करते हुए लुम्पक सो न सका।
इस तरह अनजाने में ही लुम्पक से सफला एकादशी का व्रत पूरा हो गया। इस व्रत के प्रभाव से लुम्पक सुधर गया और उसके पिता महिष्मान ने उसे अपना सारा राज्य सौंप दिया और खुद तपस्या के लिए चले गये। धर्मपथ पर चलते हुए लुंपक ने कई वर्षों तक शासन किया और उसके पश्चात् वह भी तपस्या करने चला गया और मृत्यु के पश्चात उसे विष्णुलोक में स्थान प्राप्त हुआ।