महाभारत युद्ध के बाद इस ‘कुंड’ में किया था पांडवों ने कौरवों का पिंडदान

महाभारत का युद्ध केवल सत्‍ता हासिल करने के लिए नहीं लड़ा गया था। यह युद्ध अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। इस युद्ध के बाद ही धर्म की स्‍थापना हुई थी। हालांकि, युद्ध में पांडवों और कौरवों के पक्ष से कई योद्धाओं को अपनी जान गवानी पड़ी थी।

अपने 100 कौरव भाइयों का वध करने के बाद पांडवों का मन बहुत विचलित था, तब भगवान श्री कृष्‍ण ने पांडवों से कौरवों का पिंडदान करवाया था। जहां पांडवों ने कौरवों का पिंडदान किया था, वह पवित्र कुंड आज भी मौजूद है। चलिए हम आपको इस कुंड के महत्‍व के बारे में बताते हैं।

पांडवों ने किया था कौरवों का पिंडदान
कई हिंदू ग्रंथों जैसे महाभारत, वामन पुराण, पद्म पुरण में इस बात का विस्‍तार से विवरण मिलता है कि हरियाण के जिंद जिले में मौजूद ‘पांडु पिंडारा’ जिसे पिंडतारक और सोम तीर्थ भी कहा गया है, वहां कौरवों द्वारा कौरवों का पिंडदान किया गया था। यहां एक कुंड भी है, जहां आज भी लोग सोमवती अमावस्‍या के दिन अपने पितृों का पिंडदान करने आते हैं। मान्‍यता है कि इस स्‍थल पर अपने पितृों का पिंडदान करने से उन्‍हें मोक्ष प्राप्‍त हाता है। सोमवती अमावस्‍या के दिन यहां बहुत बड़ा मेला भी लगता है।

मान्‍यता है की महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद जीत भले ही पांडवों की हुई, लेकिन इस विजय के साथ उन्हें अपने ही परिवार के लोगों को खोने का गहरा दुख भी मिला। कौरव उनके शत्रु थे, फिर भी वे उनके भाई थे। इसलिए धर्म का पालन करते हुए पांडवों ने सभी दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए पिंडदान और श्राद्ध कर्म संपन्न किया था।

इस पवित्र कुंड का क्या है महत्व?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस कुंड का संबंध पितृ कर्म और मोक्ष से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि यहां श्रद्धा और विधि-विधान से पिंडदान करने पर पूर्वजों को शांति प्राप्त होती है। यही कारण है कि सालभर, विशेष रूप से पितृ पक्ष के दौरान, बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर अपने पितरों का तर्पण करते हैं।

आस्था और परंपरा
महाभारत से जुड़ी यह कथा भारतीय धार्मिक परंपराओं और पितृ श्रद्धा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। यह भी माना जाता है कि महाभारत काल से पिंडदान और श्राद्ध कर्म की परंपरा शुरू हुई और आज भी लोंग रिश्तों में चाहे कितने ही मतभेद क्यों न रहे हों, मृत्यु के बाद अपने पितृों को ईश्‍वर से भी ऊपर का स्‍थान देते हैं और उनकी आत्‍मा की शांति के लिए पिंड दान और उनका श्राद्ध करते हैं।

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