हम जरूरत से ज्यादा भरोसा क्यों कर लेते हैं और कब यह खतरा बन जाता है?

रिश्तों की शुरुआत और उनकी उम्र, दोनों ही भरोसे पर निर्भर करती हैं। विश्वास के बिना किसी भी रिश्ते का टिकना नामुमकिन है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब यही भरोसा हद से ज्यादा बढ़ जाता है, तो यह हमारी ताकत के बजाय हमारी सबसे बड़ी कमजोरी क्यों बन जाता है?
आइए, दिल्ली के पीएसआरआई अस्पताल की कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट, अर्पिता कोहली से समझते हैं कि हम क्यों लोगों पर जरूरत से ज्यादा यकीन कर लेते हैं और यह कब खतरनाक हो जाता है।
हम बिना सोचे-समझे यकीन क्यों करने लगते हैं?
हम इंसान अकेले नहीं रह सकते। हमें समाज, अपनों के प्यार और सुरक्षा की हमेशा जरूरत होती है। बचपन से ही हमारे मन में यह बात बिठा दी जाती है कि परिवार और करीबी लोग हमारे अपने हैं, इसलिए उन पर विश्वास करना चाहिए। धीरे-धीरे यही बात हमारी आदत में ढल जाती है। इसी आदत के कारण हम कई बार बिना गहराई से सोचे दूसरों पर भरोसा कर बैठते हैं।
मदद करने वालों की कमियों को अनदेखा करना
जब हम किसी परेशानी में होते हैं और कोई हमारी मदद के लिए आगे आता है, तो हम स्वाभाविक रूप से उस इंसान के करीब महसूस करने लगते हैं। हम यह मान लेते हैं कि जो व्यक्ति हमारा भला सोचता है, वह हमें कभी नुकसान नहीं पहुंचाएगा। इस सोच के कारण हम उस इंसान की बुराइयों या उससे जुड़े किसी भी खतरे को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं, जो बाद में गलत भी साबित हो सकता है।
हमारी अपनी मानसिक स्थिति का प्रभाव
जरूरत से ज्यादा भरोसा करने के पीछे कई बार हमारी खुद की मानसिक स्थिति भी जिम्मेदार होती है:
अकेलापन और कॉन्फिडेंस की कमी: जो लोग खुद को अकेला महसूस करते हैं या जिनमें आत्मविश्वास की कमी होती है, वे अक्सर दूसरों का सहारा जल्दी ढूंढते हैं। किसी का थोड़ा सा साथ मिलने पर ही वे पूरी तरह निर्भर हो जाते हैं।
जरूरत से ज्यादा पॉजिटिव सोच: कुछ लोग स्वभाव से ही इतने अच्छे होते हैं कि उन्हें हर इंसान में सिर्फ अच्छाई ही नजर आती है। यह हद से ज्यादा सकारात्मक सोच भी उन्हें बिना जांचे-परखे भरोसा करने पर मजबूर कर देती है।
जब विश्वास बन जाता है एक बड़ा खतरा
भरोसा तब मुसीबत का कारण बनता है, जब हम इसके बीच का संतुलन खो देते हैं। जब हम किसी को अपने जीवन में बहुत अधिक अधिकार दे देते हैं और अपनी कोई सीमा नहीं रखते, तो सामने वाले को हमारी हर कमजोरी पता चल जाती है। ऐसे में ‘अंधा भरोसा’ जन्म लेता है, जहां हम सामने वाले की हर बात को सच मानकर, खतरे के साफ इशारों को भी अनदेखा कर देते हैं। इसका परिणाम कई रूपों में भुगतना पड़ सकता है:
पैसों से जुड़ी धोखाधड़ी का शिकार होना।
भावनाओं के साथ खेला जाना।
आपकी बेहद निजी और व्यक्तिगत जानकारी का गलत इस्तेमाल होना।
सही समाधान क्या है?
इस पूरी समस्या का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि हम दुनिया पर विश्वास करना ही बंद कर दें। असली समझदारी यह है कि हम भरोसा करें, लेकिन तुरंत नहीं। किसी पर भी यकीन धीरे-धीरे और अपने अनुभवों के आधार पर ही करना चाहिए।
अपने रिश्तों में एक दायरा तय करना सीखें। अगर कोई इंसान आपको असहज महसूस कराता है या बार-बार आपका भरोसा तोड़ता है, तो उसे दोबारा मौका देने से पहले पूरी तरह से सावधान हो जाना ही सबसे सही कदम है।





