मेरा बेटा कभी गलत नहीं… यही भरोसा बनता है ‘राजा बेटा सिंड्रोम’ का कारण

भारतीय घरों में एक डायलॉग बहुत आम है- “मेरा बेटा बाकी लड़कों जैसा नहीं, वह ऐसा कुछ गलत कर ही नहीं सकता।”
अपने बच्चे से प्यार करना और उस पर भरोसा करना बहुत अच्छी बात है, लेकिन जब यह प्यार अंधा हो जाए, बेटे की हर गलती पर पर्दा डाला जाने लगे और उसे हर जिम्मेदारी से दूर रखा जाए, तो यह एक बड़ी समस्या बन जाता है। आज के समय में इसे ‘राजा बेटा सिंड्रोम’ का नाम दिया गया है।
क्या है यह ‘राजा बेटा सिंड्रोम’?
यह कोई मेडिकल कंडीशन नहीं है, बल्कि हमारे समाज की परवरिश से जुड़ी एक बड़ी खामी है। यह उस घर की कहानी है जहां बहन तो बचपन से रसोई में हाथ बंटाती है, लेकिन भाई को पानी का गिलास भी खुद उठकर नहीं लेना पड़ता। बचपन से ही लड़के के दिमाग में यह बात बैठा दी जाती है कि वह घर का चिराग है, सबसे खास है और उसे कोई भी काम करने की जरूरत नहीं है। उसकी हर छोटी-बड़ी जिद तुरंत पूरी की जाती है और उसे कभी “ना” सुनने की आदत नहीं डाली जाती।
लड़कों के लिए ही बन जाता है दुश्मन
शुरुआत में माता-पिता को लगता है कि वे अपने बच्चे को बहुत प्यार दे रहे हैं, लेकिन असल में वे उसे कमजोर बना रहे होते हैं। इस सिंड्रोम से ग्रसित लड़कों में यह भावना आ जाती है कि दुनिया उनके इर्द-गिर्द घूमती है। वे कभी अपनी भावनाओं को कंट्रोल करना नहीं सीखते। जब वे बड़े होकर बाहरी दुनिया में जाते हैं, तो बॉस की डांट, दोस्तों से असहमति या किसी भी तरह का “ना” सुनना उनसे बर्दाश्त नहीं होता। वे छोटी-छोटी परेशानियों में जल्दी हार मान लेते हैं।
शादीशुदा जिंदगी पर होता है सबसे बुरा असर
‘राजा बेटा सिंड्रोम’ का सबसे खौफनाक रूप शादी के बाद देखने को मिलता है। ऐसे लड़कों को एक पार्टनर नहीं, बल्कि अपनी पत्नी के रूप में एक और ‘मां’ चाहिए होती है। वे चाहते हैं कि पत्नी भी ठीक उसी तरह उनके नखरे उठाए, उनकी हर गलती को अनदेखा करे और उनके सारे काम करे, जैसे उनकी मां करती थीं। हालांकि, आज के समय में लड़कियां आत्मनिर्भर और समझदार हैं। वे बराबरी का रिश्ता चाहती हैं। यही कारण है कि आज कई रिश्ते और शादियां इस ‘राजा बेटा’ वाली सोच की वजह से टूट रही हैं।
क्या है इसका समाधान?
इस बदलाव की शुरुआत आपको घर से ही करनी होगी। माता-पिता को प्यार और लाड़-दुलार के बीच का फर्क समझना होगा। अपने बेटे को भी वही संस्कार दें जो आप अपनी बेटी को देते हैं।
उसे अपने बिस्तर ठीक करने, अपने बर्तन उठाने और घर के छोटे-मोटे काम करने की आदत डालें।
उसे बताएं कि रोना या अपनी भावनाएं व्यक्त करना कमजोरी नहीं है।
सबसे जरूरी बात- जब वह गलती करे, तो उसे बचाएं नहीं, बल्कि उसे अपनी गलतियों की जिम्मेदारी लेना सिखाएं।





