नोटबंदी: आंगनवाड़ियों में बच्चों को नहीं मिल रहा भरपेट भोजन

नोटबंदी का असर आंगनवाड़ियों पर भी नजर आने लगा है। पर्याप्त मात्रा में कैश नहीं होने के कारण यहां बच्चों का पेट भरना मुश्किल हो रहा है।देश के 14 लाख आंगनवाड़ी वर्कर्स में से एक मध्यप्रदेश की निशा चौरसिया बताती हैं, अब तक जैसे-तैसे काम चल गया, लेकिन सामान खरीदने के पैसे नहीं होने से समस्या आ रही है।

नोटबंदी का ऐलान होने के बाद हमने यहां-वहां से पुराने नोट इकट्ठा किए, बैंक की लंबी-लंबी लाइन में लगे, नोट बदलवाए। कई मौकों पर तो अपनी जेब से खर्च कर बच्चों को खाना खिलाना पड़ा।
यूपी में मुरादाबाद की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता चमन अरा का कहना है कि बैंक से नए नोट नहीं मिल रहे हैं, ऐसे में कब तक दुकानदार से उधार लेकर बच्चों को खिलाएंगे। मजबूरन रुखा-सूखा ही बांटना पड़ रहा है। कम से कम बच्चों के लिए तो सरकार को अलग से बंदोबस्त करना चाहिए।
मालूम हो, भारत में छह साल के कम उम्र के आधे बच्चे खून की कमी के शिकार हैं। ऐसे में आंगनवाड़ियों द्वारा चलाया जा रहा यह प्रोग्राम किसी लाइफ-लाइन से कम नहीं है। लेकिन नोटबंदी के अचानक लिए गए फैसले से अब इनकी व्यवस्था बिगड़ती नजर आ रही है।
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर में आंगवाड़ियों से पोषण पाने वालें बच्चों की संख्या में छह फीसदी की गिरावट आई है। यानी 16 लाख बच्चे ऐसे रहे, जिन्हें जरूरी पोषण नहीं मिल पाया। साथ ही उनके स्वास्थ्य की जांच नहीं हो सकी।





