अगर गायब हो जाए ओजोन लेयर, तो क्या होगा धरती का हाल

जब इंसान घर बनवाता है, तो उसके चारों ओर बाउंड्री वॉल जरूर बनवाता है. बाउंड्री वॉल का काम होता है जानवर, या किसी घुसपैठिये को घर में घुसने से रोकना. जिसको भी आना हो, वो मुख्य गेट से प्रवेश कर के आ सकता है. आसान शब्दों में कहें तो ओजोन लेयर भी ऐसा ही कुछ कार्य करती है. ये धरती को सूर्य से आने वाली खतरनाक यूवी किरणों से बचाती है. तो क्या आपने कभी सोचा है कि अगर ये ओजोन लेयर (What If the Ozone Layer Disappeared) अचानक गायब हो जाए, तो इंसान का क्या हाल होगा?
ऑक्सीजन के 3 एटम मिलकर ओजोन बनाते हैं. धरती की सतह के 15 से 35 कीलोमीटर ऊपर ओजोन की परत होती है जो एटमॉस्फेयर के स्ट्रेटॉस्फियर (stratosphere) में मौजूद है. ये एक तरह की अदृश्य ढाल है, जो सूर्य से आने वाली अल्ट्रा वायलेट किरणों को धरती की सतह तक पहुंचने से रोकती है. अगर इंसान लंबे वक्त तक यूवी किरणों के संपर्क में आएगा, तो उसे स्किन कैंसर हो जाएगा और सन बर्न हो सकता है. इससे जीव-जन्तुओं के डीएनए नष्ट हो सकते हैं. इंसान भी इसमें शामिल हैं. ओजोन लेयर गायब होने के कुछ ही दिनों बाद पेड़-पौधे मर जाएंगे. बिना पेड़-पौधों को फूड चेन नष्ट हो जाएगा. शाकाहारी जीव भूखे मर जाएंगे. मांसाहारी जीव एक दूसरे के शरीर को खाकर कुछ वक्त तक जीवित रह पाएंगे, पर धीरे-धीरे जीव विलुप्त होने लगेंगे क्योंकि वो खत्म होना शुरू हो जाएंगे.
कैसे बनती है ओजोन लेयर?
यूनाइटेड नेशन एनवायरोमेंट प्रोग्राम के अनुसार स्ट्रेटॉस्फियर में ओजोन बनने और खत्म होने की प्रक्रिया प्राकृतिक रूप से निरंतर चलती रहती है. सूर्य से UV-B टाइप की अल्ट्रावायोलेट किरणें निकलती हैं. इसके साथ-साथ UV-C किरणें भी निकलती हैं. जब ये किरणें जब स्ट्रेटॉस्फियर तक पहुंचती हैं, तब ये ऑक्सीजन के मॉलीक्यूल के द्वारा एब्सॉर्ब कर लिए जाते हैं और धरती की सतह तक नहीं पहुंच पाते. UV-C ऑक्सीजन के मॉलीक्यूल को ऑक्सीजन के एटम में स्प्लिट कर देता है. ये सिंगल ऑक्सीजन एटम, अन्य ऑक्सीजन मॉलीक्यूल से मिलते हैं और ओजोन का निर्माण करते हैं. इस तरह ओजोन बढ़ती रहती है.
पर स्ट्रेटॉस्फियर में ओजोन इकलौती गैस नहीं है. नाइट्रोजन और हाइड्रोजन जैसी गैस भी मौजूद हैं. ये रिएक्शन में शामिल होते हैं और ओजोन को नष्ट कर देते हैं. इन रिएक्शन से ओजोन नष्ट होती है. बनने-बिगड़ने की ये प्रक्रिया संतुलित तरीके से चलती रहती है और ओजोन लेयर पर फर्क नहीं पड़ता. मगर इंसानों ने नष्ट होने की प्रक्रिया को बढ़ा दिया और प्रदूषण के चलते बनने की क्रिया से ज्यादा नष्ट होने की क्रिया में तेजी आ गई.





