पाकिस्तान में जल संकट के लिए भारत जिम्मेदार नहीं, अपने कर्मों की सजा भुगत रहा पड़ोसी देश

सिंधु बेसिन में आसन्न जल संकट का अनुमान लगाने और नदी के बहाव में उतार-चढ़ाव के लिए ऊपरी प्रवाह की गतिविधियों को जिम्मेदार ठहराने वाले पाकिस्तान के हालिया दावे खुद पाकिस्तान के ही हाइड्रोलाजिकल डाटा, जलाशय रिकार्ड और परिचालन संबंधी वास्तविकताओं के सामने विफल साबित हो रहे हैं। साक्ष्यों का बारीकी से आकलन करने पर एक बिल्कुल अलग तस्वीर सामने आती है।
यह तस्वीर किसी व्यवस्थागत कमी की नहीं, बल्कि प्रचुर मात्रा में पानी की आवक, बड़े पैमाने पर निचले प्रवाह में पानी के समुद्र में बह जाने और जल प्रबंधन में लंबे समय से चली आ रही ढांचागत सीमाओं की है। साल 2025 के जल-चक्र की सबसे खास बात खरीफ सीजन (अप्रैल से सितंबर) के दौरान पानी की उपलब्धता में भारी बढ़ोतरी थी।
पानी की कमी होती तो समुद्र में नहीं जाती पानी की बड़ी मात्रा
केंद्रीय जल आयोग के पूर्व अध्यक्ष अतुल जैन के मुताबिक, पाकिस्तान के सिंधु नदी प्रणाली प्राधिकरण (आइआरएस) के आंकड़ों के अनुसार, वास्तविक आवक लगभग 122.36 मिलियन एकड़-फीट (एमएएफ) तक पहुंच गई, जो खरीफ 2025 के लिए अनुमानित लगभग 104 एमएएफ की आवक से करीब 18 प्रतिशत अधिक थी। पूरे बेसिन में भारी बारिश ने सिंचाई की मांग को और कम कर दिया तथा प्रांतीय आवंटन पर दबाव कम कर दिया।
ऐसी स्थितियां बुनियादी रूप से अत्यधिक या कृत्रिम रूप से पैदा की गई पानी की कमी के दावों के विपरीत हैं। कमी के इस नरेटिव का इससे भी बड़ा खंडन पानी की उस असाधारण मात्रा से होता है जो अंततः कोटरी के निचले हिस्से से बहकर अरब सागर में चली गई। खरीफ 2025 के दौरान, कोटरी के नीचे बहकर जाने वाला पानी लगभग 30.848 एमएएफ था, जो हाल के पांच वर्षों के औसत (18.034 एफएएफ) से लगभग 71 प्रतिशत अधिक था।
कम बहाव वाले रबी 2025 सीजन (अक्टूबर से मार्च) के दौरान भी समुद्र में बड़े पैमाने पर पानी का बहाव (लगभग 3.6 एमएफ) जारी रहा। यदि बेसिन वास्तव में ऊपरी प्रवाह में हस्तक्षेप के कारण गंभीर कमी का सामना कर रहा होता, तो पानी की इतनी बड़ी मात्रा समुद्र में नहीं बहने दी जाती। इसके बजाय, यह डाटा निचले बेसिन के भीतर ही भंडारण बुनियादी ढांचे, बाढ़ प्रबंधन और वितरण दक्षता में कमियों की ओर इशारा करता है।
जलाशयों का भंडारण स्तर रहा 99 प्रतिशत
इसी अवधि के दौरान जलाशयों का व्यवहार जल-स्तर के लगातार संकट में होने के दावों को और खारिज करता है। जैसा कि अनुमान था, खरीफ सीजन की शुरुआत अपेक्षाकृत कम भंडारण स्तर के साथ हुई, जो कि एक सामान्य प्रक्रिया है जब तक कि जलाशयों को अगले सीजन के लिए पानी बचाकर रखने के लिए डिजाइन न किया गया हो।
इसके बाद, अधिक आवक और बाढ़ की घटनाओं के संयोजन ने प्रमुख जलाशयों को तेजी से भर दिया। सितंबर 2025 तक, भंडारण का स्तर क्षमता के लगभग 99 प्रतिशत तक पहुंच गया था, जिससे रबी 2025-26 के लिए पानी की उपलब्धता की स्थिति काफी मजबूत हो गई।
बर्फ पिघलने के पैटर्न से प्रभावित होता है नदियों का प्रवाह
इसके साथ ही, चिनाब नदी में उतार-चढ़ाव को ऊपरी प्रवाह में हेरफेर के सबूत के रूप में पेश करने के पाकिस्तान के हालिया प्रयास जल विज्ञान की वास्तविकताओं और नदी के बहाव पर चलने वाली पनबिजली परियोजनाओं के स्थापित परिचालन तौर-तरीकों दोनों को नजरअंदाज करते हैं।
मराला जैसे निचले स्थानों पर नदी का बहाव स्वाभाविक रूप से हिमालय में मौसमी बर्फ पिघलने के पैटर्न से प्रभावित होता है। सर्दियों में बर्फबारी में बदलाव, देर से पिघलना, या वसंत ऋतु में कम तापमान स्वाभाविक रूप से सीजन की शुरुआत में पानी के डिस्चार्ज स्तर को प्रभावित करते हैं।
इस तरह के उतार-चढ़ाव हिमालयी नदी प्रणालियों की एक सामान्य विशेषता हैं और इन्हें अपने आप में जानबूझकर किए गए हस्तक्षेप के सबूत के रूप में नहीं देखा जा सकता। बगलिहार जलविद्युत परियोजना जैसी पनबिजली परियोजनाओं के परिचालन तौर-तरीकों को भी बार-बार गलत तरीके से पेश किया गया है।
रन-ऑफ-द-रिवर प्रणालियों में जलाशय प्रबंधन में अनिवार्य रूप से गाद की सफाई , रखरखाव की आवश्यकताओं, पनबिजली अनुकूलन, तकनीकी सुरक्षा चिंताओं और बाढ़ प्रबंधन प्रोटोकाल से जुड़े अलग-अलग स्तर के पानी के निकास शामिल होते हैं। भारी गाद ले जाने वाली हिमालयी नदियों में गाद का प्रबंधन विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है। इसलिए फ्लशिंग या रखरखाव चक्र के दौरान अस्थायी परिचालन समायोजन परियोजना के कामकाज का हिस्सा हैं।





