दिल्ली के इस पुराने दरवाजे को क्यों कहते हैं ‘खूनी दरवाजा’, आखिर क्या है इसका इतिहास? जानें

दिलवालों का शहर दिल्ली अपनी खूबसूरती के साथ-साथ अनोखे इतिहास के लिए भी जाना जाता है. इस शहर ने कई शासकों का राज देखा है. उनके राज में यहां कई अनोखी इमारतें बनवाई गई हैं, जो आज भी काफी प्रसिद्ध हैं. इन इमारतों के नाम कई बार काफी विचित्र होते हैं. उनका इतिहास भी काफी चौंकाने वाला है. ऐसी ही एक इमारत, या यूं कहें कि एक प्राचीन दरवाजा दिल्ली में है, जिसका नाम है खूनी दरवाजा! (How Khooni Darwaza of Delhi got its name) क्या आप जानते हैं कि इसका ऐसा नाम क्यों पड़ा है?
इंडिया हेरिटेज वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार इस दरवाजे को अफगान शासक शेर शाह सुरी ने 16वीं सदी में बनवाया था. पहले इसे काबुली दरवाजा कहते थे क्योंकि काबुल (Kabuli Darwaza) जाने वाले लोगों का कारवां इन्हीं दरवाजों से होकर गुजरता था. उस वक्त भी ये गेट खून से लतपथ हो जाता था. दरअसल, उस वक्त अपराधियों के सिर काटकर इस गेट पर टांग दिया जाता था, जिससे दूसरों को ये सबक मिल सके कि उन्हें जुर्म नहीं करना है, न ही कानून को हाथ में लेना है. 21वीं सदी में भी कुछ जुर्म से जुड़े मामले इस दरवाजे के पास हुए, जिसके चलते अब इसे जनता के लिए बंद कर दिया गया है. पर सवाल ये उठता है कि खूनी दरवाजे का नाम कैसे पड़ा?
आजादी की पहली लड़ाई से जुड़े हैं तार
22 सितंबर 1857 को यहां एक ऐसी घटना घटी, जिसने इस दरवाजे का नाम बदल दिया. दरअसल, हुआ यूं कि मेरठ में 10 मई 1857 को सिपाहियों ने अंग्रेजी शासकों के खिलाफ विद्रोह की जंग छेड़ दी. उसी रात वो लोग दिल्ली के तरफ कूच करने लगे और 11 मई को लाल किले पर पहुंचकर बहादुर शाह जफर से अनुरोध किया कि वो उनके लीडर बन जाएं. बहादुर शाह जफर के साथ सेना ने कई अंग्रेजों को दिल्ली में मौत के घाट उतारा और अंग्रेजों से दिल्ली को छीन लिया. ब्रिटिश लोग दिल्ली के अंदर से भाग खड़े हुए और बाहरी इलाकों में कैंप लगाकर रहने लगे. यहां वो अपनी सेना के आने का इंतजार कर रहे थे.
होडसन ने बहादुर शाह जफर से की बातचीत
सितंबर में सेना आई, और दिल्ली में फिर भारतीय सैनिकों और अंग्रेजी सेना के बीच जंग छिड़ी. काफी खून-खराबे के बाद अंग्रेजी सेना ने दिल्ली में जीत हासिल की. बहादुर शाह जफर भी लाल किले से भागकर हुमायुं के मकबरे में जा छुपे थे. उसी दौरान कैप्टन विलियन होडसन (William Hodson) को मध्यस्थ बनाकर भेजा गया. जफर ने सरेंडर करने को कहा, मगर अपनी जान बख्श देने की गुजारिश की. उनकी बात को मान लिया गया. उसके बाद होडसन, जफर के दो बेटों, मिर्जा मुगल और खिजिर सुल्तान और उसके पोते मिर्जा अबु बक्र को पकड़ने के लिए हुमायुं के मकबरे में पहुंचा. 22 सितंबर की ये घटना थी. उन्होंने भी सरेंडर की यही शर्त रखी और पिता की तरह जीवनदान की मांग की.
खूनी दरवाजे पर राजकुमारों को उतारा मौत के घाट
काफी बातचीत के बाद राजकुमार सरेंडर के लिए राजी हो गए. अपनी सेना के साथ, होडसन, तीनों राजकुमारों को लाल किले की ओर ले जाने लगे. जब वो खूनी दरवाजे पहुंचे, तो बतौर होडसन, भीड़ उन्हें डराने-धमकाने लगी और राजकुमारों को छुड़ाने की कोशिश में लग गई. तभी खूनी दरवाजे पर राजकुमारों की बैल गाड़ियों को रोका गया और उन्हें उतरने के लिए कहा गया. वहां सैकड़ों लोग जमा हो चुके थे. उनसे होडसन ने कहा कि ये राजकुमार औरतों और बच्चों को मौत के घाट उतारते हैं, और सरकार ने उन्हें सजा देने के लिए भेजा गया है. बस फिर होडसन ने अपनी बंदूक निकाली, राजकुमारों को ऊपरी वस्त्र उतारने को कहा और फिर एक के बाद एक तीनों को गोली मार दी. तीन मुगल राजकुमारों की मौत के कारण ही इस दरवाजे का नाम पड़ गया खूनी दरवाजा. 3 दिनों तक उनकी लाशें इस दरवाजे पर टंगी रहीं.





