हरियाणा में भी हो चुका है कर्नाटक जैसा ड्रामा

नई दिल्ली। कर्नाटक का सियासी नाटक अपने चरम पर है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि यह पहली बार हुआ है। आज से करीब 36 साल पहले हरियाणा में 21 से 23 मई 1982 तक कर्नाटक जैसा ही राजनीतिक घटनाक्रम हुआ था। लोकदल नेता चौधरी देवीलाल और भाजपा नेता डॉ. मंगल सेन (अब दोनों इस दुनिया में नहीं हैं) चंडीगढ़ में हरियाणा के राज्यपाल जीडी तपासे से मिले और उन्हें 90 में से 46 विधायकों के हस्ताक्षर वाला समर्थन पत्र सरकार बनाने के लिए सौंपा। राज्यपाल ने विधायकों के हस्ताक्षर की सत्यता की जांच करने के लिए दोनों नेताओं को 24 मई तक इंतजार करने को कहा और 23 मई को ही 36 विधायकों वाली कांग्रेस के नेता चौधरी भजन लाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी।हरियाणा में भी हो चुका है कर्नाटक जैसा ड्रामा

राज्यपाल ने भजन लाल को बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय भी दिया। इससे नाराज चौधरी देवीलाल और डॉ. मंगल सेन ने विधायकों के साथ चंडीगढ़ राजभवन में परेड भी की, मगर हरियाणा राजभवन में उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई। तब भाजपा के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने इस संबंध में तत्कालीन राष्ट्रपति से विरोध भी जताया था। इन दोनों नेताओं ने तब आरोप लगाया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के इशारे पर राज्यपाल ने बहुमत के गठबंधन को मौका नहीं दिया। 1982 के विधानसभा चुनाव में हरियाणा की सभी 90 सीटों पर लोकदल और भाजपा गठबंधन ने चुनाव लड़ा था। इनमें 31 पर लोकदल और छह पर भाजपा प्रत्याशी जीते। कांग्रेस के 36 और स्वर्गीय जगजीवन राम की पार्टी कांग्रेस (जे) के 3 विधायक जीते थे। 16 विधायक निर्दलीय थे।

देवीलाल समर्थक युवक ने राज्यपाल के मुंह पर कालिख पोती 

राज्यपाल से खफा चौधरी देवीलाल समर्थक बहादुरगढ़ के युवक जोगिंद्र सिंह हुड्डा ने 15 अगस्त 1982 को फरीदाबाद के वाईएमसीए ग्राउंड में राज्य स्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह में राज्यपाल जीडी तपासे के मुंह पर कालिख पोत दी। चौधरी देवीलाल ने स्वयं फरीदाबाद के पुलिस थाने पहुंचकर जोगिंद्र का बचाव किया था।

तपासे पर था केंद्र का दबाव : महिपाल सिंह 

हरियाणा लोकसंपर्क विभाग के पूर्व संयुक्त निदेशक महिपाल सिंह ने बताया,  ‘तत्कालीन राज्यपाल जीडी तपासे पुराने गांधीवादी नेता थे और उन्हें यह पद पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से संपर्क के कारण मिला था। तपासे नहीं चाहते थे कि हरियाणा में उनके रहते जोड़-तोड़ की सरकार बने मगर राजनीति के पीएचडी कहलाने वाले भजनलाल ने उन्हें (राज्यपाल) तब इंदिरा गांधी के खासमखास धीरेंद्र ब्रह्मचारी व आरके धवन से कहलवाया था।

यहां तक भी कहा जाता है कि तपासे को तब केंद्र के इशारे पर एक नेता ने यह भी कह दिया था कि यदि भजनलाल को रविवार के दिन शपथ नहीं दिलाई तो वह अपना इस्तीफा भेज दें। इसी कारण राज्यपाल ने रविवार के दिन ही भजन लाल को शपथ दिलवाई थी।’ भाजपा कर्नाटक में कांग्रेस के साथ ठीक बर्ताव कर रही है। वैसे भाजपा और कांग्रेस को राष्ट्रीय दल के रूप में अतीत से सबक लेना चाहिए। जनता द्वारा चुनी हुई सरकार के सामने जोड़तोड़ की सरकार बनाने का दुष्परिणाम ठीक वैसे ही होता है जैसा हरियाणा में 1982 के बाद 1987 में हुआ।

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