बचपन से शादी तक जुड़ी है इनकी राष्ट्रपति भवन से कई यादें, शेयर की अपनी ये बातें

पटना. डॉ. तारा सिन्हा, डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पोती हैं। इनका एक दशक से भी ज्यादा समय राष्ट्रपति भवन में गुजरा है। तारा सिन्हा अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहती हैं कि वो समय सत्ययुग का था, ये तो कलयुग चल रहा है। अब तो राजनीति में लोग पैसा कमाने के लिए आया करते हैं। तब लोग सेवा के लिए आया करते थे। राष्ट्रपति भवन से हुई थी तारा की शादी…

डॉ राजेंद्र प्रसाद के बड़े बेटे मृत्युंजय प्रसाद की बेटी तारा सिन्हा की शादी राष्ट्रपति भवन से हुई थी। तारा सिन्हा कहती हैं कि इस शादी में तो बड़ी संख्या में लोग आए थे। लेकिन, दादाजी(डॉ राजेंद्र प्रसाद ) ने किसी के कोई गिफ्ट नहीं स्वीकार किया था। हां, तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु की साड़ी हमें लेनी पड़ी थी, क्योंकि ये साड़ी इंदिरा जी ने लाकर मुझे देते हुए कहा था ये तोहफा नहीं है ये एक बड़ी बहन का छोटी बहन के लिए प्यार है।
राष्ट्रपति भवन में 15 बहने और दो भाईयों के साथ हम रहते थे
तारा सिन्हा राष्ट्रपति भवन में गुजारे अपने पुराने समय को याद करते हुए कहा कि हम तब एक साथ 40 लोग रहा करते थे। हमारा संयुक्त परिवार था। हम 15 बहनें और 2 भाईयों के साथ एक साथ रहते थे। भवन इतना बड़ा था कि रहने और खेलने की हमें कोई समस्या नहीं हुआ करता था। तारा सिन्हा कहती है जब हम राष्ट्रपति भवन गए थे तब काफी छोटी थी। स्कूल में पढ़ा करती थी। यहां से ही फिर हमने स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। हमारी दो बड़ी बहनों की शादी भी यहां से ही हुई थी। मेरी शादी के कुछ दिनों के बाद ही दादाजी राष्ट्रपति भवन छोड़कर पटना चले आए थे।
तारा सिन्हा राष्ट्रपति भवन में गुजारे अपने पुराने समय को याद करते हुए कहा कि हम तब एक साथ 40 लोग रहा करते थे। हमारा संयुक्त परिवार था। हम 15 बहनें और 2 भाईयों के साथ एक साथ रहते थे। भवन इतना बड़ा था कि रहने और खेलने की हमें कोई समस्या नहीं हुआ करता था। तारा सिन्हा कहती है जब हम राष्ट्रपति भवन गए थे तब काफी छोटी थी। स्कूल में पढ़ा करती थी। यहां से ही फिर हमने स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। हमारी दो बड़ी बहनों की शादी भी यहां से ही हुई थी। मेरी शादी के कुछ दिनों के बाद ही दादाजी राष्ट्रपति भवन छोड़कर पटना चले आए थे।
प्राइवेट किचन में बनता था हमारा खाना
डॉ तारा सिन्हा कहती हैं कि तब हमारा संयुक्त परिवार हुआ करता था। तब हम एक साथ हमलोग चालीस से ज्यादा लोग रहा करते थे। दादा जी ये नहीं चाहते थे कि हमारा खाना सरकारी खर्चे पर बने, इसलिए राष्ट्रपति भवन के प्राइवेट किचन में हम लोगों के खाने की व्यवस्था कर दी गयी थी। दादी(डॉ राजेंद्र प्रसाद की पत्नी ) भी हम लोगों के साथ ही खाना खाया करती थी। हम लोगों का खाना बनाने के लिए भी गांव (सीवान) से एक कुक आ गया था। हमारे किचन में जो कुछ भी बनता था उसका पूरा पैसा दादा जी अपने वेतन से दिया करते थे।
डॉ तारा सिन्हा कहती हैं कि तब हमारा संयुक्त परिवार हुआ करता था। तब हम एक साथ हमलोग चालीस से ज्यादा लोग रहा करते थे। दादा जी ये नहीं चाहते थे कि हमारा खाना सरकारी खर्चे पर बने, इसलिए राष्ट्रपति भवन के प्राइवेट किचन में हम लोगों के खाने की व्यवस्था कर दी गयी थी। दादी(डॉ राजेंद्र प्रसाद की पत्नी ) भी हम लोगों के साथ ही खाना खाया करती थी। हम लोगों का खाना बनाने के लिए भी गांव (सीवान) से एक कुक आ गया था। हमारे किचन में जो कुछ भी बनता था उसका पूरा पैसा दादा जी अपने वेतन से दिया करते थे।
विदेशी मेहमान को भी देशी खाना आता था पसंद
राष्ट्रपति भवन में आने वाले विदेशी मेहमान को भी सरकारी किचन में ही खाने की व्यवस्था हुआ करता था। चूंकि बाबू जी सादा खाना खाया करते थे, इसलिए अक्सर उनका खाना हम लोगों के साथ ही बना करता था। विदेशी मेहमान जब राष्ट्रपति भवन में दादा जी के साथ भोजन करने बैठते थे तो वे भी प्राइवेट किचन में बना सादा खाना खाने की अपनी इच्छा व्यक्त करते थे। ऐसा अक्सर होता था। दादाजी को भी ये सब अच्छा लगता था, वे कहते थे अच्छा हुआ देश का थोड़ा पैसा बच गया। ये पैसा देश के विकास और गरीबी से लड़ने में हमारी मदद करेगा।
राष्ट्रपति भवन में आने वाले विदेशी मेहमान को भी सरकारी किचन में ही खाने की व्यवस्था हुआ करता था। चूंकि बाबू जी सादा खाना खाया करते थे, इसलिए अक्सर उनका खाना हम लोगों के साथ ही बना करता था। विदेशी मेहमान जब राष्ट्रपति भवन में दादा जी के साथ भोजन करने बैठते थे तो वे भी प्राइवेट किचन में बना सादा खाना खाने की अपनी इच्छा व्यक्त करते थे। ऐसा अक्सर होता था। दादाजी को भी ये सब अच्छा लगता था, वे कहते थे अच्छा हुआ देश का थोड़ा पैसा बच गया। ये पैसा देश के विकास और गरीबी से लड़ने में हमारी मदद करेगा।
हवाई जहाज से नहीं ट्रेन सफर करना पसंद करते थे
तारा सिन्हा कहती हैं कि दादाजी ज्यादातर रेल से सफर करने में विश्वास करते थे। ट्रेन में वे जब सफर करते थे तो रेलवे की ओर से उनके लिए एक अलग से सैलून की व्यवस्था किया जाता था। इसमें जब हम लोग दादा जी के साथ सफर करते थे दादा जी हम लोगों का टिकट ले लिया करते थे। इसके साथ ही ट्रेन के सफर के समय हम लोग जो खाना खाते थे उसका भी दादा जी पैसा दिया करते थे।
तारा सिन्हा कहती हैं कि दादाजी ज्यादातर रेल से सफर करने में विश्वास करते थे। ट्रेन में वे जब सफर करते थे तो रेलवे की ओर से उनके लिए एक अलग से सैलून की व्यवस्था किया जाता था। इसमें जब हम लोग दादा जी के साथ सफर करते थे दादा जी हम लोगों का टिकट ले लिया करते थे। इसके साथ ही ट्रेन के सफर के समय हम लोग जो खाना खाते थे उसका भी दादा जी पैसा दिया करते थे।





