ये जानकर चौक जाओगे आप कोई जोड़ा कैसे बनता है ‘दो जिस्म एक जान’

इंसान से भी ऐसी ही उम्मीद की जाती है कि वो एक साथी के प्रति वफादार रहे। ऐसा तभी मुमकिन है, जब साथी का मिजाज उनसे मेल खाये। बरसों से मनोवैज्ञानिक कहते आए हैं कि अगर दो लोगों के बीच समानता हो, तो संबंध ज्यादा स्थायी होता है। क्योंकि तब दो लोग साथ रहते हुए अपनी पसंद की फिल्में देखेंगे। खान-पान को लेकर मतभेद नहीं होंगे। पसंद-नापसंद का झगड़ा नहीं होगा।
ये विचार जितना सहज है, व्यवहार में उतना ही नामुमकिन। रिसर्च से ये बात साबित करना बहुत मुश्किल काम है पर, अब शायद नीदरलैंड की एम्सटर्डम यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों ने रिसर्च से ये पता लगाया है कि समान बर्ताव किस तरह से रिश्तों को मजबूती देता है।
वैसे, ये रिसर्च सिर्फ एम्सटर्डम यूनिवर्सिटी ने किया हो, ऐसा भी नहीं है। हाल में कई ऐसे रिसर्च हुए हैं, जिनसे ये साबित होता है कि एक जैसे मिज़ाज वाले जीवनसाथी हों तो जिंदगी और रिश्ते में स्थायित्व रहता है। अब जैसे कि आप सुबह उठने की आदत वाले हैं और आप का साथी ‘नाइट आउल’ यानी रतजगा करने वाला। तो, जाहिर है झगड़े होंगे ही। आप चाहेंगे कि आपका जीवनसाथी सुबह उठे। साथ में चाय पिए और गप्पें लड़ाए। मगर, ठीक उसी वक्त वो गहरी नींद में होगा।
इसी तरह, अगर आप की विचारधारा राष्ट्रवादी है और आपके साथी की सोच भी वैसी है, तो घर में राजनीति को लेकर बहसें कम होंगी। जब आप एक जैसे मिजाज के साथी के साथ रहते हैं, तो दोनों की साझा पहचान विकसित होती है। सवाल ये उठता है कि क्या किसी भी जोड़े का हर गुण, पसंद-नापसंद एक जैसी हो, तभी रिश्ता मजबूत होता है?
एम्सटर्डम यूनिवर्सिटी की मैनन वान शेपिन्जेन और उनकी टीम ने ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की। उन्होंने ये जानने का प्रयास किया कि क्या कुछ खास गुण, साझा पहचान विकसित करने में मददगार होते हैं, या फिर, पूरे किरदार में ही मेल होना जरूरी है? अब जैसे कि अगर दोनों जीवनसाथी ईमानदार हैं, तो एक-दूसरे के साथ रहने में आसानी होगी। पर, अगर कोई साथी ईमानदारी को लेकर लापरवाह है।
तो, दूसरा साथी अगर पक्का ईमानदार है, तो वो अपने जीवनसाथी के किरदार की कमी दूर करेगा। संतुलन बनाकर रखेगा। शेपिन्जेन और उनकी टीम ने अमरीका के हजारों दंपत्तियों की जिंदगी की पड़ताल की। उनकी पसंद-नापसंद और सियासी झुकाव को परखा। रिसर्च से ये बात सामने आई कि जीवनसाथी के मिजाज का सीधा असर पड़ता है। अगर कोई जोड़ा एक-दूसरे की बात से अक्सर सहमत रहता है, साफगोई पसंद है, झिक-झिक कम करता है, तो वो ज्यादा खुश रहेंगे।
लेकिन, ये कहानी का एक ही पहलू है। रिसर्च से पता चला कि अगर जोड़ा परफेक्ट मैच है, तो बात उतनी मजेदार नहीं। अब अगर दोनों जीवनसाथी घुमंतू हैं। बाहरी लोगों से मेल-जोल में यकीन रखते हैं, तो बात नहीं बनने वाली। इनमें से एक का कम बहिर्मुखी होना ही फायदेमंद होगा। यही बात काम के प्रति ईमानदारी को लेकर है। अगर मर्द और औरत दोनों का कर्तव्यनिष्ठा का भाव एक जैसा है, तो टकराव होगा। थोड़ा कम-ज्यादा होने से टकराव की आशंका कम होग।
हां, अगर किसी जोड़े में नए विचारों को लेकर खुलापन एक जैसा ही है, तो बात फायदे की होती है। फिर दोनों नए तजुर्बे करने से नहीं झिझकते। मिजाज का खुलापन इसलिए काम आता है कि इससे राजनैतिक विचारधाराओं का टकराव नहीं होता। लोग तरक्कीपसंद हो जाते हैं। झगड़े कम होते हैं।
जर्मनी की जीसिस लीबनिज यूनिवर्सिटी में भी रिश्तों में समानता के असर को लेकर रिसर्च हुई। इसे बीट्रिस रैमस्टेड ने किया। जर्मनी के पांच हजार जोड़ों की जिंदगी की निगरानी की गई। नतीजा ये निकला कि जिस जोड़े के मिजाज में समानता होती है, वो ज्यादा स्थायी रिश्ता बनाते हैं। सिर्फ यही नहीं कई और रिसर्च से ये पता चला है कि अगर महिलाओं की सोच अपने साथियों जैसी खुले जहन की है, तो इसका फायदा महिलाओं को होता है।
दो जिस्म एक जान
एक और रिसर्च के मुताबिक अगर किसी दंपति की राजनीतिक सोच मिलती है, तो उनके बीच झगड़े बहुत कम हो जाते हैं। वो खुले जहन के होते हैं। मिजाज का मेल होने पर कोई भी जोड़ा मानो दो जिस्म एक जान बन जाता है। वो एक दूसरे पर भरोसा करते हैं। उनकी शादीशुदा जिंदगी में उठा-पटक कम होती है। एक जैसा मिजाज और एक जैसे जीवन मूल्य होने पर जीवनसाथी को लगता है कि वो एक-दूसरे के प्रतिबिंब हैं। एक-दूसरे में समाए हुए एक ही इंसान हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि जीवनसाथी का मिजाज अगर खुद से मिले, तो शानदार होगा।





