उत्तम स्वामी: चित्र विचित्र अनुभव के साथ पूर्ण हुई नर्मदा-परिक्रमा

strange experience of narmada parikrama
जब पहली बार उत्तम स्वामी से उनके प्रवचन मे मिले थे और उनसे काफी प्रभावित हुए थे उनके प्रवचन की आकर्षक शैली, सरल शब्द रचना और सहज प्रस्तुति उन्हें आकर्षित कर गई श्रीधर पराड़कर जी ने उनपे किताब लिखी है जिसका नाम ‘सिध्द्योगी-श्री उत्तम स्वामी’ है.हम उसीके कुछ अंश रोज आपके साथ साझा करेंगे।
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स्वप्न को प्रस्थान का आदेश मान रात में ही चल पड़े रात भर चलते रहे शुलपानी वन से बाहर निकलने तक पर रुके नहीं। निरंतर चलते रहने से पैर जवाब देने लगे थे। वन से बाहर निकले उस समय पूर्व दिशा में उषा की लालीमा छाने लगी थी। सामने ही एक आश्रम था। आश्रम के साधु ने चाय बनाकर पिलाई। 2 घंटे विश्राम कर आगे बढ़ गए रात भर चलने के कारण शरीर थक गया था। अतः भरूच से कुछ पहले नर्मदा मैया के तट पर विश्राम के लिए रुके। स्वामी जी ने देखा मगर पर विराजमान नर्मदा साक्षात प्रकट हुई। मैया के दर्शन से शरीर की क्लान्ति मिट गई थी। मैया की कांतिमय काया से विकिरित तेज स्वामी जी की देह समाने लगा। तेज को स्वामी जी की मानवीय काया सहन नहीं कर पा रही थी। प्रतिपल ऐसा अनुभव रहा था कि अब शरीर छूट जाएगा यह अवस्था लगभग 4 घंटे तक रही।
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प्रसंग उस समय का है जब वह उत्तर तट का मार्गक्रमण कर रह थे। उन्होंने गुजरात की सीमा को पार ही किया था। घड़ी पास में नहीं रखते थे आता अनुमान से ही काम चलाते थे। अंधेरा रहते ही चलना प्रारंभ कर देते थे। उस दिन सुबह लगभग 5 किलोमीटर चले। सामने एक नाला था। अच्छा चौड़ा था एक स्थान ऐसा था। जहां से पार पाया जा सकता था। पास जाने पर देखा कि एक भयंकर रूप की भारी-भरकम महिला कपड़े धो रही थी। वह मार्ग रोके बैठी थी। उसके हटे बिना जाना पार जाना संभव नहीं था। इस कारण स्वामी जी ने उस महिला से कहा,मुझे बाहर जाना है एक तरफ हो जाओ। पहले तो वह भयावह महिला लाल लाल आंखों से घूर कर देखती रही फिर बड़े ही डरावने स्वर में बोली कहीं और से निकल जा। उसके बैठे रहते निकलना कठिन था और नाले के पार जाने के लिए अन्य कोई स्थान नहीं था। मन में क्रोध तो आया परंतु इस विचार के कारण की व्रतावस्था में झगड़ा नहीं करना चाहिए। स्वामी जी चुपचाप लौट के सामने एक आश्रम दिखाई दे रहा था उसमें चले गए।
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मंदिर की घड़ी की ओर ध्यान गया देखा 3:15 बजे थे स्वामी जी की आहट से आश्रम के महाराज उठ बैठे उन्होंने पूछा मुंह अंधेरे का निकल पड़े स्वामी जी ने बताया कि समय का अनुमान न होने के कारण निकल पड़ा था। नाले पर महिला मार्ग रखे बैठी थी इस कारण आगे नहीं जा सका महाराज बोले तुम बच गए वह डाकन थी। मैं 20 वर्षों से इस आश्रम में रह रहा हूं आज तक जिस किसी ने उसे देखा वह जीवित नहीं बचा। तुम पहले आदमी हो जो उसे देखने के बाद भी जीवित बचे हो।
परिक्रमा के दौरान मार्ग में दो अन्य परिक्रमा वासी विजय आनंद और रामेश्वर आनंद मिले। परिचय हुआ और दोनों स्वामी जी के साथ हो लिए। एक दिन तीनों जंगल में मार्ग भटक गए। बहुत देर तक भटकने के बाद सुस्ताने के लिए स्थान पर बैठे दोनों सहयात्री वार्तालाप कर रहे थे और स्वामी जी ध्यान। ध्यान से उठने पर उन्हें गौमाता दिखाई दी। गौमाता को देखकर स्वामी जी ने सहयात्रियों से कहा इसके पीछे चलना चाहिए यह अपने को सही मार्ग दिखाएगी। तीनों गौ माता के पीछे चलते गए स्वामी जी का अनुमान ठीक निकला। कुछ ही समय में नर्मदा के किनारे पहुंच गए। मार्ग मिल जाने की प्रसन्नता से बाहर निकलने पर प्रणाम करके गौमाता की और देखा पर अब वह कहां थी अंतर्ध्यान हो चुकी थी।
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एक बार की बात है, एक रात नियम के अनुसार आश्रम अथवा मंदिर में ना रुककर निर्जन स्थान पर सोने के लिए रुके। आधी रात को विजयआनंद आसमान में उठने लगा। उसकी नींद खुल गई और अपने को ऊपर उठा देख जोर से चिल्लाया। उसके चिल्लाने से रामेश्वर आनंद व स्वामी जी भी जग गए। विजय आनंद को अधांतर हवा में उठा देख दोनों अचंभित रह गए। उसकी कुछ सहायता करते उसके पूर्व ही वह धड़ाम से भूमि पर आ गिरा। विजयआनंद कहराते हुए स्वामी जी को गालियां देने लगा। दोनों सहयात्रियों का मानना था स्वामी जी ने तांत्रिक प्रयोग किया है। राजेश्वरानंद ने टॉर्च की रोशनी में आसपास देखा तब ध्यान में आया कि वे लोग श्मशान में सो रहे थे। इस प्रकार के चित्र विचित्र अनुभव के साथ नर्मदा मैया की परिक्रमा पूर्ण हुई।





