स्वर्ग से अमृत लाने वाले गरुड़ कैसे बने भगवान विष्णु के वाहन?

हिंदू धर्म में गरुड़ पुराण को एक अधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इसमें व्यक्ति की मृत्यु के बाद की यात्रा का वर्णन किया गया है। अठारह महापुराणों में से एक गरुड़ पुराण स्वयं जगत के पालनहार भगवान विष्णु द्वारा गरुड़ को सुनाया गया था। भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ हैं।

हिंदू धर्म में प्रभु के वाहन को शक्ति, गति, निष्ठा और धर्म का प्रतीक माना जाता है। क्या आप जानते हैं कि भगवान विष्णु ने गरुड़ को अपना वाहन क्यों बनाया? अगर नहीं, तो आइए इस आर्टिकल में आपको इसके पीछे की वजह के बारे में विस्तार से बताते हैं।

गरुड़ कैसे बने विष्णु जी के वाहन?
पौराणिक कथा के अनुसार, गरुड़ की माता का नाम विनता था। वे नागों की माता कद्रू की दासी थीं। कद्रू ने गरुड़ से कहा कि अगर तुम मेरे पुत्रों के लिए स्वर्ग से अमृत ला दोगे, तो तुम्हारी माता दासत्व से मुक्त हो जाएंगी।

समुद्र मंथन से देवताओं ने असुरों से जो अमृत कलश प्राप्त किया था, उसे गरुड़ देवताओं से छीन लाए थे। इसके पीछे की वजह यह थी कि गरुड़ अपनी माता को नागों की माता कद्रू की दासता से छुटकारा दिलाना चाहते थे। जब गरुड़ स्वर्ग पहुंचे, तो उन्होंने वहां से अमृत का कलश ले लिया। सभी देवताओं ने गरुड़ से अमृत का कलश बचाने के लिए खूब प्रयास किया, लेकिन गरुड़ कलश को लेकर उड़ गए। इसके बाद जब गरुड़ कलश लेकर कद्रू के पास पहुंचे, तो उन्होंने कद्रू से कहा कि मैं कलश ले आया हूं। अब आप मेरी माता को मुक्त कर दें। कद्रू ने अपने वचन के अनुसार विनता को मुक्त कर दिया। इसके बाद देवराज इंद्र अमृत का कलश उठाकर वापस स्वर्ग लोक ले गए।

जब इस बात का पता नागों को चला, तो वे बहुत ही दुखी हुए। अमृत की लालसा में वे उस कुशा को ही चाटने लगे जिस पर कलश रखा गया था। कुशा के तेज किनारों की वजह से उनकी जीभ हमेशा के लिए दो हिस्सों में कट गई।

गरुड़ की मातृभक्ति को देखकर भगवान विष्णु प्रसन्न होकर प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि पक्षीराज मैं तुम्हारी मातृभक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हूं और चाहता हूं कि तुम मेरे वाहन के रूप में सदैव मेरे साथ रहो। भगवान विष्णु के इस प्रस्ताव को गरुड़ ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। गरुड़ ने कहा कि वे स्वयं को बहुत धन्य मानते हैं और अब से अपना जीवन प्रभु की सेवा में व्यतीत करेंगे। इसी प्रकार गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन बने। गरुड़ के वाहन बनने का वर्णन गरुड़ पुराण के आचार खंड में मिलता है।

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