डलहौजी है बर्फबारी का दीदार करने के लिए बेस्ट डेस्टिनेशन

जब देश के सबसे पिछड़े जिलों की बात आती है, तो हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले का नाम जरूर आता है, लेकिन प्रकृति की गोद में बसे इस जिले में कई ऐसे पर्यटन स्थल हैं, जो उसे देश-दुनिया के नक्शे पर अलग पहचान दिलाते हैं। इन्हीं शहरों में एक नाम है डलहौजी का। ब्रिटिश शासनकाल में अस्तित्व में आए इस शहर के दीदार को हर साल हजारों सैलानी आते हैं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद यहां के लोगों का हौसला फौलाद की तरह मजबूत है। देवदार और चीड़ के हरे-भरे पेड़ों से घिरे इस शहर की सुंदरता और बढ़ जाती है। इस शहर से नेताजी जी सुभाष चंद्र बोस लेखक एवं साहित्यकार रवींद्रनाथ टैगोर जैसी महान हस्तियों का भी नाता रहा है। पर्यटन के साथ-साथ यहां देश के बेहतरीन बोर्डिंग स्कूल भी हैं। देवदार के घने जंगलों, झीलों और झरनों के बीच यहां आकर गर्मियों की छुट्टियां बिताना सबसे यादगार बन जाता है। ठंड के साथ इस इलाके में बर्फबारी की शुरुआत भी हो चुकी है।
लॉर्ड डलहौजी कभी नहीं आए
ब्रिटिश काल में अंग्रेज अधिकारी लॉर्ड डलहौजी ने पर्यटन नगरी डलहौजी को एक सेनेटोरियम (स्वास्थ्यवर्धक स्थान) के रूप में बसाया था, लेकिन यह बात भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि डलहौजी शहर को बसाने वाला और जिसके नाम पर इस स्थान का नाम पड़ा है, वह अंग्रेज अधिकारी लॉर्ड डलहौजी कभी डलहौजी आया ही नहीं। वर्ष 1850 में डलहौजी को बसाने के लिए चंबा के तत्कालीन राजा व ब्रिटिश सरकार के बीच एक लीज पर हस्ताक्षर हुए थे, जिसके तहत वर्ष 1854 में पांच पहाड़ियों काठगोल, पोट्रेयन, टिहरी, बकरोटा और बेलम पर डलहौजी शहर को बसाया गया। उन दिनों अंग्रेज अधिकारी गर्मियों में यहां छुट्टियां बिताने आते थे। सुभाष चौक, गांधी चौक व बैलून कैंट में कई चर्च भी बनाए गए थे।
अतीत की इबारत
यहां अंग्रेज अधिकारी पूरे रौब के साथ रहते थे। सड़कों पर अंग्रेज अधिकारियों के गुजरने पर भारतीय लोगों को दुकानों व घरों के अंदर छिपना पड़ता था। यह भी कहा जाता है कि अंग्रेजी हुकूमत के दौरान डलहौजी की सड़कों पर भारतीय लोगों को घोड़े पर सवार होकर गुजरने पर भी पाबंदी थी। शहर के सबसे पुरानेरिहायशी इलाके बाजार में कई पुरानी इमारतों पर अतीत की इबारत पढ़ी जा सकती है। सदर बाजार में लाला अमीर चंद का वर्ष 1930 में स्थापित किया गया जनरल स्टोर आज भी मौजूद है, जहां लोगों को घरेलू जरूरत का हर प्रकार का सामान उपलब्ध हो जाता था। वहीं सुभाष चौक में 1939 में मास्टर मोहनलाल खोसला की हलवाई की दुकान, जो खोसला स्वीट्स के नाम से मशहूर थी, अब फ्रेंडस शेर-ए-पंजाब फूड कॉर्नर का रूप ले चुकी है। आधुनिकता के बीच बेशक यहां नए भवनों ने जगह ले ली है, लेकिन प्राकृतिक नजारे आज भी भरपूर हैं।
कमी नहीं नजारों की
यहां पर्यटन स्थलों की कोई कमी नहीं है। डलहौजी से करीब सात किलोमीटर दूर बनीखेत के ईको पार्क में लगे रंग-बिरंगे फाउंटेन व झूले भी पर्यटकों को अपनी ओर बरबस आकर्षित करते हैं। बकरोटा हिल्स के समीप डलहौजी पब्लिक स्कूल के निदेशक कैप्टन जीएस ढिल्लों द्वारा अपनी माता की स्मृति में स्थापित किया गया बिजी पार्क, सभी माताओं को समर्पित है। यहां प्रदर्शित मिग 21, सैन्य टैंक, मिसाइल व नौसेना से जुड़े साजो सामन पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं।
टैगोर का प्रिय पड़ाव
यहां के नैसर्गिक दृश्यों, सौंदर्य तथा शांति ने रवींद्रनाथ टैगोर के हृदय परगहरी छाप छोड़ी थी। लेखन के प्रति उनका झुकाव यहीं से हुआ था। कहा जाता है कि टैगोर की कृति ‘गीतांजलि’ का जन्म भी यहीं हुआ था। 1910 में अपने एक मित्र को लिखे पत्र में भी टैगोर ने डलहौजी की पर्वतमालाओं के प्रति अपना आभार व्यक्त किया है।
सरदार अजीत सिंह स्मारक
देशभक्त सरदार अजीत सिंह 1947 में डलहौजी आए थे। वह गांधी चौक के साथ ही लाला स्याल की कोठी स्पि्रंग फील्ड में ठहरे थे। वर्तमान में स्प्रिंग फील्ड कोठी को होटल स्प्रिंग में बदल दिया गया है। 14 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि को जब उन्होंने गांधी चौक में रेडियो पर देश के आजाद होने की खबर सुनी तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा, लेकिन देश के विभाजन की खबर सुनकर उन्हें आघात लगा। यह खबर सुनकर वह अपने कमरे में चले गए। रात भर शहर के लोग आजादी के जश्न में डूबे रहे, लेकिन जब सुबह सरदार जी को ढूंढ़ने लगे, तो वह कमरे में मृत पाए गए। 15 अगस्त को डलहौजी के पंजपूला स्थित श्मशानघाट में सरदार अजीत सिंह का अंतिम संस्कार किया गया था।
यहीं है ‘मिनी स्विटजरलैंड’
यहां से करीब 22 किलोमीटर की दूरी पर विश्र्वविख्यात पर्यटन स्थल खज्जियार है, जो ‘मिनी स्विट्जरलैंड’ के नाम से भी जाना जाता है। दरअसल, स्विट्जरलैंड की खूबसूरत पहाडिय़ां, चारों तरफ हरियाली, नदियां और झीलें दुनिया भर में मशहूर हैं। स्विट्जरलैंड के राजदूत ने यहां की खूबसूरती से आकर्षित होकर सात जुलाई, 1992 को खजियार को हिमाचल प्रदेश के ‘मिनी स्विट्जरलैंड’ का नाम दिया था। यहां का मौसम, चीड़ और देवदार के ऊंचे-लंबे पेड़, हरियाली, पहाड़ और वादियां स्विट्जरलैंड का एहसास कराती हैं। हजारों साल पुराने इस हिल स्टेशन को, खासतौर पर खज्जी नागा मंदिर के लिए जाना जाता है। यहां नागदेव की पूजा होती है। खज्जियार का आकर्षण चीड़ व देवदार के वृक्षों से ढकी झील है। झील के चारों ओर हरी-भरी मुलायम और आकर्षक घास इसकी खूबसूरती में चार चांद लगा देती है। झील के बीच में टापूनुमा दो स्थान हैं। वैसे तो खज्जियार में तरह-तरह के रोमांचक खेलों का आयोजन किया जाता है, लेकिन गोल्फ के शौकीनों के लिए यह स्थान अधिक अनुकूल है।
कब आएं डलहौजी घूमने?
वैसे तो वर्ष भर में कभी घूमने आया जा सकता है, परंतु बर्फ देखने की इच्छा होतो जनवरी में आ सकते हैं। आमतौर पर अप्रैल से दिसंबर तक डलहौजी आना बेहतर है। ग्रीष्म ऋतु में जहां मैदानी इलाके भीषण गर्मी से तप रहे होते हैं तो डलहौजी में मौसम सुहावना बना रहता है। यहां की ठंडी ताजा हवाओं में घूमकर पर्यटक तरोताजा अनुभव करते हैं। वहीं बरसात के दिनों में डलहौजी की खूबसूरती में चार चांद लग जाते हैं। देवदार व चीड़ के पेड़ों से लकदक पहाड़ों से होकर आती धुंध पर्यटकों का मन मोह लेती है।
कैसे पहुंचें डलहौजी?
डलहौजी के लिए दिल्ली, जम्मू, अमृतसर, पठानकोट व गगल (धर्मशाला) तक हवाई मार्ग व उससे आगे बस अथवा टैक्सी के माध्यम से पहुंचा जा सकता है। यहां पहुंचने के लिए पठानकोट तक ट्रेन से पहुंचा जा सकता है। पठानकोट से डलहौजी की दूरी 82 किलोमीटर है। दिल्ली से 564 किमी. चंडीगढ़ से 325 किलोमीटर, पठानकोट से 82 किलोमीटर तथा कांगड़ा एयरपोर्ट से 120 किलोमीटर की दूरी पर है।





