कुछ इस तरह मुस्लिम पीड़ित महिला ने बयां किया अपना दर्द और बताया…

बरेली। शादी का पहला साल सुकून से गुजरा। लेकिन, इसके कुछ दिन बाद ही औलाद (बच्चे) न होने पर कलह शुरू हो गई। एक ऐसा मनहूस दिन आया जब शौहर ने मारपीट की। फिर तो रोज के झगड़े, मारपीट, तानों से जिंदगी नर्क बन गई। नशे के इंजेक्शन लगाए जाने लगे। शादी के तीसरे साल 2011 में मुझे तीन तलाक देकर घर से निकाल दिया गया। यह दर्द बयां किया ससुर से जबरन निकाह हलाला कराने का आरोप लगाने वाली पीडि़त महिला ने। कहा कि ‘बहुत हुई बदनामी, अब तो बस इंसाफ चाहिए।कुछ इस तरह मुस्लिम पीड़ित महिला ने बयां किया अपना दर्द और बताया...

बातचीत में उन्होंने बताया कि इन्कार किया तो नशे का इंजेक्शन देकर उसी हालत में बदायूं के किसी मौलाना को बुलाकर ससुर से मेरा निकाह कराया गया। इस जुल्म तक मैं टूट चुकी थी। मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था। मजबूरी में मैंने फिर ससुर से हलाला के बाद शौहर से निकाह किया। छह साल तक साथ रहे। इस बीच भी कोई औलाद नहीं हुई। शौहर, ससुराल वालों के जुल्म जारी रहे। वर्ष 2017 में उसने फिर तलाक दे दिया। तीन दिन घर में कैद रखा। मेरी मां मुहल्ले की कुछ औरतों के साथ लेने आईं तब तीसरी बार रखने के लिए देवर के साथ हलाला की शर्त रख दी गई।

निदा मिलीं तो दर्ज हुआ मुकदमा

दोबारा तलाक के बाद मैं मुकदमा कराने के लिए चार महीने भटकती रही। पुलिस ने नहीं सुनी। मुझे किसी ने बताया कि निदा खान तलाकशुदा औरतों की मदद करती हैं। मैं उनके पास पहुंची। वह थाने लेकर गईं। मुकदमा दर्ज कराया। रिश्तेदारों ने मना किया कि ससुर के साथ हलाला का जिक्र न करना। बदनामी होगी।

रसूले पाक की शरीयत पर कायम

मुझसे तलाक, हलाला का सुबूत मांगा जा रहा है। मेरे पूर्व शौहर कहते कि मैंने तलाक नहीं दिया। इस सूरत में अगर मैं शौहर के साथ रहने लगूं, तो यह सबसे बड़ा गुनाह होगा। तलाक के बाद बीवी शौहर पर हराम हो जाती है। कौन उलमा इस गुनाह की जिम्मेदारी लेंगे। मैं शरीयत पर कायम हूं, इसलिए मैंने कबूला कि मेरा तलाक हुआ है। इस्लाम ने औरत को यह हक दिया है। शरीयत के खिलाफ नहीं हूं बल्कि इसकी आड़ में जो गलत हुआ उसके खिलाफ मुंह खोला है।

भाई-रिश्तेदारों ने फेरा मुंह

मेरे दो भाई नाराज हैं। रिश्तेदारों ने मुंह फेर लिया। सिर्फ बहन का सहारा है। घर से निकलते ही ताने मिलते हैं कि शरीयत को बदनाम कर दिया। कोई मेरा दर्द नहीं समझता कि मैं कैसे जी रही हूं?

सात रुपये में तुरपाई

मैं सिले हुए कपड़ों की तुरपाई करती हूं। एक सूट के सात रुपये मिलते हैं। राशन कार्ड बना था। उससे अनाज मिल जाता। इस बार राशन भी नहीं लाई। कर्ज लेकर मुकदमा लड़ रही हूं। क्या खाऊंगी? कैसे न्याय का खर्च उठाऊंगी? इस घुटन में जीना मुश्किल है। पर अब मैं हार नहीं मानूंगी। इंसाफ लेकर रहूंगी।  

बोली हलाला पीडि़ता, अपनी ही नजरों में गिरी हूं मैैं 

कुछ मत पूछिए! तीन साल पुरानी हलाला की याद आने पर रूह कांप जाती है। इस जलालत से तो मरना अच्छा था। तब तो एक बार ही मरती, लेकिन अब रोजाना हर पल मरना पड़ता है। अल्लाह! किसी को ऐसा दिन न दिखाए कि हलाला करने को मजबूर होना पड़े। हलाला की शिकार एक पीडि़ता तथा बागपत के एक गांव निवासी दो बच्चों की मां का यह दर्द है। पीडि़ता बताती है कि अय्याशी को शौहर दूसरी महिला के पास जाता। जो कमाता उस महिला पर लुटा देता। विरोध करने पर मारपीट करता।

एक दिन एक झटके में तीन तलाक कहकर घर से निकाल दिया। इसके बाद मायके में तीन माह इद्दत की। कुछ समय बाद शौहर के रिश्तेदार फिर से तलाक देने वाले शौहर के साथ गृहस्थी बसाने का दबाव बनाने लगे। बिरादरी और रिश्तेदारों ने राबिया के अम्मी-अब्बा को मना लिया। अम्मी-अब्बा ने रिश्ते का वास्ता दिया। अब सोचिए कि इस हालात में वह क्या करती? मौलवी साहब ने हलाला की सलाह दी।

इसके तहत शौहर के बहनोई से राबिया का निकाह किया गया। बस! आगे मत पूछिए। जलालत की इंतहा हो गई। फिर उन्होंने तलाक दिया और फिर पुराने शौहर से निकाह किया। यह ठीक है कि पुराने शौहर के पास रह रहीं हैं, लेकिन ङ्क्षजदगी बोझ बन गई है, क्योंकि खुद की नजरों में गिरी-गिरी सी महसूस करती हूं। पीडि़ता ने तीन तलाक व हलाला पर रोक लगाने के सरकार के प्रयास की सरहाना की।

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