OMG! कहीं आप भी तो नहीं खाते किसी की तेरहवीं पर खाना

वास्तुशास्त्र एक ऐसा विज्ञान है, जो व्यक्ति के आसपास के वातावरण के अनुसार ही उसकी सफलता और असफलता निर्धारित करता है। ये लाइफ के हर पहलू पर अपनी छाप छोड़ता है। इसका सबसे बड़ा इम्पैक्ट देखने को मिलता है भोजन पर। महाभारत के अनुशासन पर्व में आए एक प्रसंग के अनुसार, महाभारत युद्ध से पहले श्री कृष्ण ने दुर्योधन के घर जाकर संधि करने को कहा। हर तरह से तर्क-वितर्क करने के बाद जब दुर्योधन टस से मस नहीं हुआ तो श्री कृष्ण वापिस जाने लगे। दुर्योधन ने उन्हें भोजन करने के लिए कहा तब श्रीकृष्ण ने कहा, ‘सम्प्रीति भोज्यानि आपदा भोज्यानि वा पुनैः’ OMG! कहीं आप भी तो नहीं खाते किसी की तेरहवीं पर खाना

अर्थात- हे दुर्योधन, जब खिलाने वाले और खाने वाले का मन प्रसन्न हो, तभी भोजन करना चाहिए लेकिन जब दोनों के दिल में दर्द और पीड़ा हो ऐसी स्थिती में कभी भी भोजन नहीं करना चाहिए।

महाभारत की इस कथा को बुद्धिजीवियों ने मृत्युभोज यानि तेरहवीं से जोड़ा है। जिसके अनुसार जब किसी सगे-संबंधी की मृत्यु हो जाती है। उस समय तेरहवीं पर आने वालों और जिनके घर में मौत हुई है, दोनों के मन में विरह का दर्द होता है। ऐसे में भोजन करवाने वाला और करने वाला दोनों ही दुखी होते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं, शोक में करवाया गया भोजन व्यक्ति की ऊर्जा का नाश करता है। अत: मृत्युभोज या तेरहवीं पर भोजन नहीं खाना चाहिए। 

गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है ‘आत्मा अजर, अमर है, आत्मा का नाश नहीं हो सकता, आत्मा केवल युगों-युगों तक शरीर बदलती है।’ 

किसी भी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने के बाद हिंदू संस्कृति में बहुत सारे संस्कार किए जाने का विधान है। जिनमें से किसी की मृत्यु के तेरहवें दिन भोजन करवाए जाने का विधान है। दशकों पहले तो केवल ब्राह्मणों को भोजन करवाया जाता था लेकिन आज के बदलते दौर में मृत्युभोज आयोजित किया जाता है।

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