टीनएज बच्चों से बात-बात पर होती है बहस? दादा-दादी की तरह दोस्त बनकर ऐसे सुधारें अपना रिश्ता

14 साल की रिया की हर छोटी बात से उसकी मां मैथिली को इतनी नाराजगी रहती है कि कई बार मैथिली खुद परेशान हो जाती हैं। वो नहीं चाहती कि रिया को ऐसे हर बात पर डांटें, मगर दिनभर में कुछन कुछ ऐसा हो ही जाता है कि मां-बेटी में खटपट हो जाती है। रिया के पास एक ही ट्रंप कार्ड है-उसकी दादी।
बस दादी ही हैं जो मैथिली की तरह रिया की हर बात पर गुस्सा नहीं होतीं, उसको सुनती हैं, समझने का प्रयास करती हैं और फिर मैथिली और रिया में से जो गलत होता है, उसको अपने मजबूत विचारों और शब्दों से समझाती हैं। रिया के लिए दादी ही सबकुछ हैं, जिनके साथ वो स्कूल की गासिप से लेकर दिमाग की उथल-पुथल तक साझा कर लेती है।
मैथिली भी चाहती हैं कि रिया उनके साथ भी ऐसे ही खुले मगर उनके सोच और विचारों के बीच अजीब सी दूरी बनी ही रहती है। बातें भी होती हैं तो बस काम भर की, खुलकर संवाद हुए तो जमाना बीत गया। क्या आपके घर में भी तीन पीढ़ियां एक ही छत के नीचे रहती हैं, लेकिन तीन अलग-अलग दुनिया में जीती हैं?
आज भारतीय परिवारों की यह आम तस्वीर बन चुकी है। मां भविष्य की उधेड़बुन और घर-गृहस्थी की चिंताओं में उलझी रहती हैं। तो वहीं सुबह की चाय पर दादी या दादाजी अपने पोते-पोतियों के साथ परंपराओं और उस ‘पुराने सुनहरे दौर’ की बात करते हैं, जिन्हें बच्चे खूब सुनते हैं मगर मम्मी-पापा की बातें उपदेश लगने लगती हैं। घर का बच्चा मोबाइल पर पूरी नई दुनिया खोज रहा होता है, जिसमें दादी तो साथ हैं मगर मम्मी या तो ब्लाक हैं या वे नजर रखने भर तक सीमित हैं। एक ही सोफे पर बैठे होने के बावजूद, सोच की दूरियां कई बार इतनी बढ़ जाती हैं कि संवाद की आवाज धीमी पड़ने लगती है।
यह नजरिए का अंतर है
भारत में संयुक्त या अंतर-पीढ़ीय परिवार हमारी सांस्कृतिक पहचान रहे हैं। दादा-दादी, माता-पिता और बच्चों का साथ रहना हमारी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन डिजिटल युग ने इस ढांचे के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। अक्सर हम किसी एक पीढ़ी को दोष देने लगते हैं, जबकि सच तो यह है कि -न माता-पिता गलत हैं, न बच्चे बिगड़े हुए हैं और न ही दादा-दादी पुराने समय में अटके हैं। असली मुद्दा है अनुभव और नजरिए का अंतर। आज का बच्चा सिर्फ पड़ोस के बच्चों से नहीं, बल्कि पूरी दुनिया से मुकाबला कर रहा है। उसकी असुरक्षाएं नई हैं, उसके सपने वैश्विक हैं और उसकी जिज्ञासाएं असीमित।
जब डर संवाद की जगह ले लेता है
माता-पिता अक्सर जीवन को अनुशासन और सुरक्षा के चश्मे से देखते हैं। उनका यह डर कि ‘बच्चा कहीं भटक न जाए’, जायज है, लेकिन जब यह डर संवाद की जगह ले लेता है, तो रिश्तों में दरार आने लगती है। दिलचस्प बात यह है कि अक्सर वही बच्चा, जो अपनी मां से बात करने में कतराता है, अपनी नानी या दादी के पास जाकर दिल खोल देता है। क्यों? क्योंकि वहां उसे सुनने वाले कान मिलते हैं, तुरंत फैसला सुनाने वाली आवाज नहीं। घर तब मजबूत बनता है जब वहां खुलापन हो और खुलापन तभी आता है जब संवाद जीवित रहे।
शह नहीं समझ विकसित करें
अगर आपको लगता है कि घर में दादा-दादी या नाना-नानी बच्चों को शह देकर उन्हें बिगाड़ रहे हैं तो अब समय है कि आप पूर्वाग्रह के चश्मे को उतारें। कई बार माता-पिता समय के साथ बदलती चीजों को समझ नहीं पाते। ऐसे में वे पुराने ढर्रों में इतने उलझ जाते हैं कि बच्चे की भावनाओं को देख ही नहीं पाते। ऐसे क्षणों में कोई ‘खलनायक’ नहीं होता, बस समझ की कमी होती है। यदि दादी का धैर्य, मां की ममता भरी चिंता और बच्चे की आधुनिक जिज्ञासा एक साथ मिल जाएं, तो घर संघर्ष का अखाड़ा नहीं, बल्कि संतुलन का केंद्र बन सकता है।
आदेश नहीं संवाद
डिजिटल युग में बच्चे जानकारी से भरे हुए हैं, लेकिन अंदर से उतने ही उलझे हुए भी। अगर माता-पिता अपने सोच के दरवाजे बंद कर लेंगे, तो बच्चे का भरोसा टूट सकता है। विश्वास को वापस पाना बहुत कठिन होता है। इसके लिए जरूरी है:
सार्थक बातचीत: घर में बातचीत सिर्फ ‘क्या खाया’ या ‘पढ़ाई कैसी चल रही है’ तक सीमित न रहे।
अनुभव साझा करना: बड़े अपने अनुभव सुनाएं और बच्चे अपनी तकनीक की दुनिया से उन्हें परिचित कराएं।
असहमति का सम्मान: हर बात पर एक राय होना जरूरी नहीं, लेकिन एक-दूसरे के विचारों का सम्मान अनिवार्य है।
किताबों को बनाएं जरिया: ऐसी किताबें और कहानियां जो इन भावनाओं को ईमानदारी से उजागर करती हैं, उन्हें परिवार के साथ पढ़ना चाहिए। वे घर में ठहरे हुए संवाद को दोबारा शुरू करने का जरिया बन सकती हैं।





