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कमजोर अंग्रेजी और मोटी फीस के चलते स्कूल छोड़ रहे हैं आज के छात्र

 निजी स्कूल में कमजोर अंग्रेजी और अतिरिक्त गतिविधियों के नाम पर वसूले जानी वाली मोटी फीस के चलते आर्थिक कमजोर वर्ग के छात्र स्कूल छोड़ रहे है। यह खुलासा नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) ने दिल्ली एनसीआर के स्कूलों पर किए अध्ययन रिपोर्ट के आधार पर किया है।कमजोर अंग्रेजी और मोटी फीस के चलते स्कूल छोड़ रहे हैं आज के छात्र    कमजोर अंग्रेजी और मोटी फीस के चलते स्कूल छोड़ रहे हैं आज के छात्र

रिपोर्ट के मुताबिक, 2011 में 26 फीसदी छात्र बीच में स्कूल छोड़ देते थे। 2014 में यह 10 फीसदी पर आ गया, लेकिन बढ़ती फीस के चलते इसमें कमी नहीं आई। दरअसल, शिक्षा का अधिकार कानून 2009 में प्रावधान था कि निजी स्कूलों को 25 फीसदी सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को देना होगा। यह शिक्षा मुफ्त होगी। इसका खर्च राज्य सरकार उठाएगी। 
 

एनसीपीसीआर ने दिल्ली के 650 स्कूलों के आंकड़ों पर अध्ययन किया। पाया गया कि स्कूल छोड़ने वाले छात्रों का फॉलोअप नहीं किया जाता। इसकी जानकारी ना तो निजी स्कूल राज्य सरकारों को देते हैं ना ही सरकार गंभीरता दिखाती है।

अभिभावकों का कहना है कि वह स्कूलों के अतिरिक्त खर्च को उठाने में असमर्थ होते है जिसके चलते बच्चों को स्कूल बीच में छुड़वाना पड़ता है। किताब, ड्रेस के लिए सरकार 1,598 रुपये प्रतिमाह देती है। इसका हिसाब भी स्कूल बनाकर भेजते है। 

ये हैं प्राईवेट स्कूलों के खर्चे

रिपोर्ट के मुताबिक, एक अभिभावक ने बताया कि वह प्रत्येक तिमाही 3100 रुपये जमा करते हैं। इसके अलावा 12,000 रुपये किताब, ड्रेस का खर्च अलग होता है। स्कूल पिकनिक समेत अन्य गतिविधियों के लिए अलग से चार्ज करते हैं। खर्च के हिसाब से सरकार जो पैसा देती है वह नाकाफी है। 

एनसीआरपीसीआर ने रिपोर्ट के आधार पर कहा है कि इस ड्राप आउट पर सरकार को फिर काम करना होगा। शिक्षकों का ओरिएंटेशन प्रोग्राम होना चाहिए। हिंदी और अंग्रेजी में पढ़ाई की व्यवस्था होनी चाहिए।

राज्य सरकारों व निजी स्कूलों को स्कूल छोड़ने वाले बच्चों व अभिभावकों से फालोअप लेना चाहिए। साथ ही एनसीईआरटी की सस्ती दरों वाली किताबों को ही पढ़ाने के लिए स्कूलों को कहा जाए, ताकि किताबों का खर्च कम किया जा सके। 

 
 
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