युवा मानसिक स्वास्थ्य: एक परिप्रेक्ष्य

लखनऊ: एक बार राॅबर्ट फ्रास्ट ने कहा था कि ‘‘मैं भविश्य जानने के लिये युवाओं को पढ़ाने जाता हूं।‘‘ इसी वाक्य से हम युवा शक्ति का अंदाज़ा लगा सकते हैं। भारत की कुल जनसंख्या का 19.1 प्रतिशत युवा हैं जो 2020 तक 34.33 प्रतिशत होने का अनुमान है। युवा जनसंख्या का अनुपात अधिक होना तो अच्छी बात है क्योंकि युवा देश का भविश्य होते हैं, ऊर्जा का भण्डार होने हैं। परन्तु ये अफसोस की बात है कि इनकी संख्या के साथ युवाओं की समस्यायें भी बढ़ती जा रही हैं। युवाओं में अवसाद तीसरी सबसे बड़ी बीमारी बन कर सामने आ चुका है, वहीं आत्महत्या युवाओं में मृत्यु का दूसरा प्रमुख कारण है। छोटी-छोटी बातों पर बड़े कदम उठा लेना, पास न हुये तो फाॅसी लगा ली, गर्लफ्रेंड ने मना किया तो एसिड फेंक दिया, नौकरी नही मिली तो सलफास खा लिया आदि जैसे कृत्य युवाओ में आम हो गये हैं।
युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को समझते हुये इस वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2018 को युवा एवं उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिये समर्पित करने का निर्णय लिया है जिससे कि युवाओं व समाज के सभी सदस्यों को इस बारे में जागरूक किया जा सके। विश्व बाल व किशोर जनसंख्या का 20 प्रतिशत किसी न किसी प्रकर की मानसिक बीमारी से ग्रसित है। माना कि आज का सामाजिक परिवेश तनाव, प्रतियोगिता, दबाव व अनेकों आकर्शणों से घिरा हुआ है किन्तु थोड़े से आत्म-नियंत्रण व संयम से बदलते परिवेश की चुनौतियों से निबटा जा सकता है। इसके लिये अत्यन्त आवश्यक है कि –
हम उच्च आकांक्षाये तो अवश्य रक्खे किन्तु उन्हे पूरा करने के लिये भेड़चाल/रैट रेस का हिस्सा ना बने। कोई भी असफलता इतनी बड़ी या इतनी महत्वपूर्ण नहीं होती कि मानव जीवन की अहमियत ही ना रह जाये। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था ‘‘जीवन में खतरों से खेलो अगर विजयी हुये तो नेतृत्व करोगे अगर असफल हुये तो मार्गदर्शक।‘‘ हम उच्च आकांक्षाये तो अवश्य रक्खे किन्तु उन्हे पूरा करने के लिये भेड़चाल/रैट रेस का हिस्सा ना बने।
कोई भी असफलता इतनी बड़ी या इतनी महत्वपूर्ण नहीं होती कि मानव जीवन की अहमियत ही ना रह जाये। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था ‘‘जीवन में खतरों से खेलो अगर विजयी हुये तो नेतृत्व करोगे अगर असफल हुये तो मार्गदर्शक।‘‘ डरो नही सपने देखों और उन्हे साकार करने की दिशा में लग जाओं, किन्तु सपना वो जो तुम्हारा अपना हो समाज या परिवार द्वारा थोपा हुआ नहीं।
इसमें कोई शक नहीं कि तेजी से विकसित हो रही इस साइबर क्रांति ने मनुश्य के बहुत से कामों को आसान बना दिया है किन्तु इसने दुनिया को जितना छोटा किया है रिश्तों के बीच दूरियों को उतना ही बड़ा। युवाओं के अच्छे मानसिक स्वास्थ्य के लिये ये अत्यन्त आवश्यक है कि वो अपनें माता-पिता, अपने परिवार के बुजर्गों से जुड़े रहें पर सोशल मीडिया के माध्यम से नही इमोशनल एवं फीजिकल मीडिया से क्योंकि जिन्दगी के उतार चढ़ाव में उनका प्यार व अनुभव हमारे बहुत काम आता है।
समय-समय पर उनसे अपने विचार, योजनायें, समस्यायें वा दुविधायें बाॅटें, और जरूरत पड़ने पर व्यवयायिक परामर्श लेने में कतई न चूकें क्योकि निवारण उपचार से बेहतर है। वर्तमान परिवेश को देखते हुये माता-पिता व परिवार के अन्य बड़े बुजर्गों की जिम्मेदारी भी थोड़ी बढ़ जाती है। उन्हे भी अपने घर के युवाओं की मनःस्थिति व परिस्थितयों को समझ कर उनके साथ व्यवहार करना होगा। बड़ों को अपनी विचार धाराओं को थोड़ा और विस्तृत कर खुद को बच्चों पर थोपने से रोकना होगा। उनका दोस्त बनना होगा ताकि जनरेशन गैप नाम की खाई को थोड़ा पाटा जा सके।
युवाओं को और अधिक सशक्त एवं अनुभवी बनाया जा सकता है यदि बचपन से ही स्कूल के अध्यापक, घरों में माता-पिता एक विशय पर और अधिक संवेदनशील हो जायें। अगर माता-पिता व अध्यापक मानसिक अस्वस्थता के पूर्व चेतावनी चिन्हों से जागरूक रहेंगे तो समय रहते उसका निवारण कर सकते हैं ताकि भविश्य में हो सकने वाली मानसिक अस्वस्थता से बच्चों को बचाया जा सके।
बच्चों को जीवन कौशल सिखानें में, रोजमर्रा की घरेलू अथवा कालेज युवाओं की परेशानियों से कुशलता पूर्वक निबटने का कौशल सिखाने में माॅ बाप व अध्यापकों के योगदान की अनदेखी नहीं की जा सकती।
डा.आलोक चौधरी (मनोवैज्ञानिक)

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