मिशन 2019 के लिए राम मंदिर को लेकर एक तीर से कई निशाने साधने की तैयारी में संघ परिवार

संघ, भाजपा और साधु-संतों के बयानों से अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की अटकलें फिर हिलोरें मार रही हैं। मंदिर निर्माण की तिथि भले ही अभी भविष्य के गर्भ में हो पर, जिस तरह की जद्दोजहद दिख रही है उससे यह सरगर्मी सिर्फ बयानबाजी भर नहीं लगती। कुछ न कुछ इसके पीछे जरूर है। क्या है? यह आगे पता चलेगा।मिशन 2019 के लिए राम मंदिर को लेकर एक तीर से कई निशाने साधने की तैयारी में संघ परिवार

अलबत्ता संघ परिवार एक तीर से कई निशाने साधते दिख रहा है। एक तरफ वह विपक्ष को सांस्कृतिक एजेंडे पर अपनी व्यूह रचना में फंसाकर मात देने का तानाबाना बुन रहा है। दूसरी तरफ उसकी कोशिश हिंदुओं को यह संदेश और भरोसा दिलाने की है कि अयोध्या अब सिर्फ चुनावी मुद्दा भर नहीं है।

हालांकि, इस मुद्दे से राजनीतिक शक्ति बढ़ाने से भी उसे गुरेज नहीं है। जो भी हो संघ परिवार, भाजपा और विपक्ष के बयानों से यह जरूर साफ हो रहा है कि मिशन 2019 की फतह के लिए अयोध्या एक बार फिर चुनावी बिसात पर होगी।

संघ प्रमुख मोहन भागवत सहित अन्य पदाधिकारियों के बयान, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ समन्वय बैठक के निष्कर्ष, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की हलचल बढ़ाने वाली घोषणाएं, दिल्ली में अखिल भारतीय संत समिति का दिसंबर से मंदिर निर्माण शुरू करने का एलान, संतों की उच्चाधिकार समिति की बैठक में राम मंदिर के लिए कानून बनाने की मांग, राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा का निजी विधेयक लाने की घोषणा, छोटी दिवाली पर अयोध्या में योगी द्वारा भव्य राम प्रतिमा के शिलान्यास की तैयारी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह का वाराणसी में मंदिर के समर्थन में बयान, उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य का यह कहना कि अब वहां बाबर के नाम पर कोई इमारत नहीं बन सकती, जैसी कई बातें बताती हैं कि राम मंदिर भले ही अभी तक चुनावी एजेंडे तक सीमित रहता हो पर, इस बार यह केवल चुनावी नहीं है।

संघ की कोशिश राजनीति को हिंदुत्व के एजेंडे पर रखन की रही

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो संघ परिवार की कोशिश हमेशा देश की राजनीति को हिंदुत्व के एजेंडे पर रखने की रही है। कई मौकों पर संघ ने सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि हिंदुओं के कमजोर होने का मतलब देश का बंटना है। भारतीय संस्कृति के नष्ट होने का खतरा बढ़ना है।

संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक कहते हैं कि मोदी के नेतृत्व में देश और योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश में बहुत कुछ बदला है। हिंदुओं को सुरक्षा मिली है, हिंदुत्व के सांस्कृतिक सरोकारों से जुड़े स्थलों का सम्मान बढ़ा है।

मगर, राम मंदिर निर्माण का मसला अब साख व सरोकारों से जुड़ गया है। प्रचारक की बात और मौजूदा गतिविधियों को देखें तो संघ की कोशिश लोकसभा चुनाव तक कुछ ऐसा करने की है जिससे मंदिर निर्माण की प्रतिबद्धता का संदेश चला जाए।

इन तीरों से विपक्ष का बचना मुश्किल

राजनीति शास्त्री प्रो. आशुतोष मिश्र कहते हैं कि हिंदुत्व और राममंदिर संघ परिवार और भाजपा के तरकश के वह तीर हैं जिनसे बचना विपक्ष के लिए काफी मुश्किल है। संघ परिवार के लिए इस तीर का इस्तेमाल मजबूरी हो गया है।

उधर, केंद्र और प्रदेश दोनों जगह सरकारें होना भाजपा की बड़ी परीक्षा बन गया है। मामला सर्वोच्च न्यायालय में होने और जनवरी तक सुनवाई टालने से भाजपा की राह में कई दिक्कतें खड़ी हैं। राज्यसभा में भाजपा का बहुमत नहीं है ताकि वह कानून बना सके। पर, लोगों को इन बातों से मतलब नहीं। लोग कुछ मुद्दों पर केंद्र सरकार द्वारा अध्यादेश लाकर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से पलटने के उदाहरण देख चुके हैं। विपक्ष भी कानून बनाने की चुनौती दे रहा है।

संघ परिवार और भाजपा को पता है कि रक्षात्मक होना नुकसानदेह है। इसलिए आक्रामक रुख अपनाया है। यानी हिंदुत्व के दांव से विपक्ष को मात देने और संभावित गठबंधन के समीकरणों को ध्वस्त करने की कोशिश है। पांच राज्यों के चुनाव बाद ये तेवर और तीखे होंगे।

विपक्ष को घेरने की रणनीति

प्रो. मिश्र की बात सही लगती है। संघ की कोशिश चुनाव से पहले कुछ ऐसा करवाने की है जिससे जनता में मंदिर निर्माण पर प्रतिबद्धता का संदेश चला जाए। वह क्या होगा? यह आगे पता चलेगा। पर, हिंदुओं की ओर से कानूनी लड़ाई लड़ने वाले सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता पीएन. मिश्र की बात से भी इस मुद्दे पर 2019 की चुनावी बिसात बिछने के संकेत मिलते हैं।

मिश्र कहते हैं, राकेश सिन्हा का कानून बनाने के लिए निजी विधेयक लाने का मकसद विपक्ष को घेरना है। भाजपा इसका समर्थन कर मंदिर पर अपनी प्रतिबद्धता साबित करेगी और विपक्ष को घेरेगी।

मिश्र का आकलन सही है। सिन्हा ने राहुल सहित विपक्ष के कई नेताओं से विधेयक पर राय पूछकर यह जता दिया है। यानी लड़ाई असली और नकली हिंदुत्व की तरफ बढ़ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो संघ परिवार की व्यूहरचना राहुल और अखिलेश यादव जैसे नेताओं के मठ-मंदिरों के दौरे और हिंदुत्व के मानदंडों को लेकर जताई जा रही आस्था को बनावटी साबित करने की भी है।

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