बिहार में इंसेफेलाइटिस का कहर: लीची नहीं इस वजह से फ़ैल रही है यह बड़ी बीमारी…

उत्तर बिहार में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) या चमकी बुखार के प्रकोप के लिए लीची (Litchi) को दोषी ठहराया जा रहा है। इस कारण इसकी खेती और व्यवसाय पर खतरा मंडराने लगा है। हालांकि, विशेषज्ञ लीची में एईएस फैक्टर को खारिज करते हैं। उनका तर्क है कि मुजफ्फरपुर में लीची का इतिहास लगभग दो सौ साल पुराना है, जबकि एईएस 16-17 वर्षों से हो रहा है। ऐसे में लीची को दोषी ठहराना उचित नहीं है। 
दरअसल, बीमारी की वजह को लेकर अभी तक विशेषज्ञ एकमत नहीं हैं। लेकिन इतना तो तय है कि इसके कारण अत्यधिक गर्मी व नमी के मौसम में छिपे हैं। एक बड़ा कारण कुपोषण को माना जाता है। बड़ी बात यह भी है कि इससे बचाव का टीका उपलब्ध है।
लीची व एईएस का ऐसे जुड़ा कनेक्शन, यू शुरू हुआ विवाद
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लीची को एईएस से जोड़कर देखने का यह विवाद लंदन के मेडिकल जर्नल ‘लेंसेट ग्लोबल हेल्थ’ में प्रकाशित एक शोध पत्र के बाद शुरू हुआ। इसमें कहा गया कि कच्ची लीची में मिथाइल साइक्लोप्रोपाइल-ग्लाइसिन (एमपीसीजी) नामक तत्व अधिक पाया जाता है। शोध के अनुसार, लीची के बीज और अधपके लीची के सेवन से खून में शुगर लेवल एकाएक कम हो जाता है। तब यह मस्तिष्क को प्रभावित करता है। मरीज बेहोशी की हालत में चला जाता है। मृत्यु हो जाती है।
जमैका के फल ‘एक्की से की थी तुलना
बाद के वर्षों में वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज से जुड़े वायरोलॉजिस्ट डॉ. टी जैकब जॉन ने वर्ष 2014 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में लिखा था कि जमैका में पाए जानेवाले फल ‘एक्की’ और इसी प्रजाति और कुल की लीची के मध्य एक समरूप रोग का पता लगाया गया है। जमैका में इसे ‘तीव्र मस्तिष्क विकृति’ (एक्यूट इंसेलोपैथी) कहा जाता है। डॉ. जॉन ने स्पष्ट किया था कि यह बीमारी गैर-संक्रामक इंसेलोपैथी और गैर विषाक्त संक्रामक पदार्थ इंसेफेलाइटिस के कारण हुई थी। मुजफ्फरपुर में फैली बीमारी और एक्की के अध्ययन के बाद यह पाया गया कि जिन बच्चों ने शाम के समय भोजन नहीं किया और सुबह खाली पेट इन फलों का अधिक सेवन किया है, उनके रक्त में शर्करा की मात्रा कम होने तथा तीव्र मस्तिष्क विकृति होने के कारण सिरदर्द और कभी-कभी मृत्यु के मामले सामने आए हैं।
नेशनल रिसर्च में लीची बेदाग
लेकिन क्या वाकई इस बीमारी के लिए लीची जिम्मेदार है? ,विशेषज्ञ अभी तक इसका पुख्ता प्रमाण नहीं दे पाए हैं। दूसरी ओर राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. विशालनाथ कहते हैं कि नेशनल रिसर्च में लीची पूरी तरह सही निकली। इसमें बीमारी का कोई तत्व नहीं मिला है। इसे बदनाम नहीं किया जाना चाहिए।





