क्या आपका बच्चा भी दिनभर स्क्रीन से चिपका रहता है?  फोकस बढ़ाने के लिए अपनाएं ये 3 ट्रिक्स

इन के बढ़ते प्रभाव के बीच पढ़ने की संस्कृति को कैसे विकसित किया जाए, यह आज की प्रमुख चुनौती है। आज का बचपन स्क्रीन की रोशनी में सिमटता जा रहा है। मोबाइल, टेलीविजन और रील्स ने बच्चों की दुनिया को तात्कालिक और सतही बना दिया है।

यह बदलाव केवल आदतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनकी सोच, एकाग्रता और संवेदनशीलता को भी प्रभावित कर रहा है। ऐसे समय में बच्चों को फिर से किताबों की दुनिया से जोड़ना केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता है, क्योंकि पुस्तकें ही वह माध्यम हैं जो बच्चे के भीतर धैर्य, गहराई और कल्पनाशक्ति का विकास करती हैं।

महत्व रखता है घर का वातावरण
कहा जाता है कि जिस घर में किताबें नहीं होतीं, वहां विचार भी लंबे समय तक नहीं टिकते हैं। यह कथन बच्चों के संदर्भ में अधिक प्रासंगिक है। बचपन में विकसित आदतें ही जीवनभर का आधार बनती हैं। यदि इस अवस्था में पढ़ने की आदत विकसित हो जाए, तो बच्चा केवल परीक्षा पास करने वाला नहीं, बल्कि जीवन को समझने वाला, प्रश्न करने वाला और विचार करने वाला व्यक्ति बनता है। इस दिशा में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। बच्चे उपदेश से नहीं, बल्कि उदाहरण से सीखते हैं। यदि माता-पिता स्वयं पढ़ते हैं, पुस्तकों पर चर्चा करते हैं और उन्हें दैनिक जीवन का हिस्सा बनाते हैं, तो बच्चे के भीतर पढ़ने की स्वाभाविक रुचि विकसित होती है।

रोचक दिनचर्या बनती मददगार
प्रसिद्ध बाल साहित्यकार हरिकृष्ण देवसरे ने स्पष्ट कहा है कि बच्चों को पढ़ने की आदत सिखाई नहीं जाती, बल्कि ऐसा वातावरण दिया जाता है जिसमें वे स्वयं पढ़ने लगते हैं। यदि घर में केवल स्क्रीन का प्रभुत्व हो, तो पुस्तकें हाशिए पर चली जाती हैं। इसलिए आवश्यक है कि घर का वातावरण ऐसा हो जहां किताबें उपयोग की वस्तु हों, केवल सजावट की नहीं । बच्चे वही बनते हैं जो वे रोज देखते हैं, न कि केवल वह जो उन्हें कहा जाता है। यही इस पूरी प्रक्रिया का मूल सिद्धांत है। यदि माता-पिता प्रतिदिन कुछ समय पढ़ने के लिए निर्धारित करें और बच्चों के सामने पढ़ें, तो यह आदत धीरे-धीरे बच्चों में भी उतरने लगती है। छोटे बच्चों को कहानी सुनाना, भाव-भंगिमा के साथ पढ़ना और उनसे सरल प्रश्न पूछना इस प्रक्रिया को रोचक बनाता है।

सही साहित्य का करें चयन
बच्चों को विकल्प देना भी उतना ही आवश्यक है। जब उन्हें अपनी पसंद की पुस्तक चुनने की स्वतंत्रता मिलती है, तो पढ़ना उनके लिए आनंद का विषय बन जाता है। किताबें केवल शब्द नहीं देतीं, वे सोचने का ढंग भी देती हैं। साहित्य के चयन में भी सजगता आवश्यक है। इस संदर्भ में गीता प्रेस की बालोपयोगी पुस्तकें जैसे बाल चित्र रामायण और प्रेरक बाल कहानियां सरल भाषा में नैतिक मूल्यों का प्रभावी संप्रेषण करती हैं।

वहीं सुरुचि प्रकाशन की अनमोल कहानियां, महापुरुषों की जीवनियां और प्रेरक प्रसंग बच्चों में साहस, आदर्शवाद और राष्ट्रबोध का विकास करते हैं। ये पुस्तकें केवल जानकारी नहीं देतीं, बल्कि बच्चों के चरित्र और दृष्टि का निर्माण करती हैं। आज पुस्तकों के स्वरूप में परिवर्तन आया है कि वे पढ़ी ही नहीं, बल्कि सुनी भी जा रही हैं। आडियोबुक बच्चों को कहानियों से जोड़ रहे हैं, जो सकारात्मक है, किंतु पढ़ना और सुनना समान नहीं हैं।
स्क्रीन और किताबों का संतुलन

आज अनेक अध्ययन यह संकेत देते हैं कि बहुत ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों की एकाग्रता और स्मरण क्षमता को प्रभावित करता है। ऐसे में डिजिटल माध्यमों के उपयोग को संतुलित करना अत्यंत आवश्यक है। पूर्ण प्रतिबंध व्यावहारिक नहीं है, किंतु समय की स्पष्ट सीमा तय करना जरूरी है, ताकि पढ़ने के लिए आवश्यक मानसिक अवकाश मिल सके।

यह समझना होगा कि पढ़ने की आदत कोई तात्कालिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह एक सतत प्रक्रिया है, जो धीरे-धीरे संस्कार में बदलती है। इसके लिए धैर्य, निरंतरता और सही दिशा की आवश्यकता होती है। यदि परिवार, विद्यालय और समाज मिलकर इस दिशा में प्रयास करें, तो बचपन को फिर से किताबों की दुनिया में लौटाया जा सकता है। बचपन किताबों से जुड़ेगा, तभी समाज विचारों से समृद्ध होगा।

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