कोर्ट के आदेश का नहीं पड़ रहा फर्क, फिर गंदी हुई गोमती नदी

लखनऊ। देश में एक तरफ स्वच्छ भारत अभियान की बात चल रही है, वहीं बड़े पैमाने पर लोग इसकी धज्जियां भी उड़ा रहे हैं। लखनऊ के लोग गोमती नदी को जानबूझकर गंदा कर रहे हैं। एक तरफ लोग जहां नौ दिनों तक देवी मां की पूजा कर उन्हें खुश करने की कोशिश करते हैं, वहीं जो हम सबको पीने का पानी देती है, उसे मूर्ति विसर्जित कर प्रदूषित करते हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने रोक लगा रखी है।
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गौरतलब है कि साल 2009 में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने आदेश दिया था कि किसी भी वाटर बॉडी में मूर्तियां नहीं विसर्जित की जाएंगी। हाईकोर्ट ने भी नदियों में मूर्ति विसर्जन पर रोक लगा रखी है, लेकिन बावजूद इसके हर साल धड़ल्ले से नदियों में मूर्ति विसर्जन होता है। लखनऊ में 80 फीसदी लोगों के पानी की आपूर्ति गोमती नदी से होती है। इसीलिए इसे लखनऊ की लाइफलाइन भी कहा जाता है। सरकार ने गोमती नदी की सफाई में करोड़ों रुपए फूकें हैं, लेकिन नवरात्र के बाद होने वाले मूर्ति विसर्जन को गोमती नदी में विसर्जन करने से सरकार लोगों को नहीं रोक पाई।
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मूर्ति विसर्जन के दिन का आंकड़ा देखा जाए तो उस दिन 735 मूर्तियां गोमती नदी में विसर्जित हुईं। इससे भारी मात्रा में कचरा गोमती नदी में मिल गया। नवरात्र में लखनऊ के लोग पूजा में जो भी सामान प्रयोग में लाते हैं, उसे भी गोमती नदी में ही प्रवाहित करते हैं। चाहे वे पुराने फूल हों या फिर हवन की राख। इन सबसे लगभग पौने दो टन कचरा गोमती नदी में इकठ्ठा हो चुका है, जिसकी सफाई के लिए सरकार को फिर से करोड़ों रुपए पानी में बहाने होंगे। मूर्ति विसर्जन के दौरान 735 मूर्तियों के हिसाब से गोमती नदी में लगभग 3800 लीटर सिंथेटिक गया होगा। क्योंकि 5 फीट ऊंची मूर्ति बनाने में लगभग 90 किलो प्लास्टर ऑफ पेरिस और 6 लीटर सिंथेटिक पेंट का प्रयोग किया जाता है।
वहीं, मूर्ति बनाने में जस्ता, मैगनीज, सीसा, क्रोमियम और पारा जैसी धातुओं का प्रयोग होता है, जिससे गोमती प्रदूषित होती जा रही है। लोग गोमती नदी को न दूषित करें इसके लिए सरकार ने गोमती नदी पुल के किनारे ऊंची- ऊंची जलियां लगवाई थी, लेकिन लोगों की आस्था तो देखिये उन्होंने उस जाली में छेद करके वहां से पूजा का सामान फेंकना शुरू कर दिया। इसके बाद सरकार ने फिर से वहां जाली लगवाकर पुल के किनारे एक कूड़ादान रख दिया, ताकि लोग उसमें पूजा का सामन डाल दें। लोगों ने उसमे सामान डालना तो शुरू किया, लेकिन वो सामान पूरे पुल पर फेंका जाने लगा, जिसे रोकने के लिए सरकार के पास शायद कोई उपाय नहीं बचा है।

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