नरौनी 40 साल में बन गया इंजीनियरों का गांव, पहले खेती-बाड़ी से करते थे गुजारा
गया। संस्थागत विकास और प्रेरणा किसी इलाके की तस्वीर कैसे बदल देती है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण देखना है तो नरौनी आइये। नरौनी को इंजीनियरों का गांव कह सकते हैं। यह ऐसा था नहीं, परंतु करीब 40 वर्षों में पीढिय़ां बदल गईं। गांव बदल गया। कैसे? ये जानना खुद में रोचक है।
पहले किसी तरह होता था गुजारा
गया जिला मुख्यालय की उत्तर-पूर्वी दिशा में नीमचक बथानी प्रखंड का एक गांव है नरौनी। आज से करीब चार दशक पहले तक ये गांव भी पिछड़ा था। कृषि पर आधारित लोग किसी तरह जीविकोपार्जन करते थे। इसी गांव के चंद्रदेव प्रसाद 1980 में इंजीनियर बने। वैसे तो इंजीनियर होना ही बड़ी बात है, पर तब बात कुछ और थी। कोई इंजीनियर-डॉक्टर बना नहीं कि आसपास के जिलों के लोग भी जान जाते थे।
…और पैदा हुई शिक्षा की ललक
इसके बाद तो जैसे होड़ लग गई। लोगों में शिक्षा की ललक पैदा हुई। पढ़ाई-लिखाई के प्रति झुकाव बढ़ा। प्रेरणास्रोत बने चंद्रदेव प्रसाद। इसके बाद तो साल गुजरता गया और इंजीनियरों की तादाद बढ़ती गई। कल तक सिर्फ खेती पर आश्रित रहने वाले लोगों के घर में नकद पैसे आने लगे। रहन-सहन बदला और देखते-देखते गांव की तस्वीर।
डेढ़ सौ लोग विभिन्न पदों पर
करीब दो हजार की आबादी वाले इस गांव में समृद्धि दूर से ही नजर आती है। यहां विभिन्न जातियों के लोग रहते हैं, पर कुशवाहा समुदाय की आबादी पाँच सौ है। इनमें डेढ़ सौ लोग सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्र में अच्छे पदों पर हैं। सबसे अधिक इंजीनियर हैं। गांव मेें 47 इंजीनियर, 40 शिक्षक, पांच डॉक्टर और 24 बैंक, रेलवे व अन्य सेवाओं में आज की तारीख में कार्यरत हैं।
गांव के स्कूल से ही पढ़े थे चंद्रदेव
चंद्रदेव प्रसाद बताते हैं कि उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही विद्यालय में हुई। इसके बाद पास के पास के गांव नैली उच्च विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा पास की। मानपुर स्थित जगजीवन कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी करने के बाद बीआइटी सिंदरी से इंजीनियङ्क्षरग की डिग्री ली।
लड़कियां भी पीछे नहीं
इस समय गांव में अजय कुमार वर्मा, प्रमोद कुमार, संतोष कुमार, शशि कुमार, शशिकांत सिन्हा के साथ सोनी कुमारी, कुमारी मोनी, श्वेता कुमारी, कुमारी जौनी आदि भी विभिन्न प्रतिष्ठानों में कार्यरत हैं। रंधीर कुमार लालू, गुडिय़ा कुमारी, कुमार रवि, मनीष कुमार, राजीव कुमार, गुडिय़ा कुमारी, प्रतियूष राज, अमित कुमार, विकास कुमार, सोनी कुमारी एवं गुडिय़ा कुमारी आदि इंजीनियङ्क्षरग की पढ़ाई कर रहे हैं। नवीन कुमार, रविकांत सिन्हा, मंजीता सिन्हा, शिल्पी सिन्हा और सुजाता वर्मा डॉक्टर हैं।
इस गांव ने ऐसे बनाई पहचान
आज यहां प्राथमिक से लेकर उच्च विद्यालय तक है, पर आज से चालीस साल पहले ऐसा नहीं था। आज बच्चे यहीं से माध्यमिक तक की पढ़ाई कर रहे हैं। पूर्व मुखिया वीरेंद्र कुमार बताते हैं कि इस गांव में एक शिक्षाप्रेमी थे। उनका नाम परमेश्वर दयाल था। बच्चों को पढ़ाते रहते थे। चंद्रदेव प्रसाद के बाद सिलसिला शुरू हो गया।
स्कूल की स्थापना से बदली सूरत
ग्रामीण भारत भूषण और उपेंद्र प्रसाद बताते हैं कि यहां रामचंद्र प्रसाद और मोहन प्रसाद के सहयोग से उच्च विद्यालय खुला। उन्होंने विद्यालय के लिए जमीन दी थी। अगर गांव में उच्च विद्यालय नहीं होता तो शायद आज इतनी बड़ी संख्या में यहां के लोग इन पदों पर नहीं होते। यह संस्थागत विकास था, जिसने यहां की जिंदगी बदल दी।





