कितना पहले बताया जा सकता है कि भूकंप आने वाला है?

दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) समेत उत्तर भारत के कई इलाके सोमवार को भूकंप से हिल गए. करीब साढ़े 10 बजे आए इस भूकंप के झटके लगभग 15 सेकंड तक महसूस किए गए. रिक्टर स्केल पर इसकी तीव्रता 5.8 थी. भूकंप का केंद्र उत्तराखंड में देहरादून से उत्तर पूर्व में 114 किलोमीटर दूर स्थित रुद्रप्रयाग के पास था. इसी कस्बे से कुछ दूर स्थित गुप्तकाशी में झटकों के चलते दीवार गिरने से एक महिला की मौत की भी खबर है.

मानव इतिहास और लोकस्मृति में भूकंप डरावने आंकड़ों और भयावह व्याख्या के साथ दर्ज होता रहा है. 2015 में नेपाल में आए भूकंप ने करीब नौ हजार लोगों की जान ले ली थी. 21वीं सदी में भूकंपजनित हादसों में अब तक कुल सात लाख से भी ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है. इनमें हैती में 2010 में आया वह भूकंप भी शामिल है जिसने करीब तीन लाख जिंदगियां लील ली थीं.
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सोमवार रात को आए भूकंप के बाद से जो खबरें आ रही हैं उनमें एक यह भी है कि खतरा अभी टला नहीं है. देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के मुताबिक उत्तर भारत खासकर उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पंजाब के इलाके में अभी और भी शक्तिशाली भूकंप आने की संभावना हर समय बनी हुई है. संस्थान के मुताबिक इसकी प्रमुख वजह है इस इलाके में जमीन के नीचे मौजूद विशाल दरारों यानी टेक्टॉनिक प्लेट्स में लगातार तनाव की स्थिति.
भूकंप का सामना करने वाले समाजों में इस तरह की कई धारणाएं रही हैं कि कुत्ते, चूहे या मेंढ़क जैसे कई जानवरों को इसका पहले आभास हो जाता है.
‘उत्तर भारत में अगला भूकंप रात 8.06 बजे आएगा. इसकी तीव्रता 8.2 होगी. यह नासा की खबर है. प्लीज इस मैसेज को जितना हो सके फॉरवर्ड करें.’ अप्रैल 2015 में नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के एक दिन बाद फेसबुक और व्हाट्सऐप पर इस मैसेज का सैलाब आ गया था. हालत यह हो गई कि सरकार को कहना पड़ा कि यह शरारती तत्वों द्वारा फैलाई गई अफवाह है और भूकंप की पहले से भविष्यवाणी नहीं की जा सकती.
क्या सच में ऐसा है? विज्ञान की इतनी आधुनिकताओं के बावजूद क्या यह अब भी संभव नहीं है कि भूकंप का पूर्वानुमान लगाया जा सके? समय रहते जान-माल का नुकसान कम किया जा सके?
भूकंप का सामना करने वाले समाजों में इस तरह की कई धारणाएं रही हैं कि कुत्ते, चूहे या मेंढ़क जैसे कई जानवरों को इसका पहले आभास हो जाता है. बताते हैं कि 2009 में इटली के ला अकीला नामक एक कस्बे में आए एक भयानक भूकंप से तीन दिन पहले एक तालाब के मेंढ़क अचानक उसे छोड़कर भाग गए थे. यह जगह भूकंप के केंद्र से 76 किमी दूर थी. यह भी कहा जाता है कि चीन के हाइचेंग शहर में 1975 में आए भूकंप से एक महीना पहले ही कई सांप देखे जाने लगे थे. वह सर्दियों का मौसम था जब सांप बिलों में ही रहना पसंद करते हैं. इस लिहाज से उनका यह बर्ताव हैरत भरा था.
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यह भी माना जाता है कि कुत्तों को भूकंप का पहले से पता चल जाता है और वे भौंकने लगते हैं. जर्मन भूगर्भ विज्ञानी उलरिश श्राइबर के मुताबिक लाल चींटियों को पहले से ही भूकंप का पता चल जाता है. श्राइबर के मुताबिक ये चींटियां उन इलाकों में टीले बनाती हैं जहां धरती के नीचे मौजूद टेक्टोनिक प्लेटें आपस में जुड़ती हैं. उनका कहना था कि ऐसी जगहों पर निकलने वाली गैस से चींटियों के टीले गर्म रहते हैं. उनके मुताबिक ऐसी जगहों पर मौजूद नमी भी चींटियों को रास आती है. श्राइबर की बातों को कई वैज्ञानिकों ने खारिज कर दिया था. बाकी धारणाओं की पुष्टि करता भी कोई ठोस वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है.
1970 के दशक में वैज्ञानिक मानते थे कि भूकंपों का पूर्वानुमान लगाने वाली तकनीक जल्द ही ढूंढी जा सकती है. लेकिन लगातार नाकामयाब होती कोशिशों के बाद 1990 तक उनका उत्साह ठंडा पड़ गया.
जानवरों के व्यवहार को छोड़ दें तो क्या इससे इतर भी कोई ऐसी तकनीक अब तक ढूंढी जा सकी है जिससे भूकंप का पहले से पता लगाया जा सके? दरअसल 1970 के दशक में वैज्ञानिक मानते थे कि भूकंपों का पूर्वानुमान लगाने वाली तकनीक जल्द ही ढूंढी जा सकती है. लेकिन लगातार नाकामयाब होती कोशिशों के बाद 1990 तक उनका उत्साह ठंडा पड़ गया. एक बड़ा वर्ग यह मानने लगा कि पृथ्वी खुद को अपने ही तरीके से संभालती है जिसमें कोई पैटर्न ढूंढना लगभग नामुमकिन है. टेक्टॉनिक प्लेट्स में हुई कोई छोटी सी हरकत बड़े भूकंप में तब्दील हो भी सकती है और नहीं भी.
हालांकि स्थिति पूरी तरह निराशाजनक हो ऐसा नहीं है. वैज्ञानिक मानते हैं कि भूकंप के केंद्र में तो नहीं, लेकिन उसके दायरे में आने वाले इलाकों में कुछ सेकेंड पहले यह भविष्यवाणी की जा सकती है कि भूकंप आने वाला है. लेकिन कुछ सेकेंड से क्या फर्क पड़ सकता है? जानकार बताते हैं कि भूकंप का अक्सर ही सामना करने वाले जापान में कुछ सेकेंड पहले भूकंप का पता लगा लिया जाता है. इससे और कुछ हो न हो, लेकिन बुलेट ट्रेन और परमाणु संयंत्र एक स्वचालित यानी ऑटोमेटेड व्यवस्था के तहत खुद रुक जाते हैं.
जानकारों के मुताबिक भूकंप के समय दो तरह की तरंगें निकलती हैं. पहली तरंग करीब छह किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से चलती है. दूसरी तरंग औसतन चार किलोमीटर प्रति सेकेंड के वेग से. इस फर्क के चलते प्रत्येक 100 किलोमीटर पर इन तरंगों में आठ सेकेंड का अंतर हो जाता है. दूसरे शब्दों में कहें तो भूकंप के केंद्र से 100 किलोमीटर की दूरी पर आठ सेकेंड पहले इसकी भविष्यवाणी की जा सकती है. भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देशों मे इससे काफी मदद मिल जाती है.





