बागियों- भाजपा नेताओं में संतुलन बनाना रस्सी पर चलने जैसा
दिनेश निगम ‘त्यागी
वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में आने के बाद चंबल-ग्वालियर अंचल की राजनीति करवट बदल रही है। भाजपा नेता बेचैन हैं। उन्हें अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंता है। भाजपा की शिवराज सरकार द्वारा सिंधिया की मर्जी से फैसले लेने से यह चिंता और बढ़ी है। सवाल यह है कि चंबल-ग्वालियर अंचल में यदि सिंधिया की मर्जी से ही सब होगा तो जयभान सिंह पवैया, प्रभात झा, रुस्तम सिंह, लाल सिंह आर्य एवं नरोत्तम मिश्रा जैसे नेता क्या करेंगे। इनकी पूरी राजनीति सिंधिया के विरोध पर ही टिकी रही है। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि मालवा-निमाड़, मध्य भारत, बुंदेलखंड एवं विंध्य अंचल में भाजपा अपने नेताओं का ख्याल रख लेगी, क्योंकि इन अंचलों में सिंधिया का असर ज्यादा नहीं है। हालांकि यहां से भी कांग्रेस के कुछ बागी विधायक सिंधिया के साथ भाजपा में आए हैं। लेकिन चंबल-ग्वालियर अंचल में सिंधिया खेमे एवं भाजपा के बीच संतुलन बनाना भाजपा नेतृत्व के लिए रस्सी पर चलने जैसा कठिन है। इसके लिए नटों जैसी बाजीगरी की जरूरत होगी। इस अंचल में भाजपा-संघ मजबूत हैं और ज्योतिरादित्य सिंधिया भी।
– कोरोना के बीच हुए ताबड़तोड़ फैसले
कोरोना बड़ी महामारी है। विश्व के साथ समूचा भारत इसकी चपेट में है। मप्र में भी मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में शिवराज सरकार की प्राथमिकता सिर्फ कोरोना से निबटना होना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कोरोना पर ध्यान दिया, इसके साथ सिंधिया की मर्जी को भी नजरअंदाज नहीं किया, जिनकी बदौलत भाजपा फिर सत्ता में आई। आनन-फानन सिंधिया के खिलाफ ईओडब्ल्यू में शुरू हुई जांच बंद हुई। मामला खोलने वाले पुलिस अफसर को हटा दिया गया। कमलनाथ सरकार द्वारा हटाए गए नगर निगम ग्वालियर के कमिश्नर को तत्काल वापस भेजा गया। गुना-शिवपुरी सहित अंचल में उनकी पसंद के अन्य अफसरों का ख्याल रखा गया। अर्थात, जिस गति से कोरोना पर काम हुआ, उसी गति से सिंधिया का भी ख्याल रखा गया। यह देख चंबल-ग्वालियर अंचल में भाजपा का झंडा बुलंद रखने वाले नेता बेचैन हैं।
– मंत्रिमंडल में होंगे सिंधिया के दोगुना मंत्री
ऐसा नहीं है कि सरकार के काम काज में ही सिंधिया का दखल रहेगा, मंत्रिमंडल के गठन में भी उनका दबदबा रहने की खबरें हैं। कमलनाथ सरकार में सिंधिया समर्थक मंत्रियों की संख्या 6 थी। इनके इस्तीफे सबसे पहले स्वीकार हुए थे। खबर है कि शिवराज मंत्रिमंडल में सिंधिया समर्थक मंत्रियों की संख्या दोगुना, अर्थात लगभग एक दर्जन हो सकती है। इस खबर ने भी भाजपा नेताओं की नींद हराम उड़ाई है। दस मंत्रियों के नाम हर कोई उंगलियों में गिना रहा है। इनमें 6 पूर्व मंत्री गोविंद सिंह राजपूत, तुलसी सिलावट, प्रद्युम्न सिंह तोमर, इमरती देवी, महेंद्र सिंह सिसोदिया तथा प्रभुराम चौधरी हैं। सिंधिया खेमे में आए बिसाहूलाल सिंह, हरदीप सिंह डंग, राजवर्धन सिंह दत्तीगांव तथा एंदल सिंह कंसाना का भी मंत्री बनना तय माना जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि सिंधिया समर्थक दो और बागी मंत्री बन सकते हैं। सवाल यह है, यदि ऐसा हुआ तो भाजपा के दावेदार दिग्गज नेताओं का क्या होगा?
सिंधिया, तोमर पर संतुलन की जवाबदारी
भाजपा के अंदर पनप रहे इस असंतोष एवं भाजपा नेताओं के अंदर पैदा असुरक्षा की भावना से पार्टी नेतृत्व अनभिज्ञ नहीं है। शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री हैं, इसलिए दोनों पक्षों के बीच संतुलन बैठाने की सबसे बड़ी जवाबदारी उन्हीं पर है। इसके अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया एवं केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के कंधों पर यह भार डाला गया है। सिंधिया ने भाजपा नेताओं के साथ तालमेल बैठाने की कोशिश शुरू कर दी है। शिवराज के अलावा वे नरोत्तम के घर जाकर भोजन कर चुके हैं। दिल्ली में तोमर के साथ वे लगातार संपर्क में हैं। सिंधिया खेमे एवं भाजपा नेताओं के बीच कितना संतुलन बन पाता है, कितना नहीं, फिलहाल कुछ कहना कठिन है। संतुलन बनने पर ही उप चुनावों में भाजपा की जीत का रास्ता निष्कंटक होगा। इन नतीजों पर ही भाजपा सरकार का भविष्य टिका है।





