समुद्र मे दिखा दुर्लभ प्रजाति का कछुआ, देखकर उड़ जाएगें आपके होश

समुद्र की गहराइयों में न जाने कितने रहस्य छुपे हैं। इस अथाह जलराशि के गर्भ में छुपे रहस्य अक्सर सार्वजनिक भी होते रहते हैं। अमेरिका के दक्षिण कैरोलिना बीच पर गत दिनों कुछ ऐसा ही हुआ। वहां कुछ स्वयंसेवकों को एक दुर्लभ समुद्री सफेद कछुआ दिखाई दिया। कियावा आइलैंड टर्टल पोर्टल से जुड़े लोगों की नजर जब इस नन्हें कछुए पर पड़ी तो वह रेत में रेंग रहा था। शायद वह अपने रहने के ठिकाने को खोज रहा था।

विश्व में कछुओं की 260 प्रजातियां

विश्व में कछुओं में 260 प्रजातियां पाई जाती हैं विश्व में पाई जाने वाली 260 प्रजातियों में से 85 प्रजातियां एशिया में पाई जाती हैं। इनमें से 28 प्रजातियां भारत में पाई जाती हैं। यूपी में 14 प्रजातियां पानी में पाई जाती हैं और एक प्रजाति जमीन पर पाई जाती है। तेजी से खत्म हो रहे कछुओं की कई प्रजातियों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक एवं संरक्षण समितियों ने रेड लिस्ट व वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 की सूची में शामिल किया है

भारत में भी बड़ी संख्या में कछुए पाए जाते हैं। ओडिशा का समुद्रतट कछुओं के आवास और उनके प्रजनन के लिए दुनियाभर में मशहूर हैं। यहां पर विभिन्न प्रजातियों के कछुए पाया जाना सामान्य बात है, लेकिन रविवार को बालासोर में एक अत्यंत दुर्लभ प्रजाति का कछुआ पाया गया। इस कछुए का रंग सामान्य कछुए से बिलकुल अलग है और यह पीले रंग का है।

टाउन ऑफ कियावा आइलैंड एससी ने गत रविवार को फेसबुक पर कछुए की तस्वीर साझा करते हुए लिखा, ‘हम बेहद उत्साहित हैं। जब इसका पता चला तब वहां कई लोग मौजूद थे। इनमें कॉलेज ऑफ चाल्र्सटन के छात्र भी शामिल थे। माना जा रहा है कि कछुआ आनुवंशिक समस्या का शिकार है, जिसे ल्यूसिज्म कहा जाता है। इसके कारण किसी जानवर की त्वचा का रंग हल्का या चित्तीदार हो जाता है। इस पोस्ट को सैकड़ों लाइक्स मिले हैं। बड़ी संख्या में लोगों ने इसे साझा भी किया है

इससे पहले ओडिशा के बालासोर में पीले रंग का कछुआ देखा गया था। पीले रंग का यह खूबसूरत और दुर्लभ कछुआ ओडिशा में बालासोर के सुजानपुर गांव में पाया गया था। सुजानपुर के रहने वाले बसुदेव महापात्र को यह कछुआ उस वक्त मिला जब वह अपने खेत में काम कर रहे थे। जैसे ही बसुदेव ने उस कछुए को देखा वह उठाकर उसको घर पर ले आए। बाद में उन्होंने उसको वन विभाग के अधिकारियों के सुपूर्द कर दिया था। भारत में कछुए की एक नई और दुर्लभ प्रजाति मिली है जो विलु‍प्‍त होने की कगार पर है। इस खोज के बाद भारत दुनिया में तीसरा सबसे अधिक विविध कछुओं की प्रजाति वाला देश बन गया है।

दुनिया भर में कछुओं की 24 प्रजातियों में से पांच भारत में ही पाई जाती हैं। अरुणाचल प्रदेश के आदिवासियों को जंगलों में लगभग 2000 मीटर की ऊंचाई पर सुबांसिरी नदी के किनारे इस प्रजाति के नर और मादा कछुए मिले थे। इस प्रजाति का नाम है मैनोरिया इम्‍प्रेसा। सौभाग्‍य से उस समय आदिवासियों के साथ एक फॉरेस्‍ट रेंज अफसर बंटी ताओ थे। इन्‍हीं की वजह से इन दोनों कछुओं को बचा लिया गया।

मैनोरिया इम्‍प्रेसा कछुए मध्‍यम आकार के होते हैं और लगभग 31 से 33 सेंटी मीटर की लंबाई तक बढ़ते हैं। ये इंडो-बर्मा क्षेत्र (कंबोडिया, चीन, लाओस, मलयेशिया, थाईलैंड और वियतनाम) के जंगलों की तलहटी में रहते हैं। इसी वजह से इन्‍हें खोज पाना मुश्किल होता है, यही इनके संरक्षण में बाधक सिद्ध होता है। इससे पहले इन्‍हें म्‍यांमार में देखा गया था। ये फफूंद खाते हैं। बंदी दशा में इनकी नस्‍ल को आगे बढ़ाना काफी मुश्किल काम है। एक बार में ये 10 से 21 अंडे देते हैं। टीएसए ने केंद्र और अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम व मणिपुर सरकार से तीन और दुर्लभ प्रजाति के कछुओं की गहन खोजबीन करने की अनुमति मांगी है।

मैनोरिया इम्‍प्रेसा कछुए मध्‍यम आकार के होते हैं और लगभग 31 से 33 सेंटी मीटर की लंबाई तक बढ़ते हैं। ये इंडो-बर्मा क्षेत्र (कंबोडिया, चीन, लाओस, मलयेशिया, थाईलैंड और वियतनाम) के जंगलों की तलहटी में रहते हैं। इसी वजह से इन्‍हें खोज पाना मुश्किल होता है, यही इनके संरक्षण में बाधक सिद्ध होता है। इससे पहले इन्‍हें म्‍यांमार में देखा गया था। ये फफूंद खाते हैं। बंदी दशा में इनकी नस्‍ल को आगे बढ़ाना काफी मुश्किल काम है। एक बार में ये 10 से 21 अंडे देते हैं। टीएसए ने केंद्र और अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम व मणिपुर सरकार से तीन और दुर्लभ प्रजाति के कछुओं की गहन खोजबीन करने की अनुमति मांगी है।

 

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