नौकरीपेशा वर्ग को अरुण जेटली दे सकते हैं ये बड़ा सरप्राइज

वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा 2018-19 के बजट पेश करने में अब कुछ ही घंटे बचे हैं. यह 2019 के आम चुनाव से पहले मोदी सरकार का अंतिम पूर्ण बजट है, इसलिए लोगों को काफी उम्मीद है कि यह लोकलुभावन बजट हो सकता है. खासकर नौकरीपेशा वर्ग को उम्मीद है कि वित्त मंत्री उनके लिए कुछ राहत की घोषणाएं कर सकते हैं. आइए जानते हैं कि क्या हैं नौकरीपेशा वर्ग की उम्मीदें और अरुण जेटली के ब्रीफकेस से इस वर्ग के लिए क्या अच्छे सरप्राइज निकल सकते हैं.

धारा 80सी के तहत कटौती का लाभ

फिलहाल व्यक्तिगत करदाता को ईपीएफ, पीपीएफ, जीवन बीमा, एनएससी आदि में निवेश के द्वारा टैक्सेबल इनकम में से अधिकतम 1.5 लाख रुपये तक की कटौती हासिल करने का अधिकार है. लोगों को उम्मीद है कि इस बार वित्त मंत्री इसमें 50 हजार रुपये तक की बढ़त कर सकते हैं. सेक्शन 80सी के तहत निवेश करके कटौती लाभ हासिल करने की सीमा यदि 2 लाख रुपये तक कर दी गई, तो करदाताओं के टैक्स ब्रैकेट के हिसाब से हर साल 2,575 रुपये से 15,000 रुपये तक की बचत हो सकती है. एक अनुमान के अनुसार ऐसा करने पर सरकारी खजाने के लिहाज से सालाना 2,575 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है.

टैक्स योग्य आय की सीमा बढ़ाना

खासकर वेतनभोगी करदाता काफी समय से टैक्सेबल इनकम की सीमा को बढ़ाने की उम्मीद कर रहे हैं. पिछले बजट में भी यह चर्चा की थी कि यह सीमा बढ़ाकर 3 लाख रुपये की जा सकती है, लेकिन वित्त मंत्री ने ऐसा नहीं किया. इस बार अगर वित्त मंत्री ने कर योग्य आय सीमा को 2.5 लाख से बढ़ाकर 3 लाख रुपये कर दिया इससे लोगों को राहत मिल सकती है. एक अनुमान के अनुसार ऐसा करने पर 75 लाख करदाताओं को फायदा मिलने की उम्मीद है. इससे सरकार के कर खजाने में 5,300 करोड़ रुपये की कमी आ सकती है.

स्टैंडर्ड डिडक्शन की फिर से शुरुआत

करदाताओं और उद्योग जगत की तरफ से कई साल से यह मांग भी आ रही है कि पहले प्रचलित रहे स्टैंडर्ड डिडक्शन की व्यवस्था को फिर से शुरू किया जाए. इसके तहत सभी तरह के करदाताओं के लिए एकमुश्त तय रकम के बराबर कटौती का लाभ मिलता है. अभी वेतनभोगी कर्मचारियों को कन्वेंस अलाउंस और मेडिकल रीइम्बर्समेंट के बदले कर योग्य आय में कटौती का लाभ मिलता है, जबकि कारोबारियों को अपने कारोबार में हुए विभिन्न तरह के खर्चों के बदले कटौती का लाभ मिलता है.

दिल्ली से लेकर लाहौर-काबुल तक आए भूकंप झटके

सबसे पहले साल 1974 में इस व्यवस्था को लागू किया गया था, लेकिन 2006-07 के बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदबंरम ने इसे खत्म कर दिया. उद्योग चैंबर एसोचैम का कहना है कि इसे अगर फिर से शुरू किया जाए तो इससे मांग बढ़ेगी और आर्थिक तरक्की को बढ़ावा मिलेगा. मान लीजिए कि सरकार वेतनभोगी वर्ग के लिए एकसमान 50,000 रुपये का डिडक्शन तय कर देती है तो इससे करदाताओें की जेब में 2,575 से 15,300 रुपये तक की सालाना अतिरिक्त रकम आ सकती है.

टैक्स स्लैब और दरों में बदलाव

उद्योग जगत लगातार इसकी मांग कर रहा है. फिलहाल 2.5 लाख से 5 लाख की तक की सालाना आय पर 10 फीसदी, 5 लाख से ऊपर और 10 लाख तक की आय पर 20 फीसदी और 10 लाख से ऊपर आय पर 30 फीसदी का टैक्स देना होता है. नौकरीपेशा वर्ग को उम्मीद है कि वित्त मंत्री इस बजट में 10 लाख से 20 लाख तक का एक नया ब्रैकेट तय करेंगे, क्योंकि हाल के वर्षों में आईटी जैसे कई सेक्टर में लोगों की सैलरी काफी बढ़ी है और उनकी आय का काफी बड़ा हिस्सा टैक्स में चला जाता है.

तो अगर मान लीजिए कि वित्त मंत्री 5 से 10 लाख तक आय के लिए 10 फीसदी और 10 से 20 लाख आय वर्ग के लिए 20 फीसदी की टैक्स दर तय करते हैं तो 5 से 10 लाख रुपये की आय वालों की टैक्स देनदारी आधी हो जाएगी और 10 से 20 लाख तक की आय वालों की भी काफी बचत होगी. हालांकि इससे सरकारी खजाने को काफी नुकसान होगा.

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