सावन के आखिरी दिनों में करे शिवजी के इस रूप की पूजा, हर लेंगे सारे दुख-दर्द कर देगे मालामाल

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सावन के महीने में पृथ्वी पर हर ओर हरियाली की मखमली चादर पसर जाती है। प्रकृति की समस्त कृतियां अपने सर्वोत्तम स्तर पर होती हैं। शिव और सावन एक-दूसरे के पूरक हैं। 

बृहस्पति ज्ञान के देवता हैं अतः 23 अगस्त को एक अद्भुत संयोग है जहां एक तरफ संघारक शिव हैं दूसरी तरफ उत्पत्तिकर्ता शक्ति प्रकृति के रूप में पृथ्वी पर विद्यमान हैं तथा बृहस्पति देव धर्म और ज्ञान के प्रदाता बन सर्वजन के मन में भक्ति ज्ञान और निष्ठा प्रदान करते हैं। भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में हालांकि सौर पंचांग के अनुसार त्यौहार मनाए जाते हैं, लेकिन भारत के अधिकांश क्षेत्रों में चंद्रमास के अनुसार त्योहार मनाए जाते हैं। 

 

ताड़केश्वर महादेव की पौराणिक मान्यता
शिव पुराण के अनुसार ताड़कासुर ताड़ नामक असुर (ताड़ वृक्ष) का पुत्र व तारा का भाई था। ताड़कासुर ने ब्रह्मा से वर पाने हेतु घोर तप किया व उन्हें प्रसन्न करके दो वर प्राप्त किए। ताड़कासुर ब्रह्मा से वरदान पाने के बाद और भी अत्याचारी हो गया क्योंकि ब्रह्माजी के वर अनुसार ताड़कासुर का वध मात्र शिव पुत्र ही कर सकता था, अतः कार्तिकेय का जन्म हुआ, जिन्होंने ताड़कासुर का वध किया।

कथानुसार विवाहोपरांत जब भगवान शंकर व मां पार्वती कैलाशधाम में रमण करने लगे। कार्तिकेय का जन्म हुआ व देवता भी प्रफुल्लित हो उठे। कुमार का जन्म गंगा में हुआ व पालन कृतिका आदि छह देवियों ने किया। ताड़कासुर ने आतंक की अति कर दी। इंद्र, वीरभद्र व प्रमथगणों को युद्ध से भागने पर विवश कर दिया। भगवान विष्णु भी व्यथित हो उठे। तब ब्रह्माजी ने कार्तिकेय का आह्वान किया। कार्तिकेय ने माता-पिता को प्रणाम कर कांतिमति शक्ति को हाथ में लेकर ताड़कासुर पर भीषण प्रहार किए, जिससे उसके अंग क्षत-विक्षत हो गए व धरती पर निष्प्राण होकर गिर पड़ा।

ज़िंदगी से प्यार है तो जान लीजिये मात्र ये एक संकेत, कभी नही होगी आपकी मृत्यु

रूद्र सहिंता अनुसार ताड़केश्वर महादेव का संबंध ताड़ के वृक्षों से है। मान्यतानुसार ताड़कासुर वध उपरांत भगवान शंकर इस स्थान पर विश्राम किया था जब माता पार्वती ने देखा कि भगवान शिव को सूर्य की गर्मी लग रही है तो माता पार्वती ने स्वयं देवदार के वृक्षों का रूप धरा और भगवान शंकर को छाया प्रदान की। ताड़केश्वर महादेव के प्रांगण में आज भी वे सात ताड़ के पेड़ विराजमान हैं।

रामायण में भी ताड़केश्वर का वर्णन एक पवित्र तीर्थ के रूप् में मिलता है। यहां बाबा ताड़केश्वर महादेव के पास लोग अपनी मुरादें लेकर आते हैं और भोलेनाथ अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते हैं। ताड़केश्वर महादेव ताड़ के विशाल वृक्षों के बीच में स्थित पौराणिक मंदिर है। यहां आने मात्र से ही मन को सुकून मिलता है। जनपद पौड़ी गढ़वाल के रिखणीखाल विकासखण्ड से लगभग पच्चीस किलोमीटर बांज तथा बुरांश की जंगलों के बीच चखुलियाखांद से लगभग सात किलोमीटर उत्तर पूर्व में स्थित है ताड़केश्वर महादेव मंदिर।

 

ताड़केश्वर महादेव उपाय

गुरूवार को पीले रंग के कपड़े पहनें, शिव पूजा हेतु पीले आसान का प्रयोग करें। शुद्ध घी में हल्दी मिलाकर दीपक करें। धूप जलाएं। पीले फूल चढाएं। पीत चंदन से शिवलिंग अथवा महादेव के चित्र पर त्रिपुंड बनाएं। केसर मिश्रित दूध शिवलिंग तथा महादेव के चित्र पर अर्पित करें। पीतल के लोटे में पानी और शहद मिलाकर शिवलिंग का अभिषेक अथवा महादेव के चित्र पर पत्ते से चढाएं। भोग स्वरुप केला अर्पित करें और ताड़केश्वर शिव के मंत्र का एक माला जाप करें।  

मंत्र: ॐ स्त्रों ताड़केश्वर रुद्राय ममः दुर्भाग्य नाशय नाशय फट।। 

इस उपाय से निश्चित ही कुछ ही समय में दुर्भाग्य आपके घर का रास्ता भूल जाएगा। इस उपाय से जीवन से दुर्भाग्य के कारण उत्त्पन्न सारी परेशानीयां दूर होती हैं। व्यक्ति धर्म मार्ग पर अग्रसर होता है तथा परमेश्वर शिव भक्त को भवसागर से तार देते हैं। 

 

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