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प्यार को हमेशा रखना है बरकरार तो रिलेशनशिप में भूलकर भी न करें ये गलतियां

पर्सनल स्पेस

किसी भी रिलेशन में एक स्पेस बहुत जरुरी होता है। हर इंसान की अपनी एक ज़िदंगी होती है। अपने हिस्से का आसमान होता है। तो हर समय बेवजह दखल नहीं करनी चाहिए इससे रिश्तों में सिर्फ दूरियां आती हैं। ये बात सिर्फ पति-पत्नी या प्रेमी प्रमिका पर ही लागू नहीं होती बल्कि हर रिश्ते पर लागू होती है।

आमतौर पर हम जिनसे जुड़ते हैं, उन्हें बांधना चाहते हैं। एक हक का भाव चाहे-अनचाहे उस रिश्ते से जुड़ ही जाता है। जो कभी-कभी बेड़ी बन जाता है, लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि हर हक जिम्मेदारी से भी जुड़ा होता है। अधिकार के साथ एक ड्यूटी भी मिलती है। यह जिम्मेदारी उस इंसान की खुशियों से जुड़ी होती है, जिसे हम अपना समझ अधिकार जमाते हैं। ऐसे में उन्हें मन का करने और जीने की छूट न मिले, तो वे खुश नहीं रह सकते।

पर्सनल स्पेस किसी भी रिलेशन में एक स्पेस बहुत जरुरी होता है। हर इंसान की अपनी एक ज़िदंगी होती है। अपने हिस्से का आसमान होता है। तो हर समय बेवजह दखल नहीं करनी चाहिए इससे रिश्तों में सिर्फ दूरियां आती हैं। ये बात सिर्फ पति-पत्नी या प्रेमी प्रमिका पर ही लागू नहीं होती बल्कि हर रिश्ते पर लागू होती है। आमतौर पर हम जिनसे जुड़ते हैं, उन्हें बांधना चाहते हैं। एक हक का भाव चाहे-अनचाहे उस रिश्ते से जुड़ ही जाता है। जो कभी-कभी बेड़ी बन जाता है, लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि हर हक जिम्मेदारी से भी जुड़ा होता है। अधिकार के साथ एक ड्यूटी भी मिलती है। यह जिम्मेदारी उस इंसान की खुशियों से जुड़ी होती है, जिसे हम अपना समझ अधिकार जमाते हैं। ऐसे में उन्हें मन का करने और जीने की छूट न मिले, तो वे खुश नहीं रह सकते।

दूसरों की परिस्थिति में खुद को रखकर देखें

कभी कभी हम अपने साथी की गलतियां ही गलतियां देखते हैं बगैर उनकी परिस्थिति को समझें। तो आप ये भूल कर भी न करें। साथी में हजारों कमियां और गलतियां ढूंढकर झगड़ने से पहले उनकी परिस्थिति में खुद को रखकर देखें। अपने हों या पराए, उन्हें गलत साबित करने की कोशिश में समय जाया करने की बजाय उस परिस्थिति में अपनी बात सही ढंग से रखें।

आपको तो अपनी पॉजिटिव बातों और व्यवहार से खुद की पर्सनैलिटी का सकारात्मक पहलू सामने रखना है। समय रहते समझिए कि रिश्ते आपस में पेच लड़ाने के लिए नहीं, बल्कि साथ-साथ उड़ान भरने और जिंदादिली से जीने के लिए होते हैं। हर रिश्ते में सहयोगी रवैया ही काम आता है। न कि एक-दूजे को कमतर महसूस करवाने वाला व्यवहार।

ठहराव

किसी भी रिश्ते को समझना है तो हमेशा पतंग का उदाहरण जहन में रखिए। रिश्ते ठीक पतंग की डोर की तरह होते हैं। आपसी जुड़ाव ही ठहराव लाता है। पतंग और डोर एक दूसरे से कट जाएगी तो उस पतंग का फिर कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाएगा। पतंग को डोर की और डोर को पतंग की हमेशा ही जरुरत रहती है। एक दूजे से कटकर जिंदगी के कोई मायने नहीं। पतंग भी डोर से बंधी है, तो जमीन से जुड़ी रहती है। ठीक इसी तरह रिश्तों में जुड़ाव बना रहता है, तो ठहराव आता है। गहराई आती है, जिससे खुशियां ही नहीं, गम भी साझा करने का हौसला मिलता है। रिश्तों के धागे इसी जुड़ाव का तानाबाना बुनते हैं।

इसीलिए हमेशा एक दूसरे को सपोर्ट करें ताकि ये डोर उलझे ना।

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