मानसून काल में घाटी वाले इलाकों में कम बारिश ने इस बार कर दी शहद की मिठास कम…..

मानसून काल में घाटी वाले इलाकों में कम बारिश ने इस बार शहद की मिठास कम कर दी है। शहद उत्पादन 60 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। इस बार शहद जिला मुख्यालय तक भी नहीं पहुंच पाया।

सीमांत जिले पिथौरागढ़ के घाटी वाले इलाके धारचूला, झूलाघाट, गुरना, थल आदि क्षेत्रों में शहद का उत्पादन होता है। जिले में शीतकाल में लगभग 15 से 20 कुंतल तक शहद निकाला जाता है, जो नवंबर मध्य तक जिला मुख्यालय के बाजारों में भी पहुंच जाता है, बेहद उच्च गुणवत्ता वाले इस शहद की डिमांड दिल्ली, बरेली, देहरादून जैसे शहरों से भी आती है, लेकिन इस वर्ष शहद के उत्पादन में खासी गिरावट आई है। इसका कारण मानसून काल में घाटी वाले इलाकों में बारिश का कम होना रहा। धारचूला के खेला गांव के बड़े शहद उत्पादकों में एक माने जाने वाले दुर्गा सिंह धामी ने बताया कि मधुमक्खियां च्यूरे से शहद एकत्र करती है। च्यूरे के पेड़ घाटी वाले इलाकों में मिलते हैं। च्यूरा बेहद चिपचिपा होता है। अच्छी बारिश होने पर च्यूरे के फूल पर लगने वाली चिपचिपाहट कम हो जाती है, जिससे मधुमक्खियां आसानी से रस निकाल लेती हैं। फूल के अधिक चिपचिपा होने पर मधुमक्खियां इसी पदार्थ पर चिपक जाती हैं। इस वर्ष कम बारिश के चलते फूलों में चिपचिपाहट कम नहीं हो पाई, जिससे मधुमक्खियां रस नहीं निकाल पाई और उत्पादन गिर गया। उन्होंने बताया कि उनके क्षेत्र में दो से ढाई क्विंटल तक शहद का उत्पादन होता था, जो इस वर्ष सिमट कर एक क्विंटल तक रह गया। गर्म घाटी वाले अन्य इलाकों में भी यही स्थिति रही।

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बारिश कम होने का असर शहद उत्पादन पर पड़ा है। मधुमक्खियां च्यूरे से अधिक रस नहीं निकाल पाई। शहद उत्पादन पूरी तरह मौसम पर निर्भर है। मौसम में जरा से बदलाव से ही शहद उत्पादन में गिरावट आ जाती है।

– हरीश दुबड़िया, मौन पालन निरीक्षक, पिथौरागढ़

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बेहद फायदेमंद है शहद

पिथौरागढ़ : शहद बेहद फायदेमंद औषधि है। यह वजन कम करने में सहायक होने के साथ ही पाचन तंत्र को तो बेहतर करता ही है तमाम तरह के संक्रमणों से भी बचाता है। आयुर्वेद के जानकार जगदीश जोशी ने बताया कि मौसमी सर्दी-जुकाम के उपचार में यह रामबाण है।

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