रन बनाना ही नहीं, कंप्यूटर से भी पास होना जरूरी…तब होगी टीम में एंट्री…

टीम इंडिया के लिए फिटनेस का मुद्दा अहम हो चुका है. क्रिकेट की तीनों विधाओं (बल्लेबाजी, गेंदबाजी और फील्डिंग) में फिटनेस काफी जरूरी है. दरअसल, आज का क्रिकेट 10 वर्ष पहले खेले जाने वाले क्रिकेट से काफी बदल गया है.

It's not necessary to run a run, even in the computer it is necessary ...

पहले चीजें अलग थीं, लेकिन अब खेल में काफी तेजी आई है. अब खिलाड़ी को फिट रहना ही होगा. अगर कोई फिट नहीं है, तो टीम  उसका बोझ नहीं उठाएगी. इसी वजह से इन दिनों टीम इंडिया के चयन प्रक्रिया में कई चौंकाने वाले फैसले सामने आए हैं.

टीम इंडिया के कंडिशनिंग कोच शंकर बासु ने किसी भी सीरीज के दौरान खिलाड़ियों के लिए रैंडम फिटनेस टेस्ट जरूरी बना दिया है. इसके तहत खिलाड़ियों को कडे़ ट्रेनिंग ड्रिल्स से गुजरना होता है. खिलाड़ियों की फिटनेस को तय करने वाले ‘यो-यो टेस्ट’ बासु की परियोजना है. इसी के तहत युवराज सिंह को टीम से बाहर रखा गया है.

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बताया जाता है कि औसतन ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर यो-यो टेस्ट में 21 का स्कोर बनाते हैं. यहां विराट, रवींद्र जडेजा और मनीष पांडे लगातार यह स्कोर बनाते हैं, जबकि अन्य 19.5 या इससे अधिक का स्कोर हासिल करते हैं. अगर कोई खिलाड़ी इससे कम का स्कोर बनाता है, तो वह फिटनेस के दायरे में नहीं आता है.

नब्बे के दशक के भारतीय खिलाड़ियों में से मोहम्मद अजहरुद्दीन, रोबिन सिंह और अजय जडेजा को छोड़कर अधिकतर 16 से 16.5 का स्कोर बनाते थे. लेकिन अब स्थिति अलग है और कप्तान खुद ही मानदंड स्थापित कर रहा है.

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क्या करना होता है यो-यो टेस्ट में

अब यो-यो टेस्ट को भी समझ लें. कई ‘कोन’ की मदद से 20 मीटर की दूरी पर दो पंक्तियां बनाई जाती हैं. एक खिलाड़ी रेखा के पीछे अपना पांव रखकर शुरुआत करता है और निर्देश मिलते ही दौड़ना शुरू करता है. खिलाड़ी लगातार दो लाइनों के बीच दौड़ता है और जब बीप बजती है तो उसने मुड़ना होता है.

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हर एक मिनट या इसी तरह से तेजी बढ़ती जाती है. अगर समय पर रेखा तक नहीं पहुंचे तो दो और ‘बीप’ के अंतर्गत तेजी पकड़नी पड़ती है. अगर खिलाड़ी दो छोरों पर तेजी हासिल नहीं कर पाता है तो परीक्षण रोक दिया जाता है. यह पूरी प्रक्रिया सॉफ्टवेयर पर आधारित है, जिसमें नतीजे रिकॉर्ड किए जाते हैं.

 

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