सूखा पड़ा है विदर्भ, सामान्य से 22 प्रतिशत कम है संतरानगरी में बारिश

नागपुर. मानसून आने के बाद से ही शहर सहित विदर्भ कम बारिश से जूझ रहा है। हालांकि बीच-बीच में रुक रुकर आती बौछारों ने खेती को कुछ हद तक संभाल रखा है, लेकिन बांध अभी भी सामान्य स्तर को छू नहीं पाए हैं। बारिश के थमे रहने से कई रोग भी लोगों को परेशान करने लगे हैं। मौसमी बुखार आदि लोगों को जकड़ने लगे हैं।

मौसम की स्थिति यह कि कभी तेज बौछारों का तो कभी ठंड का या कभी तीखी गर्मी और उमस के बीच लोगों को फंसा रखा है। लोगों का कहना है कि भले ही मानसून आए 2 माह गुजर गए हों, लेकिन अभी तक मानसून महसूस ही नहीं हो रहा।
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मानसूनी बादलों से अधिक तो घरेलू बादलों का दबदबा शहर पर बना रहा। खेती में धान व कपास की खेती अभी भी खतरे में हैं। सोयाबीन जैसे-तैसे जमी हुई है। यदि शीघ्र ही इसे भी कटाई के पूर्व पानी नहीं मिला तो इस फसल पर भी असर आ सकता है।
विदर्भ 20 प्रतिशत पीछे है
उपराजधानी पर इस इंद्रदेव की कृपा कुछ ज्यादा नहीं रही। मानसून के आने के बाद से ही वर्षा अपने औसत से पीछे ही चल रही है। 18 जून को मानसून की घोषणा के बाद 21 जून तक शहर में औसत से 50 प्रतिशत वर्ष कम दर्ज की गई थी। उसके बाद मानसूनी बादल कुछ पसीजे और अगले सप्ताह 31 प्रतिशत वर्षा होकर औसत से 19 प्रतिशत वर्षा कम रही। हालांकि मानसून की घोषणा के बाद से एक भी सप्ताह ऐसा नहीं गया जब बरसात औसत या उससे अधिक दर्ज की गई हो। 2 अगस्त तक शहर में बारिश औसत से 22 प्रतिशत कम दर्ज की गई है। 27 जुलाई से 2 अगस्त तक शहर में मात्र 14.5 मिमी वर्ष रिकार्ड हुई है, जबकि सप्ताह का औसत 63.2 मिमी. है। 1 जून के बाद अब तक शहर में 485.9 मिमी. वर्षा दर्ज होनी चाहिए थी, पर हुई 377.8 मिमी ही। विदर्भ में भी हाल कमोबेश यही हैं। सभी 11 जिलों में औसत से कम ही बरसात दर्ज हुई है। पूरे विदर्भ में औसतन 20 प्रतिशत बरसात कम दर्ज की गई है। जबकि सबसे कम वर्षा गोंदिया में दर्ज की गई। यहां सामान्य से 29 प्रतिशत कम वर्षा रिकार्ड हुई है। अमरावती व यवतमाल में 28, भंडरा में 27, चंद्रपुर में 24, अकोला में 23, गड़चिरौली में 13, वाशिम में 12, वर्धा में 7 तथा बुलढाणा में 6 प्रतिशत वर्ष कम रिकार्ड हुई है।
उपराजधानी पर इस इंद्रदेव की कृपा कुछ ज्यादा नहीं रही। मानसून के आने के बाद से ही वर्षा अपने औसत से पीछे ही चल रही है। 18 जून को मानसून की घोषणा के बाद 21 जून तक शहर में औसत से 50 प्रतिशत वर्ष कम दर्ज की गई थी। उसके बाद मानसूनी बादल कुछ पसीजे और अगले सप्ताह 31 प्रतिशत वर्षा होकर औसत से 19 प्रतिशत वर्षा कम रही। हालांकि मानसून की घोषणा के बाद से एक भी सप्ताह ऐसा नहीं गया जब बरसात औसत या उससे अधिक दर्ज की गई हो। 2 अगस्त तक शहर में बारिश औसत से 22 प्रतिशत कम दर्ज की गई है। 27 जुलाई से 2 अगस्त तक शहर में मात्र 14.5 मिमी वर्ष रिकार्ड हुई है, जबकि सप्ताह का औसत 63.2 मिमी. है। 1 जून के बाद अब तक शहर में 485.9 मिमी. वर्षा दर्ज होनी चाहिए थी, पर हुई 377.8 मिमी ही। विदर्भ में भी हाल कमोबेश यही हैं। सभी 11 जिलों में औसत से कम ही बरसात दर्ज हुई है। पूरे विदर्भ में औसतन 20 प्रतिशत बरसात कम दर्ज की गई है। जबकि सबसे कम वर्षा गोंदिया में दर्ज की गई। यहां सामान्य से 29 प्रतिशत कम वर्षा रिकार्ड हुई है। अमरावती व यवतमाल में 28, भंडरा में 27, चंद्रपुर में 24, अकोला में 23, गड़चिरौली में 13, वाशिम में 12, वर्धा में 7 तथा बुलढाणा में 6 प्रतिशत वर्ष कम रिकार्ड हुई है।
बांध भी रह गए हैं खाली
नागपुर जिले व विभाग के सभी बांध रीते पड़े हैं। शहर को जलापूर्ति करनेवाला सबसे बड़ा बांध तोतलाडोह के हालात नाजुक हैं। यहां 3 अगस्त मात्र 11 प्रतिशत पानी ही जमा हो सका है। जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में क्षमता का 74 प्रतिशत पानी जमा हो गया था। कामठी खैरी व लोवर वडगांव को छोड़ दें तो कोई भी 50 प्रतिशत के आस-पास भी नहीं पहुंच सका है। कामठी खैरी में 51 प्रतिशत तो लोअर वडगांव में 44 प्रतिशत पानी जमा हुआ है। जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यहां क्रमश: 88 व 70 प्रतिशत पानी जमा हो चुका था। रामटेक में 18 व लोवर नांद में 36 प्रतिशत पानी आया है। नागपुर विभाग के सभी 18 बांधों की स्थिति देखें तो अब तक केवल 20 प्रतिशत पानी ही जमा हुआ है, जबकि पिछले वर्ष इस अवधि में 56 प्रतिशत पानी बांधों में आ चुका था।
कृषि विशेषज्ञ भी परेशान
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार रुक-रुक कर कम आई वर्षा से कम समय की फसल तो फिर भी ठीक रही, लेकिन धान व कपास की फसल पर बुरा असर हुआ है। सोयाबीन चार मासी फसल है और पकने को है। लेकिन कपास अठमासी फसल है। अभी इसके पौध के बाढ़ के दिन हैं। ऐसे में यदि भरपूर पानी नहीं मिला, तो पौधा कुपोषित हो जाएगा और फूल कमजोर व छोटे होंगे। इसके अलावा वर्षा के कम रहने से रबी की फसल पर भी असर पड़ सकता है। वर्षा कम होगी तो जमीन में पानी भी कम जाएगा, ऐसे में रबी की फसल गेंहूं, चना तुअर आदि को भी नुकसान हो सकता है।
– विजय वरफडे, कृषि विशेषज्ञ
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार रुक-रुक कर कम आई वर्षा से कम समय की फसल तो फिर भी ठीक रही, लेकिन धान व कपास की फसल पर बुरा असर हुआ है। सोयाबीन चार मासी फसल है और पकने को है। लेकिन कपास अठमासी फसल है। अभी इसके पौध के बाढ़ के दिन हैं। ऐसे में यदि भरपूर पानी नहीं मिला, तो पौधा कुपोषित हो जाएगा और फूल कमजोर व छोटे होंगे। इसके अलावा वर्षा के कम रहने से रबी की फसल पर भी असर पड़ सकता है। वर्षा कम होगी तो जमीन में पानी भी कम जाएगा, ऐसे में रबी की फसल गेंहूं, चना तुअर आदि को भी नुकसान हो सकता है।
– विजय वरफडे, कृषि विशेषज्ञ
चिकित्सक भी चिंतित
रुक रुक के बरसात कभी धूप तो कभी ठंडक मानव शरीर पर बुरा असर करती है। ऐसे में लोगों में वायरल फीवर या मौसमी बुखार का जोर बढता है। साथ ही फ्लू का भी असर रहता है। ऐसे मौसम में दमा के मरीजों की भी आफत होती है। ठंडक और गर्मी के कारण उन्हें दमा के दौरे पड़ने का अंदेशा बढ़ जाता है। ऐसे में कुछ खास सावधानियां तो नहीं हैं, लेकिन संक्रमित व्यक्ति से कुछ दूरी बनाएं, यदि मिलते हैं तो नाक पर रूमाल रखें व हाथ आदि धो लें। संक्रमण होने पर तुरंत चिकित्सक की सलाह लें।
– डा. रवींद्र सावरकर,
रुक रुक के बरसात कभी धूप तो कभी ठंडक मानव शरीर पर बुरा असर करती है। ऐसे में लोगों में वायरल फीवर या मौसमी बुखार का जोर बढता है। साथ ही फ्लू का भी असर रहता है। ऐसे मौसम में दमा के मरीजों की भी आफत होती है। ठंडक और गर्मी के कारण उन्हें दमा के दौरे पड़ने का अंदेशा बढ़ जाता है। ऐसे में कुछ खास सावधानियां तो नहीं हैं, लेकिन संक्रमित व्यक्ति से कुछ दूरी बनाएं, यदि मिलते हैं तो नाक पर रूमाल रखें व हाथ आदि धो लें। संक्रमण होने पर तुरंत चिकित्सक की सलाह लें।
– डा. रवींद्र सावरकर,





