क्या आपका बच्चा भी स्कूल न जाने के बहाने बनाता है? नजरअंदाज न करें

स्कूल सिर्फ पढ़ाई-लिखाई की जगह नहीं है, बल्कि यहां बच्चों की पर्सनैलिटी और कॉन्फिडेंस भी विकसित होती है। इसलिए स्कूल का माहौल कैसा है और बच्चे के साथ कैसा बर्ताव हो रहा है, इस पर ध्यान देना जरूरी है। कई बार स्कूल में बच्चे बुलिंग का शिकार हो जाते हैं।

बुलिंग सिर्फ शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक चोट भी पहुंचाती है। इसके कारण बच्चा खुद को कमजोर समझने लगता है और उसका आत्मसम्मान भी कम हो जाता है। कई बार बुलिंग इतनी बढ़ जाती है कि बच्चा आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर भी मजबूत हो जाता है। ऐसे में जरूरी है कि माता-पिता और टीचर्स, दोनों ही बुलिंग के संकेतों को पहचानें, ताकि वक्त पर बच्चे की मदद कर सकें। आइए जानें बुलिंग के संकेत कैसे हो सकते हैं।

बुलिंग होती क्या है?
बुलिंग का मतलब है किसी बच्चे को जानबूझकर बार-बार शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक रूप से चोट पहुंचाना। इसमें चिढ़ाना, धक्का-मुक्की करना, गाली देना, डराना-धमकाना, दूसरों के सामने नीचा दिखाना या सोशल मीडिया पर मजाक उड़ाना शामिल हो सकता है।

कैसे पहचानें कि बच्चा बुलिंग का शिकार हो रहा है?
सबसे पहले आपको अपने बच्चों में आ रहे कुछ बदलावों पर ध्यान देना होगा।

व्यवहार में बदलाव- बच्चा अचानक चुपचाप या गुस्सैल हो जाए, दोस्तों से दूरी बनाने लगे या पहले जैसी खुशमिजाजी न दिखाए तो यह बुलिंग संकेत हो सकता है।
स्कूल जाने से बचना- अगर बच्चा रोजाना बहाने बनाकर स्कूल नहीं जाना चाहता, तो यह चिंता की बात है। बुलिंग का शिकार बच्चे अक्सर डर के कारण स्कूल से बचते हैं।
शारीरिक निशान- बार-बार चोट लगना, कपड़ों का फटना या सामान खो जाना यह इशारा कर सकता है कि बच्चा बुलिंग का सामना कर रहा है।
पढ़ाई पर असर- अचानक मार्क्स कम आने लगना, पढ़ाई पर फोकस न कर पाना या क्लास में कम से कम एक्टिव होना भी एक बड़ा संकेत है।
नींद और भूख पर असर- ऐसे बच्चे या तो ठीक से सो नहीं पाते या डरावने सपने देखते हैं। कई बार उनकी भूख भी कम हो जाती है।
आत्मविश्वास की कमी- बच्चा खुद को दूसरों से कम समझने लगे या बार-बार खुद को दोषी ठहराए, तो यह बुलिंग का संकेत हो सकता है।

ऐसे में पेरेंट्स और टीचर्स क्या कर सकते हैं?
बच्चों से रोज बातचीत करें और उनकी छोटी-छोटी बातों को भी ध्यान से सुनें।
बच्चों को यह भरोसा दिलाएं कि वे अपनी समस्या खुलकर शेयर कर सकते हैं।
स्कूल की एंटी-बुलिंग पॉलिसी के बारे जानें और बच्चे को भी बताएं।
बच्चों को आत्मरक्षा करने की ट्रेनिंग दें।
बच्चे के स्कूल में टीचर्स से इस बारे में बात करें।
ऐसे मामलों में काउंसलर या थेरेपिस्ट की भी मदद ले सकते हैं।

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