सभी पापों से चाहते हैं मुक्ति, तो मोहिनी एकादशी के दिन करें इस कथा का पाठ

हर महीने में दो बार एकादशी व्रत किया जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को करने से साधक को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। इस बार यह व्रत आज यानी 27 अप्रैल को किया जा रहा है।
इस दिन पूजा के दौरान व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए। इससे साधक को सभी पापों से मुक्ति मिलती है। साथ ही भगवान विष्णु की कृपा बरसती है। अगर आप भी श्री हरि का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं, तो मोहिनी एकादशी के दिन कथा का पाठ जरूर करें।
मोहिनी एकादशी की कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha)
पौराणिक कथा के अनुसार, सरस्वती नदी के पास के नगर था, जिसका नाम भद्रावती था। इस नगर के राजा का नाम धृतिमान था। इस नगर में एक धनी वैश्य धनपाल रहता था। वह बहुत परोपकारी और भगवान विष्णु भक्त था। उसके 5 पुत्र थे। सबसे छोटा बेटा धृष्टबुद्धि पापी था।
वह जुआ खेलता था। इस तरह से वह पिता की धन-संपत्ति को बर्बाद कर देता था। इस समस्या से परेशान होकर पिता ने उसे घर से निकाल दिया। इसके बाद वह दर-दर भटकने लगा। उसके पास कुछ भी खाने के लिए नहीं था। वह चोरी करने लगा। राजा ने उसे कारागार में डाल दिया। बाद में उसे नगर से बाहर निकाल दिया गया।
एक बार वह जंगल में भटकते हुए कौण्डिन्य ऋषि के आश्रम में पहुँचा। उसने ऋषि से अपने पापों से छुटकारा पाने के लिए कोई उपाय पूछा। ऐसे में ऋषि कौण्डिन्य ने उसे वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। ऋषि ने कहा कि इस व्रत को करने से जन्म-जन्मांतर के सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।
इसके बाद उसने विधिपूर्वक मोहिनी एकादशी व्रत किया। इस व्रत को करने से उसे सभी पापों से मुक्ति मिली और भगवान विष्णु के लोक ‘वैकुण्ठ’ को प्राप्त हुआ।
विष्णु मंत्र
- ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु ।
यद्दीदयच्दवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्”।।
- वृंदा,वृन्दावनी,विश्वपुजिता,विश्वपावनी |
पुष्पसारा,नंदिनी च तुलसी,कृष्णजीवनी ।।
एत नाम अष्टकं चैव स्त्रोत्र नामार्थ संयुतम |
य:पठेत तां सम्पूज्य सोभवमेघ फलं लभेत।।
- ॐ वासुदेवाय विघ्माहे वैधयाराजाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात् ||
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे अमृता कलसा हस्थाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात् ||





