छोटे-बड़े आईलैंड से सजी एक अलग ही दुनिया है अंडमान एंड निकोबार…

व्हाट्स इन ए नेम यानि नाम में क्या रखा है? गुलाब उतना ही मधुर रहेगा चाहे किसी भी नाम से बुलाएं! 30 दिसंबर1943 को द्वितीय विश्र्व-युद्ध के दौरान नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने जब पोर्ट ब्लेयर में अंडमान और निकोबार द्वीपों का नाम बदल कर शहीद और स्वराज रखा था, तो उनके मन में उस समय जूलिएट द्वारा रोमियो को कहे गए इस वाक्य से ज्यादा भारत की आजादी और भारत के स्वाभिमान का प्रश्न रहा होगा! लेकिन सुभाष चंद्र बोस द्वारा इन द्वीपों के नाम बदलने की उस समय की यह प्रक्रिया अल्पकालिक ही रही, क्योंकि कुछ ही समय बाद इन द्वीपों का आधिपत्य ब्रिटिश सरकार को वापस चला गया था।छोटे-बड़े आईलैंड से सजी एक अलग ही दुनिया है अंडमान एंड निकोबार...

आजादी के 71 सालों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर अंडमान द्वीप-समूह में रॉस द्वीप का नाम बदल कर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वीप, नील द्वीप का नाम बदल कर शहीद द्वीप और हैवलॉक द्वीप का नाम बदल कर स्वराज द्वीप रखा। विदेशियों द्वारा इन द्वीपों के नामों के विदेशीकरण की प्रक्रिया साल 1755 में शुरू हुई थी, जब डेनमार्क की ईस्ट इंडिया कंपनी यहां आई और 1 जनवरी, 1756 को उन्होंने निकोबार द्वीप को ‘न्यू डेनमार्क’ का नाम दिया। बाद में इसे बदल कर ‘फ्रेडरिक्स आइलैंड्स’ कर दिया गया। 1778 से 1784 तक ऑस्ट्रिया ने निकोबार द्वीपों को अपने अधिकार में मानकर इन द्वीपों का नाम टेरेसिया द्वीप कर दिया! इस प्रकार तत्कालीन भारत में किसी केंद्रीय सत्ता के अभाव में इन द्वीपों में यूरोप के छोटे-छोटे देशों ने उपनिवेश बनाने का अपना खेल खूब जम कर खेला!

कैसे नाम पड़ा पोर्ट ब्लेयर

ब्रिटिश राज में जिन लोगों के नामों पर यहां के टापुओं के नाम रखे गए थे, उन लोगों के विषय में जानना बहुत रोचक है। आर्चिबाल्ड ब्लेयर (1752-1815), जिसके नाम पर पोर्ट ब्लेयर का नाम रखा गया, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की बॉम्बे मरीन में एक सर्वेक्षणकर्ता (सर्वेयर) था। इस द्वीप का नाम पहले पोर्ट कॉर्नवालिस (1738-1805) रखा गया था, हालांकि ब्लेयर के इन द्वीपों का सर्वेक्षण करने के कारण यह ‘ब्लेयर्स हार्बर’ के नाम से ही जाना जाता रहा। इसी प्रकार कैप्टेन डेनियल रॉस, जिसके नाम पर रॉस (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वीप) का नाम रखा गया था, ईस्ट इंडिया कंपनी का एक जल-सर्वेक्षक (हाइड्रोग्राफर) था। नील (शहीद) द्वीप का नाम क्रूर स्कॉटिश सैन्य-अधिकारी ब्रिगेडियर जनरल जेम्स नील के नाम पर रखा गया था, जिसने भारत के 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों पर बहुत अत्याचार किए थे। उसने बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के इलाहबाद में विद्रोहियों को फांसी पर चढ़वाया और लोगों को जिंदा जलवाया। कानपुर में अकारण अपने हाथों से लोगों की हत्याएं कीं और शहर के ब्राह्मणों को मारे गए अंग्रेजों का खून धोने को मजबूर किया, उन्हें कोड़ों से पिटवाया और बाद में उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया था! इसी प्रकार मेजर-जनरल ‘सर’ हेनरी हैवलॉक ने भी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में लखनऊ को भारतीय सिपाहियों से मुक्त करवाने और क्रांतिकारियों को कुचलने में अहम् भूमिका निभाई थी, जिस कारण यहां के एक द्वीप का नाम हैवलॉक (स्वराज) द्वीप कर दिया गया था। ब्लेयर, आऊट्रम, विलियम, चैथम, लॉरेंस, थॉर्नबिल, स्मिथ, एंडरसन, पैटमैन, होबडे, प्लूटो, एलेक्जेंड्रा, मरे, कैंपबैल जैसे कितने ही द्वीप, पहाडि़यां और खाड़ी इत्यादि अब भी अंग्रेजी नामों का बोझा ढो रहे हैं, ठीक वैसे ही, जैसे नेपाल और भारत में सागरमाथा के नाम से प्रसिद्ध विश्र्व की सबसे ऊंची पर्वत-चोटी को एक साधारण से सर्वेक्षणकर्ता के नाम पर माउंट एवरेस्ट नाम दे दिया गया! दुनिया का राजनीतिक उपनिवेशीकरण तो समाप्त हुआ है, परंतु सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण की समाप्ति अभी पूर्ण नहीं हुई है। ग्यारहवीं शताब्दी के तंजावूर ग्रंथों में यह द्वीप-समूह चोल साम्राज्य के अंतर्गत ‘मा-नक्कावरम’ के नाम से उल्लिखित है। नक्कावरम शब्द से ही निकोबार शब्द की उत्पत्ति हुई है, ऐसा माना जाता है। ‘अंडमान’ शब्द ‘अन्डोमान’ शब्द से बना है, जिसे ‘हनुमान’ का अपभ्रंश माना जाता है। साल 1440 के आसपास भारत आए इतालियन यात्री निकोलो दे कोंती ने इन द्वीपों का नाम ‘स्वर्णद्वीप’ बताया था।

572 द्वीपों का समूह अंडमान और निकोबार द्वीप

समूह में छोटे-बड़े कुल 572 द्वीप हैं। इनमें से 38 पर आबादी है, बाकी द्वीप घने जंगलों से घिरे हैं। अंडमान और निकोबार जाने के लिए वायुसेवा भी उपलब्ध है, हालांकि वहां पहुंचने का सबसे ज्यादा रोमांचक तरीका जलयान से यात्रा करना रहेगा! कोलकता, चेन्नई और विशाखापत्तनम से पोर्ट ब्लेयर तक पानी का जहाज जाता है, हालांकि जलपोत से यात्रा की सेवा बहुत ज्यादा नहीं है। इन जगहों से पोर्ट ब्लेयर पहुंचने के लिए पानी के जहाज में 55 से 70 घंटे तक की यात्रा करनी पड़ती है, जिसमें जमीन के दर्शन तक भी नहीं होते..केवल बंगाल की खाड़ी का गहरा नीला समुद्र और आप।

अंडमान द्वीप पर स्थित तीन-मंजिला सेल्यूलर जेल

जिसके बारे में तो सभी जानते हैं, जिसकी नींव में न जाने कितने भारतीय स्वतंत्रता-सेनानियों की रुधिर से सनी हड्डियां दबी हुई हैं। परंतु अंडमान द्वीप में देखने के लिए जलजीव-शाला (एक्वेरियम) और समुद्रिका नौसेना संग्रहालय हैं, नीचे कांच के तले वाली नावें और सेमी-सब-मैरीन हैं, जिनमें यात्रा करने से पानी में जाए बिना हीं समुद्री जंतुओं के दर्शन भी होते रहते हैं! चैथम में एशिया की सबसे पुरानी अभी भी काम कर रही आरा मिल, वन-संग्रहालय, दूसरे विश्र्वयुद्ध के समय पर जापानियों द्वारा बम-वर्षा से बचने के लिए बनाये गए बंकर और वन-संग्रहालय (फारेस्ट म्यूजियम) हैं। जल-क्रीड़ा के लिए जैट स्की, पैडल बोट, बंपर बोट, रोइंग बोट इत्यादि की सुविधाएं हैं। सुरुचिपूर्ण ढंग से पुते-रंगे मकान तथा अन्य भवन हैं। परंतु अंडमान द्वीप-समूह का असली आनंद है, वहां की हरियाली और वहां के समुद्री तटों में। शुद्ध और ताजा वायु, खुली सड़कें, ऊंचे पेड़, घने जंगल, झरने, रस्सी से झूलते पुल शहरी थकान और तनाव को क्षण भर में दूर कर देते हैं। वहां के स्वराज द्वीप (हैवलॉक) का समुद्री तट एशिया का सर्वश्रेष्ठ और दुनिया के सर्वश्रेष्ठ समुद्री तटों में से एक हैं। हरियाली से भरे टापू पर गहरे-नीले समुद्र के उथले पानी में उठती हल्की लहरें, सुनहली रेत – एक शांत संध्या बिताने का अद्भुत माहौल यहां है। कुछ जगहों पर समुद्र में से उभरती चट्टानें भी नजर आती हैं, जहां पर सावधानी बरतना बहुत आवश्यक होता है।

पोर्ट ब्लेयर से स्वराज (हेवलॉक) तथा शहीद (नील) द्वीप के लिए भी जहाज सेवा उपलब्ध है, जिसमें ढाई से पांच घंटे तक लगते हैं। पोर्ट ब्लेयर से सिर्फ पंद्रह मिनट की नौका-यात्रा की दूरी पर स्थित नेताजी सुभाष चन्द्र बोस (रॉस) द्वीप पर मुख्यत: नौसेना के कार्यालय हैं, लेकिन यहां कुछ पुराने खंडहर भी देखने को मिलते हैं। यहां मोर, हिरण आदि पक्षी और जानवरों के साथ-साथ अभी हाल ही में साउंड-ऐंड-लाइट शो भी शुरू किया गया है।

स्थानीय लोगों का जीवन

यदि आप अंडमान द्वीप-समूह में स्थानीय लोगों के जीवन को नजदीक से देखना चाहते हैं, तो वहां की स्थानीय यातायात सेवा हार्बर फैरी सर्विस में घूमने का आनंद और ही है! स्थानीय नौकाएं तट के किनारे-किनारे चलती हैं और वहां के स्थानीय निवासियों और उनके सामान को लाने-ले जाने के लिए स्थानीय परिवहन का काम करती हैं। इस नौका में बैठ कर बहुत सस्ते दामों में दिन भर घूमा जा सकता है, जिससे वहां की संकरी खाडि़यों, पहाड़ों और हरियाली को भी नजदीक से देखने का अवसर मिलेगा। समुद्र के गर्भ में से उभरते ऊंचे-नीचे टापू, लाइटहाऊस, समुद्र में खड़े जहाज, पानी में इधर-उधर आती-जाती छोटी-बड़ी नौकाएं, गोदी में काम करती विशाल क्त्रेनें अद्भुत नजारा पेश करती हैं! इस यात्रा में दिनभर के लिए अपना खाना और पानी साथ रखना आवश्यक है।अंडमान और निकोबार के कुछ द्वीपों पर यहां की मूल आदिवासी प्रजातियों के निवासी रह रहे हैं, जिनका आज के समाज के साथ किसी भी प्रकार का कोई भी संबंध नहीं है। लगभग साठ हजार वर्ष पहले आधुनिक मानव के उत्तरी अफ्रीका से बाहर निकलने के समय ये आदिवासी यहां आकर बसे थे। ये लोग आज भी अपनी हजारों वर्ष पुरानी सामाजिक व्यवस्था के मूल स्वरूप की सुरक्षा करके रहते हैं। इन टापुओं पर किसी भी बाहरी व्यक्ति का जाना पूर्णतया निषिद्ध है। बाहरी समाज के साथ संपर्क में आने पर इनके बीमारियों के भी संपर्क में आने और इनकी पूरी प्रजाति के ही नष्ट हो जाने के खतरे के कारण भारत सरकार के वैज्ञानिक और अधिकारी भी इनसे बहुत दूर से संपर्क बना कर इनकी आधुनिक समाज से दूरी को बनाए रखने के लिए सचेष्ट रहते हैं। पिछले दिनों यहां के प्रतिबंधित उत्तरी सेंटिनल द्वीप में एक विदेशी के गैर-कानूनी घुसपैठ करने और वहां के आदिवासियों का धर्म परिवर्तन करने की कोशिश करने से इन द्वीपों की सामरिक व सामाजिक सुरक्षा के प्रति सतर्कता की आवश्यकता एक बार फिर एक प्रश्न बन कर उभरी है।

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