नई दिल्ली । दिल्ली की सत्ता पर कब्जा करने के बाद देश की सियासत में विकल्प बनने का सपना देख रहे अरविंद केजरीवाल की मुश्किल लगातार बढ़ती जा रही है। आम आदमी पार्टी (आप) का ग्राफ लगातार नीचे गिर रहा है। बवाना विधानसभा उपचुनाव छोड़ दिया जाए तो अन्य चुनावों में ‘आप’ का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा है। वहीं, एक के बाद एक उनके करीबी नेता उनसे किनारा करने लगे हैं। इससे उनके सामने सियासी वजूद को कायम रखने और जनता में अपना विश्वास बनाए रखने का संकट खड़ा होने लगा है।टूट की कगार पर 'आप', करीबियों ने भी छोड़ा केजरीवाल का साथ...

पार्टी में जो अंदरूनी लड़ाई चल रही है, उससे आने वाले दिनों में संकट और बढ़ने वाला है। छह साल पूर्व बनी आम आदमी पार्टी में लगभग साढ़े तीन वर्षों से भगदड़ मची हुई है। बारी-बारी से इसके संस्थापक सदस्य या फिर बाद में आने वाले बड़े चेहरे इसे अलविदा कह रहे हैं, जबकि कई बड़े नेता बगावत की राह पर हैं। यह स्थिति पंजाब से लेकर दिल्ली तक है। इससे पार्टी में बेचैनी है।

संकट में ‘आप’

एक सप्ताह के अंदर आशुतोष व आशीष खेतान के पार्टी छोड़ने से शीर्ष नेतृत्व के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। इसके कारण भी हैं। दोनों पार्टी के रणनीतिकार होने के साथ ही लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी भी रह चुके हैं। आशुतोष को पार्टी ने भाजपा के डॉ. हर्षवर्धन और कांग्रेस के कपिल सिब्बल जैसे कद्दावर नेताओं के सामने चांदनी चौक से लोकसभा चुनाव में उतारा था और वह दूसरे स्थान पर रहे थे। इसी तरह से खेतान नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र से भाजपा की मीनाक्षी लेखी और कांग्रेस के अजय माकन के खिलाफ चुनाव लड़े थे। वह भी दूसरे स्थान पर रहे थे।

…तो इसलिए बढ़ गई थी नाराजगी  

खेतान दिल्ली डायलॉग कमीशन के उपाध्यक्ष रहने के साथ ही केजरीवाल के विश्वासपात्र भी थे। बताया जा रहा है कि दोनों नेता शीर्ष नेतृत्व के कामकाज के तरीके से नाराज थे। वे अपने आप को उपेक्षित भी महसूस कर रहे थे। जिस तरह से पार्टी के लिए पसीना बहाने वालों को नजरअंदाज कर दो उद्योगपतियों को राज्यसभा में भेजा गया, इससे इनकी नाराजगी और बढ़ गई थी। आखिरकार इन्होंने पार्टी छोड़ने का फैसला कर लिया। इनकी नाराजगी पार्टी के लिए महंगी साबित हो सकती है, इसलिए इनकी मान-मनौव्वल की भी कोशिश हो रही है।

बिगड़ सकता है चुनावी समीकरण

दरअसल, कुमार विश्वास और दिल्ली सरकार में मंत्री रहे कपिल मिश्रा लगातार पार्टी नेतृत्व पर हमलावर हैं। ऐसे में अन्य बड़े नेताओं की नाराजगी से दिल्ली में चुनावी समीकरण बिगड़ सकता है। वैसे भी दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद केजरीवाल दिल्ली में नगर निगम चुनाव व राजौरी गार्डन विधानसभा उपचुनाव बुरी तरह से हार चुके हैं। सिर्फ बवाना विधानसभा उपचुनाव में ही उन्हें जीत नसीब हुई है। अब लोकसभा चुनाव नजदीक है और पार्टी अंदरूनी कलह से जूझ रही है। यह पार्टी के लिए शुभ नहीं है।