HC का सरकार को आदेश: 30 दिन में लाए नई व्यवस्था, पोषण आहार का पुराना सिस्टम खत्म

  • इंदौर/ भोपाल. इंदौर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने आंगनबाड़ियों को पोषण आहार वितरण की नई व्यवस्था 30 दिन में शुरू करने का फैसला दिया है। हाईकोर्ट ने मौजूदा व्यवस्था को ही जारी रखने के लिए दायर याचिका को खारिज कर दिया है।
    -एक साल पहले इस सिस्टम की खामियों को प्रमुखता से उजागर किया था। तब सरकार ने स्वसहायता समूहाें को यह काम देने की घोषणा की थी।
    HC का सरकार को आदेश: 30 दिन में लाए नई व्यवस्था, पोषण आहार का पुराना सिस्टम खत्म
    -महाभ्युदय स्वैच्छिक संगठन ने पिछले साल अक्टूबर में जनहित याचिका दायर की थी। इसमें कहा था कि मौजूदा सिस्टम को ही नियमित रखा जाए। इस पर हाई कोर्ट ने स्थगन दिया था।
    -वैसे सरकार के साथ कंपनियों का करार 31 मार्च 2017 को ही खत्म हो चुका है। मगर स्थगन की आड़ में यह कारोबार अब तक जारी रहा।
    -प्रदेश में हर साल कुपोषित बच्चों के पोषण आहार पर करीब 1200 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। सरकार ने स्टे और याचिका खारिज कराने के लिए जवाब पेश किया था।
    -अब कोर्ट ने भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशाें के अनुसार राज्य सरकार नई व्यवस्था बनाए।
    -जस्टिस सतीशचंद्र शर्मा और जस्टिस आलोक वर्मा की बेंच ने यह अहम फैसला दिया है।

    सरकार की दलील: स्टे के कारण नीति नहीं बना पाए

    -सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता मनोज द्विवेदी ने कहा कि केंद्र सरकार ने समन्वित बाल विकास योजना के लिए कमेटी बनाई है। यह कमेटी सरकार को नए सिस्टम को लेकर सुझाव देगी।
    -शासन चाहता है कि गांव-गांव में महिला संगठन, स्वयंसेवी संगठन पोषण आहार बनाकर वितरण करें। मौजूदा संस्था के साथ एग्रीमेंट खत्म हो चुका है। उसे मिला स्टे खारिज किया जाए।

    -वहीं, संस्था की ओर से कहा गया कि इस सिस्टम में कोई खामी नहीं है। सरकार के पास अभी कोई नई नीति भी नहीं है। इसलिए यही व्यवस्था रखी जाए।

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    पीयूसीएल के तर्क: कंपनियों की कमाई का जरिया बना दिया

    -पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज पीयूसीएल ने अक्टूबर 2016 में इंटरवेंशन एप्लीकेशन के जरिए कोर्ट को इस सिस्टम की खामियों के बारे में बताया।
    -पीयूसीएल के वकील विनय झेलावत और प्रत्यूष मिश्रा ने कहा कि पोषण आहार प्रदेश में कंपनियों की कमाई का जरिया बन गया है। किसी तरह की मॉनीटरिंग नहीं है।
    -क्वालिटी और क्वांटिटी को लेकर घपले हैं। हर हाल में यह काम स्वसहायता समूहों को ही दिया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी वर्ष 2004 में यही कहा था।

    एमपी स्टेट एग्रो के साथ अनुबंधित तीन कंपनियां

    -एमपी एग्रो न्यूट्री फूड प्रायवेट लि.
    -एमपी एग्रोटॉनिक्स लिमिटेड
    -एमपी एग्रो फूड इंडस्ट्रीज
    -इन कंपनियों के साथ 2012 में एकमुश्त 5 साल का अनुबंध किया गया।
    -आंगनबाड़ियों को पोषण आहार सप्लाई का सालाना बजट 1200 करोड़ रु. है।

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    सरकार को करनी पड़ेगी एक नवंबर से नई व्यवस्था, महिला स्वयं सहायता समूह एवं मंडल ले सकेंगे ठेका

    -पोषण आहार सप्लाई करने की नई व्यवस्था एक नवंबर से लागू हो जाएगी। यह काम प्रोडक्शन यूनिट वाली कंपनियों के साथ महिला स्वयं सहायता समूहों व महिला मंडलों को दिया जाएगा।
    -महिला एवं बाल विकास विभाग ने टेंडर डॉक्यूमेंट तैयार कर लिया है। अंतिम फैसला कैबिनेट करेगी। प्रस्तावित नई नीति केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। जिसमें कहा गया है कि किसी एक एजेंसी की बजाय गांव-गांव में महिला स्वयं सहायता समूह और महिला मंडल पोषण आहार बनाकर सप्लाई करें।
    -सरकार ने वर्तमान में पोषण आहार सप्लाई कर रही कंपनियों का ठेका पिछले माह तीन माह के लिए बढ़ा दिया था। यानी 30 अक्टूबर तक काम करेगी।
    -सूत्रों ने बताया कि प्रस्तावित नीति के मुताबिक राज्य की सभी आंगनबाड़ियों में पोषण आहार सप्लाई करने के लिए एक टेंडर नहीं होगा, बल्कि क्षेत्रवार निविदाएं बुलाई जाएंगी।
    -सरकार की शर्त होगी कि पोषण आहार तैयार करने के लिए प्लांट में हाईटेक ऑटोमेटिक मशीनें होनी चाहिए। वर्तमान में केवल चार प्लांटों में यह सिस्टम है।
    -इसमें से एक एमपी एग्रो के बाड़ी स्थित प्लांट और निजी कंपनी के इंदौर में एक और मंडीदीप में दो प्लांट हैं।

    पीयूसीएल के4 अहम तर्क

    -सुप्रीम कोर्ट ने 7 अक्टूबर 2004 को निर्देश दिए थे कि ठेकेदारों को यह काम नहीं दिया जाए। ग्राम समितियों, स्वयं सहायता समूहों और महिला मंडलों से काम लें।
    -13 दिसंबर 2006 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सभी राज्यों के मुख्य सचिव शपथ पत्र दें कि पोषण आहार की आपूर्ति में ठेकेदारों को शामिल न करने के निर्देश पर क्या कदम उठाए? 
    -चूंकि मध्यप्रदेश में स्वयं सहायता समूह पोषण आहार बनाने और वितरण में हैं, ऐसे में टेक होम राशन का काम भी उन्हें ही सौंपा जा सकता है। इसमें किसी कंपनी की जरूरत नहीं।
    -पोषण आहार में विकेन्द्रीकरण इसलिए जरूरी है क्योंकि स्व-सहायता समूहों के हाथ में काम होने से भोजन की गुणवत्ता और व्यवस्था की निगरानी ज्यादा बेहतर होगी।

    सीबीआई से कराई जाए घोटाले की जांच

    सालों से जो लोग पोषण आहार की सप्लाई का काम कर रहे हैं उनकी जांच सीबीआई से कराई जानी चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि उनको किनका संरक्षण प्राप्त था।
    अजय सिंह, नेता प्रतिपक्ष
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