भारत-चीन तनाव के बीच, जानें किसके साथ खड़ा हैं चीन….

भारत और चीन के तनाव के बीच रूस को एक बड़े कूटनीतिक खिलाड़ी के तौर पर देखा जा रहा है. रूस पर्दे के पीछे से भारत-चीन के विवाद को सुलझाने की कोशिश भी कर रहा है. रूस के विदेश मंत्री ने मंगलवार को रूस-भारत और चीन (RIC) के विदेश मंत्रियों की वर्चुअल बैठक आयोजित कराई. भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी रूस के तीन दिवसीय दौरे पर पहुंचे हैं. कोरोना महामारी में किसी केंद्रीय मंत्री का पहला विदेशी दौरा है.

रूस और चीन की पिछले कुछ सालों में करीबी बढ़ी है जो भारत के लिए चिंताजनक है. कुछ ही दिन पहले, रूस ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जी-7 समूह में शामिल होने के प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया था कि यह चीन को अलग-थलग करने की रणनीति है. रूस ने कहा था कि वह चीन के खिलाफ किसी भी गुट या रणनीति में शामिल नहीं होगा. जबकि भारत ने ट्रंप के प्रस्ताव को लेकर सकारात्मक संकेत दिए थे.

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने मंगलवार को हुई वर्चुअल बैठक में कहा कि भारत और चीन को अपने विवादों को सुलझाने के लिए किसी बाहरी मदद की जरूरत नहीं है. रूस के विदेश मंत्री ने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि भारत और चीन को बाहर से कोई मदद चाहिए. मुझे नहीं लगता कि उन्हें मदद करने की आवश्यकता है, खासकर जब मामला देश के मुद्दों से जुड़ा हुआ हो. वे उन्हें अपने दम पर मामले को हल कर सकते हैं. मेरा मतलब हालिया घटनाक्रमों से है.’

आरआईसी के विदेश मंत्रियों की बैठक में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि नई दिल्ली और बीजिंग ने शांतिपूर्ण समाधान के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है. उन्होंने रक्षा अधिकारियों, विदेश मंत्रियों के स्तर पर बैठकें शुरू कीं और दोनों पक्षों में से किसी ने भी ऐसा कोई बयान नहीं दिया जिससे यह संकेत मिले कि उनमें से कोई भी गैर-कूटनीतिक समाधान चाहेगा. हालांकि, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने चीन का नाम लिए बगैर कई बातें कहीं. उन्होंने कहा कि सभी देशों को अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करना चाहिए और एक स्थायी वैश्विक व्यवस्था स्थापित करने में मदद करनी चाहिए. विदेश मंत्री ने कहा कि दुनिया के अग्रणी देशों को हर तरह से मिसाल पेश करनी चाहिए.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के रूस के दौरे के प्रमुख एजेंडे में हथियार भी शामिल है. रक्षा मंत्री ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि जल्द से जल्द हमें रूस से हथियार मिलेंगे और जो मांगें भारत ने रखी हैं, उन्हें पूरा किया जाएगा. वहीं, रूस के डिप्टी पीएम वाई. बोरिसोव ने भरोसा दिया कि अगर कभी भी भारत की अखंडता और एकता पर सवाल खड़ा होता है, तो हमारी कोशिश हर संभव तरह से भारत के साथ खड़ा होने की होती है.

इन सारे घटनाक्रमों के बीच एक सवाल उठ रहा है कि अगर भारत-चीन के बीच संघर्ष बढ़ा तो रूस किसके साथ आएगा? सेंटर फॉर कॉम्प्रिहेंसिव यूरोपियन एंड इंटरनेशनल स्टडीज में सीनियर रिसर्च फेलो वासिली बी काशिन ने कहा कि भारत-चीन के बीच जो चल रहा है वो दुखद है, लेकिन इस मसले पर रूस किसी का पक्ष नहीं लेगा और न ही किसी तरह के विरोध का समर्थन करेगा. वासिली बी काशिन ने कहा कि रूस अपने संबंध वैसे ही रखेगा, जैसे हैं. जहां तक व्यापार का सवाल है तो रूस 40 फीसदी व्यापार यूरोपियन यूनियन और 15 पर्सेंट चीन के साथ करता है, इसलिए कहीं से भी रूस का व्यापार चीन पर निर्भर नहीं है. हालांकि चीन से रक्षा सौदों पर अच्छे संकेत मिले हैं. चीन की आर्मी ग्रोथ अच्छी हुई है, लेकिन चीन के कहने पर रूस नहीं चलेगा.

उन्होंने कहा कि भारत की डिफेंस पॉलिसी एक सोर्स पर डिपेंड नहीं है. वो यूरोपियन यूनियन से भी आर्म्स डील करता है और यूएस से भी, लेकिन अमेरिका डील को राजनीतिक एंगल से जोड़ देता है, जिसके फायदे-नुकसान दोनों है.

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) के फेलो नंदन उन्नीकृष्णन का भी यही कहना है कि भारत-चीन विवाद में रूस कोई दखल नहीं देगा. उन्होंने कहा, रूस का व्यापार सिर्फ चीन पर निर्भर नहीं है और उसके भारत से भी अच्छे संबंध हैं. जो चीन चाहता है, वैसा रूस कभी नहीं करेगा. चीन का जूनियर पावर रूस कभी नहीं बनना चाहेगा.

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