कश्मीर: जहन्नुम सी बन रही है धरा की जन्नत, पर यूं ही नहीं बदले थे हालात


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जब बुरहान के जनाज़े में मुफ्ती मोहम्मद सईद के जनाजे से ज्यादा लोग शामिल हुए, हथियारबंद आतंकी उसे सलामी देने का दुस्साहस कर भी मह़फूज बने रहे तो सरकार की इच्छा शक्ति पर सवालिया निशान लगा।
अब तक जो जनता इन्हें पनाह दे रही थी, उसी में से बहुत से लोग अब इनकी सूचनाएं सुरक्षा बलों तक पहुंचाने लगे। आतंकियों की मुसीबतें यहीं नहीं थमीं। पहले नोटबंदी, फिर अलगाववादियों के हवाला कारोबार पर करारी चोट से धन की आमद भी रुक गई।
वेतनभोगी आतंकियों का भुगतान अटक गया। रकम के इंतजाम के लिए बैंक और एटीएम लूटे जाने लगे। सुरक्षा बलों की मदद करने वाले पुलिसकर्मियों की हत्याएं होने लगीं। सेना छोड़ने का फरमान ठुकराने पर उमर फैयाज की जान ले ली गई। आतंकी वारदातों की बाढ़ आ गई।
उनके बच्चों को कश्मीर से बाहर की दुनिया से रूबरू कराती है। बच्चों को खेल, पढ़ाई और हर क्षेत्र में हुनर दिखाने का मौका मुहैया कराती है। ऐसे में सेना पर भरोसा और मुख्यधारा में बहने की ललक बढ़ना स्वाभाविक था। यही हुआ। सेना जहां युवाओं का मिज़ाज बदल रही थी वहीं घाटी में उसका सूचना तंत्र भी बहुत मजबूत हो गया।
इसका नतीजा यह हुआ लश्कर, हिज्ब और जैश के कमांडर किसी एक ही ठिकाने पर ज्यादा दिन नहीं टिक पाते। एक तरफ पैसे की किल्लत दूसरी तरफ बार-बार ठिकाना बदलने की मजबूरी उन्हें पस्त करने लगी। सेना की रणनीति भी यही है, ढूंढ़ो, भगाओ, थकाओ और खत्म करो। अब उसके मददगार भी बहुतेरे हैं। पुराने आतंकियों के लगातार मारे जाने और नई भर्तियां न हो पाने से आतंकी संगठनों की कमर टूटने लगी है।
उनकी आमद का कम होना खुदा की रहमतों के कम होने जैसा होता है। बाढ़ से बर्बाद हो चुके कश्मीर के लिए बुरहान की मौत से उठा बवाल तबाही के एक और तूफान की तरह था। लेकिन इस मुश्किल घड़ी में रियासत के राजनेता जनता से कोसों दूर थे। किसी भी दल के नेताओं ने जनता की तकलीफों को समझने और उन्हें बांटने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसी बेरुखी ने आग में घी का काम किया। श्रीनगर में कम मतदान का रिकार्ड बनाने के बाद अनंतनाग में चुनाव न होने देकर यह अहसास कराया गया कि सरकार के बूते का कुछ नहीं है।
फारूक अब्दुल्ला जैसे राजनेताओं के बयानों ने भी बहुत कुछ बिगाड़ा। तीन पीढि़यों की जिंदगी को जहन्नुम बनते देख चुकी अवाम पाकिस्तान परस्तों से त्रस्त है और सरकारों से नाउम्मीद। फिर भी उसे रियासत और मुल्क के निजाम से उम्मीदें लगाना ज्यादा मुनासिब लगा। कश्मीर में उठीं मौजूदा लपटों की असली वजह यही है। आतंकी तंजीमों और पाकिस्तान परस्त अलगाववादियों की बौखलाहट ने कश्मीर को फिर सुलगा दिया है।
आतंक से सबसे ज्यादा पीडि़त जिले अनंतनाग में अगर लड़कियां फुटबाल खेलते दिखती हैं तो यकीनन यह बदलाव की बेहद खुशगवार बयार है। दंगल गर्ल जायरा वसीम के साथ जब पूरा देश खड़ा हुआ तो सोशल मीडिया पर ट्रोल करने वालों को मुंह छिपाने की भी जगह नहीं मिली। सोशल मीडिया पर भी आतंकियों और उनके हिमायतियों को मुंहतोड़ जवाब मिल रहा है। आतंकियों का नायकत्व टूट रहा है। अलगाववादियों की हैसियत खत्म हो रही है। इसी की तो छटपटाहट है।
अब एक तरफ पाकिस्तान और उसके पैसे पर पलने वाले आतंकी व अलगाववादी कश्मीर की आग को भड़काने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ केंद्र से मिली हरी झंडी के बाद आतंकियों को चुन-चुनकर खत्म करने में जुटी सेना और सुरक्षा बल हैं। इनके बीच में जरूरत है एक समझदार, संवेदनशील और मजबूत राजनीतिक पहल की। इसके लिए यही सबसे माकूल समय है। जनता में यह भरोसा जगाना होगा कि सरकार उनकी मुहाफि़ज है। कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत जुमला नहीं जज्बा है। ऐसा हो सका तो कश्मीर समस्या का समाधान तो होते-होते होगा, लेकिन जन्नत फिर से जन्नत तो तुरंत ही लगने लगेगी।





