आपके लंबे मैसेज का जवाब सिर्फ ‘K’ या ‘ब्लू टिक’?

कुछ साल पहले तक हम यही मानते आ रहे थे कि परिवारों में संवाद की सबसे बड़ी समस्या दो पीढ़ियों का अंतर है। अलग समय में बड़े होने के कारण हमारी भाषा, प्राथमिकताएं और बातें करने का अंदाज अलग होना स्वाभाविक था, लेकिन जब बच्चे किशोरावस्था में पहुंचे और घर का एक ‘फैमिली व्हाट्सएप ग्रुप’ बना, तब असली हकीकत सामने आई। एहसास हुआ कि आज के समय में असली समस्या संवाद की नहीं, बल्कि उस संवाद के जवाब की है!
एकतरफा होता संवाद
यदि किसी फैमिली व्हाट्सऐप ग्रुप के मैसेज का निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए, तो परिणाम बेहद दिलचस्प होंगे। लगभग 95 प्रतिशत संदेश माता-पिता के होते हैं। बचे हुए 5 प्रतिशत में माता या पिता का वो मशहूर थम्सअप इमोजी शामिल होता है। और बच्चे? वे सब कुछ पढ़ते हैं, लेकिन जवाब शायद ही कभी देते हैं!
बैचेनी नापने का पैमाना
मुझे तो ऐसा लगता है कि व्हाट्सएप ने माता-पिता की बेचैनी और इंतजार को मापने का डिजिटल पैमाना दे दिया है, जिसे हम सब ‘ब्लू टिक’ के नाम से जानते हैं। माता-पिता ने लिखा-
‘नानी का जन्मदिन है, याद है ना?’ – ब्लू टिक।
‘शाम को जल्दी आ जाना।’ – ब्लू टिक।
‘घर आते समय दूध लेते आना।’ – ब्लू टिक।
यहां तक कि अगर झुंझलाकर लिखें- ‘कोई जवाब भी दे सकता है?’- तब भी सामने से सिर्फ ब्लू टिक ही मिलता है।
लंबे संवाद का नन्हा जवाब
आज की पीढ़ी ने संवाद का एक बिल्कुल नया माडल विकसित कर लिया है। उन्हें लंबे वाक्य लिखना पसंद नहीं; वे अक्षरों में बात करना ज्यादा सहज समझते हैं- कोई अंग्रेजी अक्षर उनके बड़े से बड़े संवाद का एकमात्र उत्तर होता है। उसमें भी आजकल के नए-नए स्लैंग और शार्टफार्म इस संवाद में रोड़े के समान होते जाते हैं। माता-पिता की जेनरेशन भावनाएं व्यक्त करते हुए तीन पैराग्राफ का संदेश लिख सकती है, तर्क दे सकती है, प्यार से अनुरोध कर सकती है… और बदले में जो उत्तर आता है, वह होता है-के। उस एक अक्षर में इतनी अंतिमता और निर्णय होता है कि उसके आगे बातचीत वहीं खत्म!
जब बच्चों से टोककर पूछा जाए, ‘बेटा, कम से कम ‘ओके’ ही लिख दिया करो?’ तो वे बड़ी सहजता से कहते हैं कि ‘के’ का मतलब ही ओके होता है।’ और अगर पूछें कि ‘फिर पूरा लिखने में क्या दिक्कत है?’ तो उनके चेहरे के भाव ऐसे होते हैं मानो हम इंटरनेट और तकनीक की पूरी प्रगति को पीछे धकेलने का अपराध कर रहे हों!
फैमिली ग्रुप में चुप्पी क्यों
माता-पिता के मन में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जो बच्चा अपने दोस्तों के साथ लगातार तीन घंटे बिना रुके चैट कर सकता है, वही बच्चा फैमिली ग्रुप में ‘ठीक है’ लिखने में इतनी कंजूसी क्यों करता है? शायद यह एक ऐसा रहस्य है जो हर पीढ़ी के माता-पिता को परेशान करता है। हालांकि, गौर से देखें तो माता-पिता की यह शिकायत पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। इन ब्लू टिक्स और एक-अक्षरी जवाबों के बीच भी रिश्ते सुचारू रूप से चलते रहते हैं- बच्चे ग्रुप के सारे मैसेज पढ़ते हैं।
उन्हें बखूबी पता होता है कि घर में क्या चल रहा है, रात के खाने में क्या बना है और किस दिन किसका जन्मदिन है। फर्क सिर्फ इतना है कि वे माता-पिता की तरह हर बात को शब्दों में व्यक्त करने की ज़रूरत महसूस नहीं करते। इस डिजिटल पीढ़ी के लिए जानकारी को सिर्फ पढ़ लेना, उस पर तुरंत प्रतिक्रिया देने से ज्यादा महत्वपूर्ण है। वे अपनी मौजूदगी शब्दों से कम और अपनी उपस्थिति से ज्यादा दर्ज कराते हैं।
ब्लू टिक पर दें मुस्कान
पुरानी पीढ़ी संवाद को जवाब मिलने से जोड़कर देखती है, जबकि आज की पीढ़ी के लिए कई बार संदेश पर ब्लू टिक आ जाना ही पर्याप्त उत्तर होता है। इसलिए, अगली बार जब आपके लंबे और प्यार भरे मैसेज के जवाब में सिर्फ ‘के’ या ‘ब्लू टिक’ मिले, तो परेशान होने के बजाय मुस्कुरा दीजिए। समझ लीजिए कि आपका संदेश सही पते पर पहुंच चुका है और पढ़ भी लिया गया है!





