भुवन चंद्र खंडूड़ी: भावुक हुए राजनेताओं ने याद किया उनका अनुशासन, जहन में आज भी ये किस्से

पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी (बीसी खंडूड़ी) सियासत में अनुशासन और समय की पाबंदी के प्रतीक भी थे। उनके निधन पर भावुक राजनेताओं ने उनसे जुड़े संस्मरण साझा करते हुए कहा कि मे.ज. बीसी खंडूड़ी (सेनि) ने राजनीति में भी सैन्य अनुशासन की मिसाल कायम की। भारतीय सेना में मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा तब भी उनका जीवन पूरी तरह अनुशासित रहा।

खंडूड़ी जहां जितने बजे पहुंचने का समय तय करते थे, वहां ठीक उसी समय उपस्थित होते थे। उनके लिए समय का पालन केवल आदत नहीं बल्कि कार्यशैली का अहम हिस्सा था। यदि किसी व्यक्ति, विधायक या अधिकारी को मिलने का समय दिया गया है तो वे उसी निर्धारित समय पर ही मुलाकात करते थे।

कई बार देरी से पहुंचने वाले अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को उन्होंने फटकार भी लगाई, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही बनी रही। राजनीति में उनकी साफ-सुथरी छवि, कठोर प्रशासनिक निर्णय और जनता के प्रति समर्पण उन्हें अलग पहचान देते थे। बीसी खंडूड़ी ने दिखाया कि सियासत में भी अनुशासन और समय की पाबंदी प्रभावी नेतृत्व के लिए कितना जरूरी है।

घड़ी मिला लीजिए खंडूड़ी जी समय पर मिलेंगे

सेना में रहते हुए जिस अनुशासन के साथ वह रहे उसे उन्होंने व्यक्तित्व में उतारा। अंत तक वह अनुशासन और समय के पाबंद रहे। कैबिनेट में अधिकारी जो नोट तुरंत ले आते थे उस पर अधिकारियों को फटकार लगाते हुए कहते थे कि पहले ये मंत्रियों को दिया जाए ताकि वह उसका अच्छे से अध्ययन कर लें। समय के प्रति वह इतने पाबंद थे कि लोग कहते थे कि घड़ी का मिलान कर लीजिए आपको बीसी खंडूड़ी आपको बिल्कुल उसी समय पर मिलेंगे। – त्रिवेंद्र सिंह रावत, सांसद व पूर्व सीएम

कार्यकर्ता नहीं पहुंचे फिर भी समय से शुरू हुआ कार्यक्रम

बीसी खंडूड़ी राजनीति में सादगी, ईमानदारी और कड़े अनुशासन का प्रतीक थे। उनकी पहचान संवेदनशील राजनेता के तौर पर थी। एक बार चुनावी बैठक में हल्द्वानी में वह तय समय पर पहुंच गए लेकिन वहां पर सभी कार्यकर्ता नहीं पहुंचे थे। उन्होंने कार्यक्रम तय समय पर शुरू करवाया और जितने लोग मौजूद थे उन्हीं को संबोधित कर समय से कार्यक्रम समाप्त कर चले गए। इस तरह के उनके कई किस्से हैं जिससे उनके समय के प्रति प्रतिबद्धता पता चलती है। – हेमंत द्विवेदी, अध्यक्ष, बीकेटीसी

रोडवेज बस से पहुंचकर संबोधित की जनसभा

अन्य राजनेताओं से इतर वह सियासत में भी अनुशासन और समय के प्रति पाबंद थे। उनकी जनसभा तय समय पर शुरू होती थी चाहे जितने लोग आए हों। एक बार 1991 में बैजरो में उनकी गाड़ी खराब हो गई तो रोडवेज बस से पहुंचकर उन्होंने समय पर जनसभा संबोधित की। वह फिजूलखर्ची के भी खिलाफ थे और ट्रेन से सफर करते थे। दिल्ली से रात साढ़े तीन बजे नजीबाबाद पहुंचते थे। वापसी में ट्रेन रात एक बजे थी तब भी वह ट्रेन से ही जाते थे। – उमेश त्रिपाठी, तत्कालीन अध्यक्ष कोऑपरेटिव सोसायटी

Back to top button